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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

by कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल

DevanagariHindipublished793 pages

प्रारंभिक पृष्ठ एवं प्राक्कथन

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सम्भाजी

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सम्भाजी
(ऐतिहासिक उपन्यास)

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प्रकाशक / लेखक की अनुमति के बिना इस पुस्तक को या इसके किसी अंश को
संक्षिप्त, परिवर्धित कर प्रकाशित करना या फ़िल्म आदि बनाना कानूनी अपराध है।

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सम्भाजी
विश्वास पाटील
अनुवाद
डॉ. रामजी तिवारी
भारतीय ज्ञानपीठ

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राष्ट्रभारती
लोकोदय ग्रन्थमाला : ग्रन्थांक 1035
ग्रन्थमाला सम्पादक
रवीन्द्र कालिया
सह सम्पादक
गुलाबचन्द्र जैन
ISBN 978-81-263-3091-1
प्रकाशक :
भारतीय ज्ञानपीठ
18, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड
नयी दिल्ली 110 003
मुद्रक : बालाजी ऑफसेट, दिल्ली 110032
आवरण चित्र : राधेश्याम अग्रवाल
आवरण-सज्जा : ज्ञानपीठ कला प्रभाग
SAMBHAJI
(Novel)
by Vishwas Patil
Translated by : Dr. Ramji Tiwari
Published by
Bharatiya Jnanpith
18, Institutional Area, Lodi Road
New Delhi-110 003

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अनुक्रम
खंड-एक
आफ़त 11
विरह वेदना 44
श्रृंगारपुर में 63
बगावत 92
अजगर की चपेट में 120
जीव ही शिव 151
रायगढ़ पर 187
राजदंड 220
खंड-दो
अशुभ मोड़ 241
परचक्र 299
जंजीरा ! जंजीरा ! 327
क्षात्र तेज 380
मुकुट-हरण 422
गोवा पर आक्रमण 455

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घमासान युद्ध - 491
दक्षिण अभियान 510
खंड-तीन
हंबीरगढ़ 547
कबड़ी कबरी 568
उद्घोष 605
घात और अपघात 645
महत्त्वाकांक्षा और जुलूस 673
भीमातट की करुण कथा 708

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पात्र-परिचय
नाम उपाधि
सम्भाजी राजा शिवपुत्र, हिन्दवी स्वराज के दूसरे छत्रपति
येसुबाई सम्भाजी राजा की धर्मपत्नी
शिवाजी महाराज हिन्दवी स्वराज के संस्थापक
पुतलाबाई शिवाजी महाराज की धर्मपत्नी
राजाराम साहब सम्भाजी राजा के सौतेले भाई
सोयराबाई राजाराम साहब की माता
एकोजी उर्फ व्यंकोजी शिवाजी महाराज के सौतेले भाई
दुर्गाबाई सम्भाजी राजा की धर्मपत्नी
गणूबाई सम्भाजी राजा की बहन
हरजीराजा महाडिक सम्भाजी राजा के बहनोई
गणोजी शिर्के सम्भाजी राजा के साले
अम्बिकाबाई हरजी राजा की धर्मपत्नी
राजकुँवर गणोजी शिर्के की पत्नी
महादजी निम्बालकर सम्भाजी राजा के बहनोई
सकवराबाई उर्फ सखूबाई महादजी निम्बालकर की धर्म पत्नी
पिल्लाजी शिर्के येसूबाई के पिता
हिरोजी फर्जन्द शहाजी राजा के अनौरस पुत्र
हंबीरराव मोहिते मराठों के प्रधान सेनापति
बालाजी आवजी स्वराज्य के मन्त्री
खंडो बल्लाल बालाजी आवजी का पुत्र
मोरोपन्त पिंगले स्वराज्य के पेशवा
केसो त्रिमल पिंगले मोरोपन्त के छोटे भाई
निलोपन्त पिंगले मोरोपन्त पिंगले के पुत्र
कवि कलश छन्दोगामात्य, सम्भाजी राजा के प्रमुख
प्रहलाद निराजी सहायक
अण्णाजी दत्तो न्यायाधीश
गोमाजी दत्तो सुरनवीस
काज़ी हैदर अण्णाजी दत्तो के भाई
कोंडाजी फर्जन्द न्यायाधीश, शिवाजी महाराज के मुंशी
येसाजी गंभीरराव मराठा सरदार
येसाजी कंक पुर्तगालियों के दरबार में मराठा वकील
कृष्णाजी कंक मराठा सरदार
जोत्याजी केसरकर येसाजी कंक का पुत्र
दौलतखान मराठा सरदार सम्भाजी के बाल मित्र

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मराठा नासेना क आधकारा इखलासखान
दादजी प्रभु देशपांडे मराठा सरदार
रायप्पा महार सम्भाजी राजा का बाल मित्र
मियाँखान मुसलमानी उमराव
भायनाक भंडारी मराठी नौसेना के अधिकारी
जेताजी काटकर मराठा सरदार
बासप्पा नाइक इक्केरी के जागीरदार
दादजी काकड़े मराठा सरदार
म्हालोजी घोडपड़े मराठों के सेनापति
संताजी घोडपड़े म्हालोजी घोडपड़े के पुत्र
धनाजी जाधव मराठा सरदार
दुर्गादास राठौड राजपूत सरदार
औरंगजेब हिन्दुस्तान का बादशाह
उदयपुरी औरंगजेब की बेगम
मुअज्जम औरंगजेब का बड़ा शहजादा
असदखान औरंगजेब का वजीर, चाचा
आज्जम (आजम) औरंगजेब का छोटा शहजादा
जुल्फिकारखान असदखान का पुत्र
अकबर औरंगजेब का शहजादा
अनित उन्निसा औरंगजेब की छोटी शहजादी
हसन अली खान मुगल सरदार
दिलेरखान औरंगजेब का सरदार
शहाबुद्दीनखान मुगल सरदार
बहादुरखान कोकलत्ताश औरंगजेब का दूधभाई
काकरखान मुगल सरदार
रूहूल्लाखान औरंगजेब का बक्षी
सिद्दी कासम जंजीरे का हब्शी
सिद्दी खैर्यात जंजीरे का हब्शी
कांट दी आल्हांग हिन्दुस्तान के लिए पुर्तगाली वाइसराय
चिक्कदेव राजा मैसूर का राजा
केर्जविन अंग्रेज गवर्नर
अबुल हसन तानाशाह गोलकुंडा का कुतुबशाह
यादण्णा पंडित कुतुबशाह का प्रधान
सिकन्दर आदिलशाह बीजापुर का आदिलशाह
मर्जानखान आदिलशाह का सरदार
मुकर्रबखान आदिलशाह का सरदार
मुकर्रबखान का पुत्र

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खंड-एक

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आफ़त
एक
आधी रात का समय। हड्डी कँपा देने वाली शीत लहर चल रही थी। हजार
कोशिश करने पर भी आज गोदू को नींद नहीं आ रही थी। घर के पास पुराने पीपल
के पेड़ की डालों और समीप के बाँसवन से वायु के वेग का पता चल रहा था।
पीपल के छोटे-छोटे फल टप-टप की आवाज करते खपरैल की छत पर गिर रहे
थे। गोदू ने करवट बदलने के लिए गर्दन घुमाई। उसकी कलाई पर हरी चूड़ियाँ
चमक रही थीं। अभी उतारी नहीं गयी थीं (मराठी प्रथा के अनुसार शादी के अवसर
पर पहनाई गयी चूड़ियाँ 17 दिन, 1 वर्ष या 12 महीना बाद उतारी जाती हैं और
दूसरी चूड़ियाँ पहनाई जाती हैं)। अभी उसकी शादी हुए एक महीना भी पूरा नहीं
हुआ था। संध्या समय की लालिमा ढल जाने के बाद मन्दिर के बाहर सासू माँ का
बिछौना लगाकर गोदू अपने कमरे में आ जाती थी। अपने कमरे में लेटते ही गोदू को
अपने पति के दबे पाँव आने की आहट सुनाई देती थी।
आज की रात गोदू को कुछ अजीब-सी लग रही थी। मन्दिर के दीये कब के
बुझ चुके थे। दूसरी ओर से सासू माँ के खर्राटों की आवाज आ रही थी। रात बहुत
हो चुकी थी। किन्तु कमरे के बाहर उसके पति निवासराव का कहीं अता-पता न
था। हाँ, तबेले में जानवर और दड़बे में मुर्गे-मुर्गियाँ अभी भी जाग रहे थे।
आज की रात गोदू को बहुत अजीब, उदास और भयंकर लग रही थी।
बीच ही में वह बिस्तर से उठी। बरामदे को पार करके उसने धीरे-से आँगन
की ओर आँख घुमाई। मुख्य दरवाजे के भीतरी हिस्से में एक तेज मशाल जल रही
थी। गोदू के ससुर त्र्यम्बकराव चिन्तित मुद्रा में दोनो पैरों पर बैठे थे। उनके ठीक
सामने निवासराव कुछ खोये-खोये से अपने पिताजी को एकटक देख रहे थे। उस
मन्त्रणा में भयानक चेहरे वाले तीन व्यक्ति और थे जिन्हें गोदू नहीं पहचानती थी।
त्र्यम्बकराव बारह गाँव के देशपांडे अर्थात् अधिकारी थे। गोदू ने सोचा देशपांडे नाम
इसी पद के कारण बना होगा। गोदू ने इस मुद्दे को टालने की कोशिश की।
सम्भाजी :: 11

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वैसे गोदू का मायका महाड़ के पास एक बहुत पिछड़े हुए गाँव में था, किन्तु
गोदू का व्यावहारिक ज्ञान बहुत अच्छा था। उसके मौसा छत्रपति शिवाजी महाराज
के अष्ट प्रधान मंडल में सुरनवींस थे। उनका नाम था अण्णाजी दत्तो प्रभुणीकर।
प्रभुणीकर रायगढ़ किले के नीचे पाचाड़ गाँव में रहते थे। गोदू अनेक बार अपने
मौसा-मौसी के पास पाचाड़ गाँव जाती थी। शिवाजी के राज्य में क्या चल रहा है,
किन नयी लड़ाइयों की योजनाएँ बन रही हैं आदि बातें उसके कानों तक आती थीं।
छत्रपति शिवराय पर गोदू की अपार भक्ति थी। वह उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक
महत्त्व देती थी। आसमान के सूर्य, चाँद और शिवाजी महाराज उसे प्राणों से भी
अधिक प्रिय थे।
कुछ वर्ष पहले गोदू कोंकण के एक छोटे-से गाँव बिरवाड़ी में कुछ दिन रहने
के लिए गयी थी। एक शाम को उसके रिश्तेदार के आँगन में कुछ गपशप चल रही
थी तभी एक भयानक खबर वहाँ पहुँची। खबर थी कि पूना के समीप कोढाणा किले
को जीतते-जीतते सरदार तानाजी भालुसरे युद्ध में शहीद हो गये। शिवाजी ने किला
तो जीत लिया था किन्तु सिंह को खो दिया था। यह हृदय विदारक समाचार सुनकर
सभी व्यथित हो गये। जैसे-जैसे यह खबर गली-कूचों में फैली चारों ओर दुःख
का ज्वार आ गया।
घाघरा-चोली पहने गोदू अपने छोटे-छोटे कानों से यह सब सुन रही थी।
"बहादुर तानाजी का शव पालकी में रखा गया है। डोली किले के दरवाजे
पर आ रही है। डोली स्वयं शिवाजी महाराज ने अपने कन्धे पर उठाई है।"
इन समाचारों को सुनते-सुनते ही कुछ नवयुवक उत्साहित होकर खड़े हो
गये। उन्होंने डोली के दर्शन का निश्चय किया। फिर क्या था। युवकों की टोली
बन्दरों की तरह छलाँग लगाते, पर्वत घाटियों को पार करते, जंगलों को चीरते हुए
कोढाणा की ओर बढ़ने लगी। एक घंटे के बाद जंगल से गुजरते बच्चों ने अनुभव
किया कि उनके पीछे घास फूस और झाड़ियों के बीच से एक हल्की-सी आवाज
आ रही थी। हिरनी की तेजी से कोई उनका पीछा कर रहा है। उनके पीछे-पीछे
कोई दौड़ता हुआ आ रहा है। सभी पीछे मुड़कर देखने लगे। सभी ने देखा, आठ
साल की गोदू उनके पीछे-पीछे दौड़ती चली आ रही है।
इस अविस्मरणीय शव यात्रा की गोदू कभी भी भूलने वाली नहीं थी।
तानाजी का गिरना किसी अपराजेय किले के बुर्ज के गिर जाने जैसा था। वस्तुतः
तानाजी नाम का शिवाजी महाराज का हाथ गिर गया था। शिवाजी महाराज के
तेजस्वी मुखमंडल की कांति पूरी तरह से लुप्त हो गयी थी। चारों ओर सूतक की
छाया मँडरा रही थी। जिसे देखना भी मुश्किल हो रहा था। आसपास के गाँवों से
लोगों के झुंड के झुंड आकर इकट्ठे हो रहे थे, पालकी रोकी गयी। तानाजी के मुख
12 :: सम्भाजी

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पर से कफन हटाया गया तो तानाजी का फूल जैसा मुरझाया चेहरा दिखाई पड़ा।
शिवाजी महाराज जैसा धैर्यवान भी विह्वल हो उठा। पालकी के साथ जाने वाली
दो-तीन हजार लोगों की भीड़, नदी के बाढ़ जैसा रोर-शोर करता उनका वेग,
बलिदान के भाव से रोमांचित होने वाली बाँहें, जन समूह का महासागर, वेदनाबोध
की तीव्रता, छिलते पाँव आदि आज भी गोदू के मन पर यथावत अंकित था।
गोदू फिर उठी और दरवाजे पर आकर खड़ी हो गयी। पहले से चलती हुई
मन्त्रणा अभी समाप्त नहीं हुई थी। बल्कि जाड़े के दिनों में जिस तरह अलाव को
चारों और घेरकर बैठते हैं उसी प्रकार एक दूसरे से सटे हुए बैठे थे। बातें बहुत मन्द
स्वर में हो रही थीं। लोग बहुत धीमी आवाज में बोल रहे थे। उनके श्वासोच्छ्वास
में षड्यन्त्र की तीव्र धार चढ़ी हुई थी। गोदू का ससुर एकाएक हा-हा करके हँसा।
अपनी बिल्ली जैसी आँखें गोल-गोल घुमाते हुए व्यंग्य के स्वर में बोला, "बस!
सिर्फ कल दोपहर होने की देर है। कल रायगढ़ की रंगपंचमी भोसले खानदान की
होली बनेगी। सवेरे नौ बजे शिवाजी महाराज की सवारी के किले के होली माल पर
आने की देर है। बाघ दरवाजे पर जो तोप है उसको पलीता लगाएँगे। रंगपंचमी का
रंग उड़ाएँगे और रंग की आड़ में उन्मत्त शिवाजी की भोसले को भी उड़ा देंगे।"
"यदि कुछ गड़बड़ हो गयी तो?" आशंका भरे स्वर में भयभीत निवासराव
ने पूछा।
"बहादुरगढ़ की छावनी जाकर हमने इस षड्यन्त्र की सारी बात खान साहब
से कर ली है। त्योहार देखने के बहाने बारह लड़ाकू जवान पहले ही रायगढ़ पर
पहुँच चुके हैं। शिवाजी के समाप्त होने का संकेत जैसे ही तोप द्वारा दिया जाएगा,
पास की झाड़ियों में छिपी यवन सेना अपनी तोपों के साथ तीव्र गति से बाहर
निकल आएगी और रायगढ़ के साथ मराठों की नाक काटकर रख देगी। षड्यन्त्र की
यह बात इतनी स्पष्टता से बताते हुए त्र्यम्बकराव की आँखें भयानक दिखाई दे रही
थीं।
त्र्यम्बकराव ने अपने दुपट्टे को प्रसन्नता से झटका। अपनी लम्बी चोटी की
गाँठ बाँधी और सामने पसरे अँधेरे को विजेता की मुद्रा से देखने लगा।
गोदू का गला सूख गया था। वह इस भयंकर षड्यन्त्र की कल्पना करते ही
घबरा गयी। वह अपनी साँस से भी भयभीत होने लगी। इसलिए उसने अपना
आँचल मुँह में भर लिया। वह तेजी से घर के पीछे के दरवाजे की ओर भागी।
बाहर की तेज हवा गोदू के मस्तिष्क में भर गयी। उसके पैरों की गति तेज
हो गयी। उसने तबेले में जाकर ऊपर टाँगी हुई घोड़े की काठी निकाल ली। तबेले
में बँधे साठ-सत्तर घोड़ों में से पंछी नामक तेज गति वाले घोड़े को चुना। यह पंखों
वाले पंछी की भाँति फर्राटे से दौड़ने वाला घोड़ा था। वह झटपट छलाँग लगाकर
सम्भाजी :: 13

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घोड़े पर बैठ गयी। उसने घोड़े को एड़ लगाकर लगाम को पीछे की ओर खींचा।
रात की ठंडी हवा और गहरे अँधेरे में उसका घोड़ा रायगढ़ की ओर दौड़ने लगा।
गोदू मानो हवा पर सवार हो गयी थी। रास्ते में पड़ने वाले पेड़ों, नदी, नालों,
झरनों आदि की उसने कोई चिन्ता नहीं की रिकाब में दृढ़तापूर्वक पैर टिकाए, पीठ
को झुकाकर, पेट के बल पर झुककर, रिकाब के आधार पर वह आधी खड़ी हो
जाती थी। 'चल मेरे बहादुर घोड़े, और तेज दौड़ो' कहकर चिल्ला उठती थी। घोड़े
के मुँह से झाग निकलने लगी थी और छींटे उसके मुख पर पड़ रहे थे।
देखते-देखते गोदू पाचाड़ गाँव की सीमा पर जा पहुँची। रात समाप्त हो रही
थी। पहाड़ की नुकीली चोटियाँ, किले का पहरे वाला मचान, हिरकणी बुर्ज,
कीकण दिवे का ऊँचा पहाड़, सभी पहाड़ों की कतारें, पहाड़ों की ऊँची चोटियाँ
अँधेरे में से अपना सिर ऊपर उठा रहे थे।
"बापू। थोड़ी देर पहले अपने घर के पिछवाड़े किसी जानवर के पाँव की
आहट सुनाई पड़ी थी। देखिए।" निवासराव ने अपनी आशंका व्यक्त की।
तीनों घबरा गये। आशंका के बिच्छू ने हृदय पर डंक मार दिया। बाड़े के
पिछवाड़े कुछ गड़बड़ी हुई । सभी लोग जल्दी से अपनी मन्त्रणा वार्ता छोड़कर उठ
गये और घर के पिछवाड़े की ओर दौड़े। पिछवाड़े का दरवाजा खुला था। तबेले का
दरवाजा पूरा खुला था और सबसे आश्चर्य की बात यह भी थी कि पंछी नाम का
सबसे तेज और तगड़ा घोड़ा अपनी जगह पर नहीं था। पत्तों की आवाज में बोलने
वाले पीपल के पेड़ के नीचे सभी डरे हुए खड़े थे।
इतने में ही दहाड़ मारकर रोते हुए निवासराव भीतर से बाहर आये।
"बापू धोखा हुआ धोखा। भाग गयी आपकी बहू भाग गयी।"
"क्या मतलब है रे।"
"मैं सौगन्ध लेकर कहता हूँ। वह छिनाल, रंडी शिवाजी की भक्त है। वही
घोड़ा लेकर गयगढ़ की ओर भागी होगी, अपने षड्यन्त्र का भांडाफोड़ करने के
लिए।" पिता पुत्र के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। छोटी दाढ़ी और भयानक चेहरे
वाले मेहमान भी डर गये। एक के बाद एक पाँच-छह घोड़े तबेले से बाहर निकाले
गये। सभी लोग वायुवेग से रायगढ़ की ओर घोड़े दौड़ाने लगे।
अन्त में चितदरवाजे की ऊपरी कमान दिखाई पड़ी। हाँफती हुई गोदू ने अपना
घोड़ा रोक दिया। वह पसीने से तरबतर हो रही थी। घोड़ा भी थककर चूर हो गया
था। घोड़े के मुँह से झाग का प्रवाह चालू था। हाथ में लिये भाले की लकड़ी के
सहारे वह सीधी हुई और नट-कला दिखाने वाली किसी बाजीगर की कन्या की
भाँति आगे की ओर उछलकर नीचे आ गयी। बिना एक क्षण विलम्ब किये वह तीर
की तरह दरवाजे की ओर दौड़ी। दरवाजे को जोर-जोर से धक्का मारते हुए वह
14 :: सम्भाजी

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ऊँची आवाज में चिल्लाने लगी, "अरे धोखा हुआ है धोखा। दरवाजा खोलो,
दरवाजा खोलो।"
गोदू की चीख अँधेरे को चीरती चली गयी। रातभर जागकर पहरा देनेवाले
दो-तीन पहरेदार दरवाजे की ड्योढ़ी तक आये। मशाल के लाल प्रकाश में उन्होंने
नीचे खड़ी गोदू को देखा। गोदू के शरीर से लिपटी साड़ी फट गयी थी। वह पूरा
जोर लगाकर चिल्लाई, विह्वल होकर बोली, "पहरेदार चाचा दरवाजा खोलो न,
दरवाजा खोलो। मुझे महाराज से अविलम्ब मिलना है। अभी का अभी।"
"किलेदार सुबह सात बजे चाभियों का गुच्छा लेकर आएँगे। दरवाजा तभी
खुलेगा। उसके पहले नहीं।" पहरेदार की रूखी आवाज आयी।
"मगर तब तक धोखा हो जाएगा। महाराज की जान को खतरा है। दया
करो। मुझे अन्दर आने दो।"
पहरेदार हँस पड़े। रात-बिरात ऐसे बहुत से पागल और भूत-प्रेत दरवाजे के
आसपास घूमते रहते हैं। ऐसा लोग कहते हैं।
गोदू पर पागलपन सवार हो गया। वह किसी भी तरह इस भयानक खबर को
किले पर पहुँचाना चाहती थी। उसने पहरेदारों से बहुत विनती की, जोर-जोर से
चिल्लायी। जब प्रार्थना करके थक गयी तब उसने अनुभव किया कि वहाँ रुककर
समय बिताने का कोई उपयोग नहीं था।
गोदू वहाँ से धीरे-धीरे हट गयी। करौंदों की झाड़ियों के बीच से वह
चितदरवाजे से पश्चिम की ओर भूत की तरह सरकने लगी। माँ की गोद से ही वह
हिरकणी की बहादुरी की कथा सुनती आयी। एक बार सन्ध्या समय तोप से दी गयी
सूचना के अनुसार किले के दरवाजे बन्द हो गये। परिणाम यह हुआ कि दूध देने के
लिए किले के अन्दर आयी हिरकणी अन्दर ही फँस गयी। किले के नीचे ही उसका
गाँव था। उसका दूध पीता बच्चा घर में अकेला था। अपने बच्चे को दूध पिलाने के
लिए उसकी ममता व्याकुल हो उठी। उसी भावावेश में वह रात के घने अँधेरे में
किले की खतरनाक ढलान बहादुरी से उतर कर नीचे आ गयी थी। बच्चे की भूख
के कारण एक माँ ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी। यहाँ तो एक बहादुर
महायोद्धा की जान को खतरा पैदा हो गया है। ऐसा योद्धा जिससे अस्तित्व से यहाँ
के पत्थरों को बंजर जमीन को स्वराज्य की रोली लगाई गयी है। जिस शिवाजी के
कारण गाँव-गाँव से, जंगल-जंगल सियार भाग गये थे। गरीब लोगों की बहू-
बेटियों की इज्जत बची थी, उसी शिवाजी महाराज, मराठों के पंचप्राण की जान
संकट में थी। इसके लिए तो कुछ-न कुछ करना ही चाहिए था।
कोढाणा जीतने वाली तानाजी की यशवन्ती गोह की भाँति गोदू की जान
तिलमिलाने लगी। वह झाड़ियों से भरे घने जंगल को पार करते हुए ऊपर चढ़ने के
सम्भाजी :: 15

Page 18Permalink

लिए किसी गुप्त रास्ते की तलाश कर रही थी। उसे अधिक देर तक खोज नहीं
करनी पड़ी। वर्षा के पानी को बाहर निकालने के लिए पुसाटी बुर्ज के पास एक
पतली-सी सुराख बनी हुई थी। वह सुराख उस समय खाली थी। गोदू ने बिना एक
क्षण गँवाए, बिना कुछ आगा-पीछा सोचे उस सुराख में अपना सिर डाल दिया और
अगल-बगल के पत्थरों पर अपनी कुहनी टिकाते सरकने लगी।
रायगढ़ किले पर अँधेरा छँट रहा था। भोर से ही रंगपंचमी उत्सव की तैयारी
आरम्भ हो चुकी थी। किले के ऊपर के राजमार्ग फूल मालाओं और तोरणों से
सजाये गये थे। शिवाजी महाराज के प्रासाद के सामने शहनाई बज रही थी। नये-नये
झुल्ल डालकर और मस्तक पर नये-नये आभूषणों को पहनाकर हाथियों को सजाया
जा रहा था। साधु, संन्यासी, छोटे बच्चे आदि सभी तरह-तरह के कपड़े पहन कर
इधर-उधर घूम रहे थे। कमर में तलवार लटकाए, हाथ में भाला-बर्छी लिये पहरेदार
महाराज के दरवाजे पर तत्परता से पहरा दे रहे थे।
इसी बीच घबराई हुई गोदू वहाँ दौड़ती हुई आयी। वह पहरेदारों से हाथ पैर
जोड़ने लगी, अधीर होकर प्रार्थना करने लगी। पहरेदागों के बार-बार रोकने पर भी
वह वहाँ से हटी नहीं। पहरेदार जोर से चिल्लाए, "आखिर क्यों मिलना चाहती है
तू महाराज से?"
इसी समय दूसरी ओर से घोड़ों की टापों की तेज आवाज सुनाई पड़ी। सर्जा
नामक एक ऊँचे और बादल के रंग वाले घोड़े पर एक बहुत सुन्दर राजकुमार बैठा
था। उसकी पगड़ी में हरे रंग के रत्नों की झालर लगी थी। उसका रंग हल्का
अरुणाभ, प्रशस्त भाल, गरूड़ जैसी नाक, काली गहरी आँखें ऐसे विलक्षण
व्यक्तित्व का निर्माण करते थे जिसे देखकर कोई भी सहज रूप से आकर्षित हो
जाता था। उसकी सुन्दर दाढ़ी घनी मूँछें, कन्धे पर लटकने वाली रेशमी अलकें
आदि उसकी लोकोत्तर सुन्दरता में चार चाँद लगाती थीं।
वह बहादुर योद्धा घोड़ा दौड़ाते हुए वहीं आ पहुँचा। उसके आते ही लोग
'शम्भुराजा, संभाजी राजा' कहकर आपस में फुसफुसाने लगे। शम्भुराजा के पीछे
घेरदार परिधान में जोत्याजी केसकर, कवि कलश, जगदेव राव जैसे राजा के कुछ
सहयोगी भी घोड़े दौड़ाते वहीं आ गये। उनके साथ ही महार जाति का रायप्पा नाक
भी चल रहा था। उसके सिर पर जरीदार टोपी नहीं थी, मराठों को पेचदार पगड़ी
भी नहीं थी। उसके बदले सिर पर एक सादा साफा बँधा था और शरीर पर कम्बल
से बना, आधे शरीर को ढकने वाला, कंचुकी जैसा वस्त्र था। वह काले रंग का,
करारी मूँछों, भेदक आँखों वाला किमान था। किन्तु वह अगना घोड़ा शम्भुराजा और
कवि कलश के साथ ही दौड़ा रहा था।
रंगपंचमी के दिन वैसे भी युवराज शम्भूमहाराज बहुत प्रसन्न और मनमौजी
दिखते थे किन्तु आज उनके चेहरे पर रात्रि जागरण की थकान दिखाई पड़ रही थी।
16 : : सम्भाजी

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उनकी आँखें बाज पक्षी की आँखों की तरह कुछ खोज रही थीं। उनके साथी भी
आधी रात के बाद से युवराज के साथ ही भवानी कड़ा और टकमक टोक की ओर
घूमकर आये थे। युवराज को आशंका थी कि रंगपंचमी के त्योहार पर कुछ गड़बड़
होने वाली है। यही कारण था कि उनकी पहले से सतेज और सावधान आँखें थकी
होने पर भी तत्परता से चारों ओर देख रही थीं।
गोदू पहरेदारों से बड़ी व्यग्रतापूर्वक कह रही थी कि महाराज की जान को
खतरा है। इसी समय शम्भूराजा का घोड़ा फुरफुर करता वहाँ आकर रुका। अपने
फटे हुए कपड़ों, हड़बड़ाई हुई गोदू तीर की गति से शम्भूराजा की ओर दौड़ी। वह
जोर से चिल्लाई, "युवराज! युवराज अपने महाराज की जान को खतरा है। महाराज
की जान को खतराऽऽ...''
शम्भूराजा ने जोत्याजी और रायप्पा को संकेत किया, "सबके सामने इसे कुछ
कहने का अवसर न दो, चलो, इस स्त्री को साथ लेकर चलो।"
शम्भूराजा का घोड़ा अपने महल की ओर चल पड़ा। उनके अन्य सहयोगी
भी गोदू को साथ लेकर शीघ्रता से चले। अन्दर ले जाकर अपने व्यक्तिगत कक्ष में
शम्भूराजा ने गोदू से पूछताछ आरम्भ की। गोदू ने अपने ससुर और पति की पाप
कथा का आख्यान किया। शम्भू महाराज को गोदू की बात पर सहज ही विश्वास हो
गया। बाहर की गड़बड़ी की भनक पाकर येसूबाई भी वहाँ आ गयीं।
गोदू की कहानी सुनकर युवराज ने कवि कलश से कहा, "अब तो आपको
यकीन हुआ न कविराज; मुझे तो यह विश्वास हो गया था कि इस रंगपंचमी पर
कुछ-न-कुछ होगा।"
"आप समय पर सावधान हो गये, यह तो बहुत अच्छा हुआ। लेकिन राजन!
किले के सारे पहरों, नाकों आदि की जाँच तो कर ली गयी है। अभी तक तो कोई
धोखा नजर नहीं आ रहा है।"
"ऐसा कहने से नहीं चलेगा कविराज! जैसा कि हमारे पिताजी कहते हैं, हमें
निरन्तर सावधान रहना चाहिए। चलिए हम सभी अपने-अपने मोर्चे पर चलें। और
कविराज! वे वाड़कर पिता-पुत्र यहीं कहीं होंगे। उन्हें तुरन्त बन्दी बनाइए।
आवश्यक हो तो किसी को उनके गाँव भेजिए लेकिन हर हालत में उन्हें आज ही
बन्दी बनाइए।"
"जैसी आज्ञा राजन।" ऐसा कहते हुए बिना मुड़े, युवराज को मुजरा करते
हुए सभी साथी अपने-अपने कार्य के लिए बाहर निकले ।
बहुत ही डरी, सहमी और काँपती हुई गोदू पर युवराज ने एक दृष्टि डाली।
उन्होंने येसूबाई से कहा, "इसको पहनने के लिए अच्छे कपड़े दे दो। हमें लग रहा
है कि रायगढ़ पर आयी हुई महान विपत्ति इसी की वजह से टल गयी। इसकी जान
को खतरा हो सकता है। इस गोदू को आप स्वयं सुरक्षा प्रदान करें।"
सम्भाजी :: 17

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युवराज शीघ्रता से स्नानगृह की ओर मुड़े। उन्हें पूजा आदि समाप्त करके
शीघ्र ही बाहर निकलना था।
अब तक रायगढ़ पर प्रकाश पूरी तरह फैल चुका था। जगह जगह पर
लेज़िम और गतका खेलने वाले बच्चों के झुंड जमा हो रहे थे। शहनाई और नगाड़े
बज रहे थे। फूलों की सजावट और रंगोलियाँ सज रही थीं। नवयुवक इधर-उधर
घूम रहे थे। इस प्रकार शिवाजी महाराज के महल के सामने उत्सव का वातावरण
बना हुआ था। इसी समय पूरी तरह भयभीत त्र्यम्बकराव और निवासराव वहाँ
पहुँचे। वहीं पर उन्हें पता चला कि गोदू संभाजी महाराज के महल में गयी है।
पिता पुत्र इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि यदि गोदू उनसे पहले शिवाजी
महाराज के पास पहुँच गयी और उनके षड्यन्त्र का भंडाफोड़ कर दिया तो उनके
लिए मारकर खाई में फेंक देने के अतिरिक्त कोई अन्य सजा नहीं होगी।
वाड़कर पिता-पुत्र कुछ डरे किन्तु तुरन्त ही सँभल गये। उन्होंने सोचा कि
गोदू हमारे बारे में शिवाजी महाराज से कुछ कहे उससे पहले हम ही उसको बदनाम
कर दें। यह मौका अपने आप उन्हें मिल गया था। यह मौका था अपने गले में पड़ी
जलती फटाकों की माला को असावधान युवराज के गले में डाल देने का। औरतों के
नाम पर युवराज को बदनाम करने का षड्यन्त्र पहले से ही चल रहा था। उसमें गोदू
का एक नाम और जोड़ देना था। उन्होंने सोचा कि आयी हुई यह विपत्ति किसी
प्रकार टल जाय तो अच्छा है।
वाड़कर पिता पुत्र युवराज के महल की ओर बढ़े। किन्तु महल के पास
पहुँचने पर उनके पैर डर के मारे काँपने लगे। दोनों ने एक दूसरे को उकसाने का
प्रयत्न किया किन्तु सिंह की गुफा में जाकर उसे ललकारने का साहस उनमें नहीं
था। भयभीत होकर पिता पुत्र ने अपने घोड़े शिवाजी महाराज के महल की ओर
दौड़ाये।
आज रंगपंचमी के उत्सव में सम्मिलित होने के लिए महाराज के महल के
सामने बहुत भीड़ जमा हो गयी थी। पाँच पाँच कोस की दूरी से शौकीन और
उत्साही लोग उत्सव में भाग लेने के लिए आये थे।
थोड़ी ही देर में महाराज पालकी में बैठकर जगदीश्वर मन्दिर की ओर जाने
वाले थे। इसी समय त्र्यम्बकराव उल्टी मुट्ठी मुँह पर रखकर जोर-जोर से चिल्लाने
लगा, "भगा ले गये हो भगा ले गये युवराज इस गरीब की पुत्रवधू को भगा ले
गये!''
“अब मैं बिना पत्नी के कहाँ जाऊँ? अपने रिश्तेदारों को क्या मुँह दिखाऊँ?”
अपने ही हाथों से अपने मुँह पर चपत लगाते हुए निवासराव जोर-जोर से रोने लगा।
वहाँ पर इकट्ठा हुए दर्शक और सरदार यह दृश्य देखकर चकरा गये।
शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र पर कोई ऐसा आरोप लगाता है क्या! कल राजगद्दी
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