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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 626 of 639

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Page 626

६०८ चरकसंहिता [ अ० ८

मुलहठी, सफेद कचनार, लाल कचनार नीम, अम्लवेतस, कन्दूरी, झनझनिया,
लाल आक, अपामार्ग इनका कषाय प्रयोग करना चाहिये। बड़ी इलायची,
रेणुका (मेथी के बीज), फूल प्रियंगू, छोटी इलायची, धनिया, तगर, जटामांसी,
खस, तालीशपत्र, उशीर, नेत्रबाला इनके कषाय का प्रयोग करना चाहिये।
गजा, काण्डेक्षु, कुष्ठ, होगल, कसौंदी, तगर इनके कषाय को देवे। चमेली,
चमेली की कली, हल्दी, दारूहल्दी, श्वेत पुनर्नवा, लाल पुनर्नवा, माषपर्णी,
मूंगपर्णी इनका कषाय देवे । सिम्बल, रोहेड़ा, भादाली, रास्ना, कलम्बी, बहुवार,
धामन, क्षीरणी वृक्ष, पृश्नपर्णी, सारिवा, सिंघाड़ा इनका कषाय देवे । पिप्पली,
पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोंठ, सरखों, फाणित (राब), दूध, क्षार और नमक
इनका कषाय देना चाहिये। अथवा इच्छा के अनुसार, दोष दूष्य की अपेक्षा
से प्रयोजनानुसार वर्त्ति, चूर्ण, अवलेह, घी, तैल आदि, कषाय, मांस रस, यवागू
(लप्सी), यूष, काम्बलिक*, दूध, इनको मिलाकर बनाये लड्डू तथा अन्य
खाद्य पदार्थ तैयार करके वमन के योग्य व्यक्ति को वमनविधि से खाने के लिये
देना चाहिये। यह वमन द्रव्यों का कल्प संक्षेप में कह दिया है। वमन द्रव्यों के
कल्प को पीछे कल्पस्थान में विस्तार से कहेंगे ॥ १३३ ॥
विरेचनद्रव्याणि तु श्यामा-त्रिवृच्चतुरंगुल-तिल्वक-महावृक्ष-सप्तला-
शङ्खिनी- दन्ती-द्रवन्तीनां क्षीर-मूल-त्वक्पत्र-पुष्प-फलानि यथायोगं तैस्तैः
क्षीर-मूल-त्वक्पत्र-फलैर्बिक्लिप्ताविक्लेपितैरजगन्धाश्वगन्धाऽजशृङ्गी-क्षीरि-
णी-नीलिनी-क्लीतक-कषायैश्च, प्रकीर्योदकीर्या-मसूर-विदला-कम्पिल्लक-
विडंग-गवाक्षी-कषायैश्च, पीलु-प्रियाल-मृद्वीका-काश्मर्य-परूषक-बदर-
दाडिमामलक-हरीतकी-विभीतक-शृङ्गीर-पुनर्नवा-विदारिगन्धादि-कषा-
यैश्च, शीधु-सुरा-सौवीरक-तुषोदक-मैरेय-मेदक-मदिरा-मधु-मधूलक-धा-
न्याम्ल-कुवल-बदर-खर्जूर-कर्कन्धुमिश्रश्च दधि-दधिमण्डोदश्विद्भिश्च,
गोमहिष्याजावीनां च क्षीर-मूत्रैर्यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्ति-
क्रिया-चूर्णासव-लेह-स्नेह-कषाय-मांसरस-यूषकाम्बलिक-यवागू-क्षीरोप-
षेयान्मोदकानन्यांश्च भक्ष्यप्रकारान् विविधांश्च योगाननुविधाय यथार्हं
विरेचनार्थाय दद्याद्विरेचनमिति कल्पसंग्रहो विरेचनद्रव्याणाम्। कल्प-
स्त्वेषां विस्तरेण यथावदुत्तरकालमुपदेक्ष्यते ॥ १३४ ॥

☸ काम्बलिक यूष का लक्षण —
‘पिशितेन रसस्तत्र यूषो धान्यैः खडः फलैः ।
मूलैश्च तिलफल्काम्लप्रायः काम्बलिकः स्मृतः ॥ अष्टांगसंग्रह - सूत्रस्थान ॥