Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 627 of 639

Read in context
Page 627

अ० ८ ] ३६ विमानस्थानम् ६०६
विरेचन द्रव्य—काली निशोथ, सफेद निशोथ, अमलतास, लोध, स्नुही,
शिकाकाई, शंखपुष्पी, दन्ती, द्रवन्ती ( मोगलई एरण्ड ) इनके दूध, मूल,
त्वचा, पत्ते, पुष्प और फूल ये छः विरेचनाश्रय द्रव्यों को मिला कर अथवा
पृथक् पृथक् रूप से प्रयोग करना चाहिये । अजवायन, असगन्ध, मेढ़ाशृङ्गी,
दूर्वा, नीलनी, मुलहठी, इन के कषाय कर देवे । प्रकीर्य और उदकीर्य ( दो
प्रकार का करंज ), श्यामलत्ता, कपीला, बायविडंग, इंद्रायण इनके कषाय का
उपयोग करे। पीलु, पियाल, मुनक्का, गम्भारी, फालसा, बेर, अनारदाना,
आंवला, हरड़, बहेड़ा, श्वेत और लाल पुनर्नवा, विदारीगन्धा, शालपर्णी,
पृश्निपर्णी, वृहती और छोटी कटेरी ( ह्रस्वपंचमूल ) इनके कषाय का प्रयोग
करना चाहिये । सीधु, सुरा, काञ्जी, तुषोदक ( धान्याम्ल ), मैरेय ( सुरा
और आसव को मिलाकर तैयार की सुरा ), मेदक, मदिरा, मधु ( द्राक्षा-सुरा ),
मधूलिका, धान्याम्ल, कुवल, बदर और कर्कन्धु ( बेरों के भेद हैं ) और खजूर,
दही, दही का मण्ड मस्तु, उदश्वित् ( दही में आधा पानी मिलाकर तैयार की
छाछ ), गाय, भैंस, बकरी और भेड़ इनमें से जिसका मूत्र या दूध मिले उनसे
वर्ति, चूर्ण, अवलेह, स्नेह, कषाय, मांस रस, यूष, काम्बलिक, यवागू, क्षीर तथा
लड्डु और अन्य खाद्य पदार्थों को तैयार करके विरेचन के योग्य व्यक्ति को
विरेचन विधि से खाने के लिये देना चाहिये । यह विरेचन द्रव्यों का संग्रह
संक्षेप में कह दिया है । विस्तार से कल्पस्थान में कहेंगे ॥ १३४ ॥
आस्थापनेषु तु भूयिष्ठकल्पानि द्रव्याणि यानि योगमुपयान्ति तेषु
तेष्ववस्थान्तरेष्वातुराणां तानि द्रव्याणि नामतो विस्तरेणोपदिश्यमाना-
न्यपरिसंख्येयानि स्युर्विबहुत्वात्, इष्टञ्चानतिसंक्षेपविस्तरोपदेशस्तन्त्रे,
इष्टं च केवलं ज्ञानं, तस्माद्रसत एव तान्यनुद्रयाख्यास्यन्ते ॥ १३५ ॥
आस्थापन द्रव्यों में जो द्रव्य प्रायः रोगियों की अवस्था भेद से अनेक
प्रकार से प्रयोग में आते हैं, वे औषध द्रव्य अधिक होने से एक एक का नाम
कहने पर असंख्य हो जाते हैं । शास्त्र में न तो अधिक संक्षेप और न अधिक
विस्तार होना चाहिये । इसलिये शास्त्र में सम्पूर्ण, सब बातों का ज्ञान ही
अपेक्षित होता है । इसलिये आस्थापन द्रव्यों को यहाँ पर रस के द्वारा ( छः
प्रकार से ) कहेंगे ॥ १३५ ॥
रस-संसर्ग-विकल्प-बिस्तरो ह्येषामपरिसङ्ख्येया,समवेतानां रसाना-
मंशांशबलविकल्पातिबहुत्वात् । तस्माद् द्रव्याणां चैकदेशमुदाहरणार्थं
रसेष्वनुविभज्य रसैकैकश्येन रसकैकल्येन च नामलक्षणार्थं षडास्थाप-
नस्कन्धाः समूहरसतोऽनुविभज्य व्याख्यास्यन्ते । यत्त षड्विधमास्था-