Skip to content
SarvaKosh
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 600 of 639

Read in context
Page 600

५८२ चरकसंहिता [ अ० ८
प्रतिज्ञाहानि—पहिले की हुई प्रतिज्ञा को छोड़ कर दूसरी प्रतिज्ञा को स्वी-
कार करना 'प्रतिज्ञाहानि' है। जैसे—प्रथम प्रतिज्ञा की—पुरुष नित्य है,
अकृतक होने से, आकाशवत्। दूसरे प्रतिपक्षी ने कहा—पुरुष अनित्य है,
इन्द्रिय-ग्राह्य होने से, घड़े के तुल्य। इसमें अपनी प्रतिज्ञा (नित्य पुरुष) को
छोड़ कर दूसरी प्रतिज्ञा (अनित्य पुरुष है) को स्वीकार करना प्रतिज्ञा-
हानि है ॥ ६१ ॥
अथाभ्यनुज्ञा—अभ्यनुज्ञा नाम य इष्टानिष्टाभ्युपगमः ॥ ६२ ॥
अभ्यनुज्ञा—इष्ट (परपक्ष में दोष) और अनिष्ट (स्वपक्ष में दोष) दोनों को
स्वीकार करना 'अभ्यनुज्ञा' है। दूसरे से कहे हुए दोष को अपने पक्ष में मान
लेना और दूसरे के पक्ष में दोष दिखाना 'अभ्यनुज्ञा' वा 'मतानुज्ञा' है ॥६२॥
अथ हेत्वन्तरं—हेत्वन्तरं नाम प्रकृतेर्हेतौ वाच्ये यद्विकृतिकहेतु-
माह ॥ ६३ ॥
हेत्वन्तर—प्रासंगिक हेतु के स्थान पर विकृत हेतु अर्थात् अप्रासंगिक हेतु
कहना 'हेत्वन्तर' है ॥ ६३ ॥
अथार्थान्तरं—अर्थान्तरं नाम एकस्मिन् वक्तव्ये परं यदाह; यथा—
ज्वरलक्षणे वाक्ये प्रमेहलक्षणमाह ॥ ६४ ॥
अर्थान्तर—एक वस्तु के प्रसंग में दूसरी वस्तु का कहना 'अर्थान्तर' है।
यथा—ज्वर के लक्षणों में प्रमेह के लक्षण कहने लगना ॥ ६४ ॥
अथ निग्रहस्थानं—निग्रहस्थानं नाम पराजयप्राप्तिः, तच्च त्रिर-
भिहितस्य वाक्यस्याविज्ञानं परिषदि विज्ञानवत्यां; यद्वा अननुयोज्य-
स्यानुयोगोऽनुयोज्यस्य चाननुयोगः। प्रतिज्ञाहानिरभ्यनुज्ञाकालातीतव-
चनमहेतवो न्यूनमतिरिक्तं व्यर्थमपार्थकं पुनरुक्तं विरुद्धं हेत्वन्तर-
मर्थान्तरं निग्रहस्थानम् ॥ ६५ ॥
निग्रहस्थान का दूसरा नाम पराजय-प्राप्ति है। यह विज्ञानवती परिषद्
में तीन बार कहे हुए वाक्य को न जानना, या अननुयोज्य का अनुयोग, अथवा
अनुयोज्य का अननुयोग है अर्थात् जहां प्रश्न न करना चाहिये वहां प्रश्न
करना और जहाँ करना चाहिये वहाँ न पूछना भी निग्रहस्थान ही है। इसके
अतिरिक्त प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, अतीतकालवचन, अहेतु, न्यून, अतिरिक्त,
व्यर्थ, अनर्थक, पुनरुक्त, विरुद्ध, हेत्वन्तर, अर्थान्तर, ये सब बातें पराजय का
कारण होती हैं ॥ ६५ ॥
इति वादमार्गपदानि यथोद्देशमभिनिर्दिष्टानि भवन्ति ॥ ६६ ॥
इस प्रकार से बाद के मार्गों को पूर्व कथनानुसार कह दिया है ॥ ६६ ॥