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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 599 of 639

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Page 599

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८१
संशय के नाश करने वाले हेतु का स्पष्टीकरण नहीं करता, इसलिये यह अहेतु
है । क्योंकि जो हेतु स्वयं संशय का कारण है, वही संशय के नाश का कारण
नहीं हो सकता ।
वर्ण्यसमो नामाहेतुर्यो वर्ण्यविशिष्टः । यथा परो ब्रूयात्-अस्पर्शत्वाद्
बुद्धिरनित्या शब्दवदिति, अत्र वर्ण्यः शब्दो बुद्धिरपि वर्ण्या, तदुभय-
वर्ण्यविशिष्टत्वाद्वर्ण्यसमोऽप्यहेतुः ॥ ५७ ॥
वर्ण्यसम अहेतु — जो हेतु साध्य के समान असिद्ध होने से साध्य की
भांति साधने योग्य होता है। जैसे किसी ने कहा कि बुद्धि अनित्य है, स्पर्श,
न होने के कारण, शब्द की भांति। इनमें बुद्धि साध्य है, शब्द भी साध्य है ।
इसलिये दोनों के असिद्ध होने से यह वर्ण्यसम अहेतु है ॥ ५७ ॥
अथातीतकालं—अतीतकालं नाम यत्पूर्व वाच्यं तत्पश्चादुच्यते,
तत्कालातीतत्वादग्राह्यं भवतीति । पूर्वं वा निग्रहप्राप्तमनिगृह्य पक्षान्त-
रितं पश्चान्निगृह्णीते तत्तस्यातीतकालत्वान्निग्रहवचनमसमर्थं भवतीति ५८
अतीतकाल — जो बात पहिले कहनी चाहिये, उसको पीछे कहना 'अतीत-
काल' है । समय के व्यतीत होने के कारण वह बात अग्रहणीय होजाती है ।
अथवा दूसरे प्रतिवादी के निग्रह स्थान में आने पर उस समय उसको न पकड़
कर दूसरे पक्ष में पहुंचने पर पीछे से निग्रह करना, यह भी अतीत काल होने
से निग्रह में असमर्थ होता है ॥ ५८ ॥
अथोपालम्भः—उपालम्भो नाम हेतोर्दोषवचनं; यथापूर्वमहेतवो
हेत्वाभासा व्याख्याताः ॥ ५६ ॥
उपालम्भ — हेतु में प्रकरणसम आदि दोष दिखाना 'उपालम्भ' है। जैसे
पहिले कहे अहेतु जो कि हेतु न होने पर भी हेतु की भांति दीखते हैं ॥ ५६ ॥
अथ परिहारः—परिहारो नाम तस्यैव दोषवचनस्य परिहरणम् ।
यथा—नित्यमात्मनि शरीरस्थे जीवलिङ्गान्युलभ्यन्ते, तस्य चापगमा-
न्नोपलभ्यन्ते, तस्मादन्यः शरीरादात्मा नित्यश्चेति ॥ ६० ॥
परिहार—हेतु में कहे दोष का दूर करना 'परिहार' है। जैसे—शरीरस्थ
आत्मा में प्राण अपान आदि जीव के लक्षण नित्य उपलब्ध होते हैं और
आत्मा के शरीर से निकल जाने पर ये लक्षण उपलब्ध नहीं होते, इस लिये
आत्मा शरीर से भिन्न दूसरी वस्तु है और वह नित्य है ॥ ६० ॥
अथ प्रतिज्ञाहानिः — प्रतिज्ञाहानिर्नाम सा पूर्वप्रतिगृहीतां पर्य॑नुयुक्तः
परित्यजति । यथा-प्राक् प्रतिज्ञां कृत्वा 'नित्यः पुरुष' इति । पर्यनुयुक्त-
स्त्वाह—अनित्य इति ॥ ६१ ॥