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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 601 of 639

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Page 601

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८३
वादस्तु खलु भिषजां वर्तमानो वर्तेतायुर्वेद एव, नान्यत्र ॥ ६७ ॥
वैद्यजनों के वाद का विषय केवल आयुर्वेद ही है, अन्यत्र नहीं ॥ ६७ ॥
अत्र हि वाक्यप्रतिवाक्यविस्तराः केवलाश्चोपपत्तयश्च सर्वाधिकर-
णेषु । ताः सर्वाः सम्यगवेक्ष्यावेक्ष्य सर्वं वाक्यं ब्रूयात्, नाप्रकृतकम-
ज्ञाक्षमपरीक्षितमसाधकमकुलमव्यापकं वा, सर्वं च हेतुमद् ब्रूयात्,
हेतुमन्तो ह्यकलुषाः सर्व एव वादविग्रहाः चिकित्सिते कारणभूताः;
प्रशस्तबुद्धिवर्धकत्वात्, सर्वारम्भसिद्धिं ह्यवहत्यनुपहता बुद्धिः ॥ ६८ ॥
इस आयुर्वेद में वाक्य, प्रतिवाक्य, इसका विस्तार, सम्पूर्ण उपपत्तियां ये
सब बातें प्रकरणों में हैं। उन सबका भली प्रकार देखकर सम्पूर्ण वाक्य कहना
चाहिये । अप्रकृतक ( असम्बद्ध ), शास्त्ररहित, अपरीक्षित, साधकरहित, बिना
जाने कुछ नहीं कहना चाहिये; जो कुछ कहना हो वह सब कारण वा हेतु,
युक्तिपूर्वक कहना चाहिये, क्योंकि हेतुपूर्वक कहे हुए सम्पूर्णवाद-विग्रह
स्वच्छ होते हैं, तथा चिकित्सा में कारणभूत हैं, क्योंकि वे निर्मलबुद्धि सब
प्रकार की सफलता को उत्पन्न करती है ॥ ६८ ॥
इमानि खलु तावदिह कानिचित्प्रकरणानि ब्रूमो भिषजां ज्ञानार्थम् ।
ज्ञानपूर्वकं कर्मणां समारम्भं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥ ६६ ॥
ज्ञात्वा हि कारण-करण-कार्ययोनि-कार्य-कार्यफलानुबन्ध-देश-कालप्रवृ-
त्त्युपायान्सम्यगभिनिर्वर्तमानः कार्याभिनिवृत्ताविष्टफलानुबन्धं कार्य-
मभिनिर्वर्तयत्यनतिमहता प्रयत्नेन कर्ता ॥ ७० ॥
निम्न कुछ प्रकरणों को वैद्यों के ज्ञान के लिये कहते हैं क्योंकि विद्वान्
लोग ज्ञानपूर्वक कर्मों का आरम्भ करने की प्रशंसा करते हैं। कारण, करण,
कार्ययोनि, कार्य, कार्यफल, अनुबन्ध, देश, काल, प्रवृत्ति और उपाय, इनको
भली प्रकार जान कर ही कर्म करता हुआ कर्त्ता स्वल्प प्रयत्न से ही कार्यसमाप्ति
पर फल देने वाले कार्य का सम्पादन करता है ॥ ७० ॥
तत्र कारणं नाम तत्, यत्करोति, स एव हेतुः, स कर्ता ॥ ७१ ॥
कारण—जो करता है वही 'कारण' है, इसी को हेतु या 'कर्त्ता'
कहते हैं ॥ ७१ ॥
करणं पुनस्तद्, यदुपकरणायोपकल्पते कर्तुः कार्याभिनिर्वृत्तौ प्रय-
तमानस्य ॥ ७२ ॥
करण—प्रयत्न करने वाले कर्त्ता के कार्य को पूर्ण करने के लिये जिस
साधन की अपेक्षा होती है, उस साधन को 'करण' कहते हैं ॥७२॥
कार्ययोनिस्तु सा, या विक्रियमाणा कार्यत्वमेवाऽऽपद्यते ॥७३॥