चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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वाली है, ओषधि रूप से ठीक भी है, तो भी शीघ्र ही शुभ-अशुभ फल को
दिखाने वाली हैं। सम्यक् प्रयोग करने में पूर्णरूप में गुणकारी और ठीक तरह
प्रयोग न करने पर दोष का संचय करने वाली होती है। क्योंकि पिप्पली का
निरन्तर उपयोग करने से यह भारी तथा क्लेद उत्पन्न करने वाली होने के
कारण कफ को कुपित करती है। उष्ण होने से पित्त को कुपित करती है। यह
विपरीत गुण होने पर भी वायु का शमन नहीं करती। क्योंकि इन में स्नेह
और उष्णगुण न्यून रहता है। पिप्पली योगवाही है अर्थात् जिस द्रव्य के
साथ मिलाकर देते हैं उसी द्रव्य के समान कर्म करने वाली होती है। इसीलिये
ज्वर, गुल्म, कुष्ठ आदि में इस का उपयोग है। इसलिये पिप्पली का अधिक
उपयोग नहीं करना चाहिये। (पिप्पली का भोजनादि में अति प्रयोग हानि-
कारक है, रसायन में नहीं) ॥ १४ ॥
क्षारः पुनरौष्ण्यतैक्ष्ण्यलाघवोपपन्नः क्लेदयत्यादौ पश्चादुपशो-
षयति । स पचन-दहन-भेदनाथर्मुुपयुज्यते । सोऽतिप्रयुज्यमानः केशा-
क्षिहृदयपुंस्त्वोपघातकरः संपद्यते । ये ह्येनं ग्राम-नगर-निगम-जनपदाः
सततमपुयुञ्जते तेऽन्धान्ध्य-पाण्ड्य-खालित्य-पालित्य-भाजो हृदयापकर्ति-
नश्च भवन्ति, तद्यथा प्राच्याश्चीनाश्च । तस्मात्क्षारं नात्युपयुञ्जीत ॥१५॥
क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण और लवण रस से युक्त होते हैं। ये क्षार पहिले
तो शरीर को क्लिन्न करते हैं और पीछे से शुष्क करते हैं। शोफ आदि
संघात या पिण्डित हुए दोषों को जलाता है, पकाता है और फोड़ता है। इसलिये
पकाने, जलाने और फोड़ने के लिये इस का उपयोग किया जाता है। यही
क्षार यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाये तो केश (बाल), आंख, हृदय और
पुरुषत्व को नाश करता है। इसलिए जिस ग्राम, नगर, बस्ती प्रान्त वा देश
के लोग इस का अधिक उपयोग करते हैं वे अन्धे, नपुंसक, बालों का गिरने
(गंजे) या पकने (पलित) और हृदय के रोग से विशेष रूप से पीड़ित होते
हैं। जैसे-प्राच्य (कामरूप) देश के और चीनो। इसलिये क्षार का अधिक
उपयोग नहीं करना चाहिये ॥१५॥
लवणं पुनरौष्ण्यतैक्ष्ण्योपपन्नमनतिगुर्वनतिस्निग्धमुपक्लेदि विस्रंस-
नसमर्थमन्नद्रव्यरुचिकरं आपातभद्रं प्रयोगसमसादगुण्यात्, दोषसंच-
यानुबन्धं, तद्रोचनपाचनोपक्लेदनविस्रंसनार्थमुपयुज्यते । तदत्यर्थमुप-
युज्यमानं ग्लानि-शैथिल्य-दौर्बल्याभिनिर्वृत्तिकरं शरीरस्य
ह्येनद् ग्राम-नगर-निगम-जनपदाः सततमपुयुञ्जते, ते भूयिष्ठं