चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० १ ] विमानस्थानम् ४८५
तैलं वातं जयति सततमभ्यस्यमानम् । सर्पिः खल्वेवमेव पित्तं जयति,
माधुर्याच्छैत्यान्मन्दवीर्यत्वाच्च, पित्तं ह्यमधुरमुष्णं तीक्ष्णं च । मधु
च श्लेष्माणं जयति, रौक्ष्यात्तैक्ष्ण्यात् कषायत्वाच्च । श्लेष्मा हि स्निग्धो
मन्दो मधुरश्च ॥ ११ ॥
द्रव्य के प्रभाव का अब उपदेश करते हैं। तैल वायु को, घी पित्त को
और मधु कफ को शान्त करने वाले द्रव्य हैं। इन में तैल, स्नेह, उष्ण और
गुरु होने के कारण निरन्तर सेवन करने से वायु को शान्त करता है। क्योंकि
वायु, रूक्ष, शीत और लघु होने से तैल से विपरीत गुण वाला है। दो विरोधी
गुणों के मिश्रण में जो गुण अधिक बलवान् होता है वह निर्बल को जीत लेता
है। इसलिये तैल निरन्तर सेवन से वायु को जीत लेता है। इसी प्रकार घी भी
पित्त को जीतता है, घी, मधुर, शीत एवं मन्दवीर्य है और पित्त अमधुर (कटु,
अम्ल), उष्ण और तीक्ष्ण है। वह भी विपरीत गुण होने से पित्त को जीतता है।
मधु कफ को जीतता (शमन) करता है। मधु रूक्ष, तीक्ष्ण और कषाय है। कफ
स्निग्ध, मन्द और मधुर है, इसलिये मधु कफ से विपरीत गुण वाला है ॥११॥
यच्चान्यदपि किंचिद् द्रव्यमेवं वातपित्तकफेभ्यो गुणतो विपरीतं
विरुद्धं तच्चैताञ्जयत्यभ्यस्यमानम् ॥ १२ ॥
इसी प्रकार अन्य जो कोई द्रव्य गुणों में वात, पित्त, कफ से विपरीत गुण-
वाला होता है, वह निरन्तर सेवन करने से वात, पित्त और कफ को शान्त
करता है ॥ १२ ॥
अथ खलु त्रीणि द्रव्याणि नात्युपयुञ्जीताधिकमन्येभ्यो द्रव्येभ्यः ।
तद्यथा पिप्पलीः, क्षारं, लवणमिति ॥ १३ ॥
इन निम्न-लिखित तीन द्रव्यों को अन्य द्रव्यों की अपेक्षा अधिक सेवन
नहीं करे। १. पिप्पली, २. क्षार और ३. लवण ॥ १३ ॥
पिप्पल्यो हि कटुकाः सत्यो मधुरविपाका गुर्व्यो नात्यर्थं स्निग्धो-
ष्णाः प्रक्लेदिन्यो भेषजाभिमताश्च। ताः सद्यः शुभाशुभकारिण्यो
भवन्ति, आपातभद्राः प्रयोगसमसाद्गुण्यात्, दोषसंचयानुबन्धाः।
सततमुपयुज्यमाना हि गुरुप्रक्लेदित्वाच्छ्लेष्माणमुत्क्लेशयन्ति, औष्ण्या-
त्पित्तं, न च वातप्रशमनायोपकल्पन्ते, अल्पस्नेहोष्णभावात्, योगवाहि-
न्यस्तु खलु भवन्ति । तस्मात्पिप्पलीर्नात्युपयुञ्जीत ॥ १४ ॥
(शुष्क पिप्पली) कटु रस की होकर भी विपाक में मधुर, गुरु, न
न अधिक उष्ण, शरीर के धातुओं को क्लिन्न करने (गलाने)