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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 505 of 639

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Page 505

अ० १ ] विमानस्थानम् ४७७
शिथिल-मांस-शोणिता अपरिक्लैशसहाश्च भवन्ति। तद्यथा बाह्रीक-सौरा-
ष्ट्रिक-सैन्धव-सौवीरकाः, ते हि पयसाऽपि सदा लवणमश्नन्ति, येऽपीह
भूमेरत्यूषरा देशास्तेष्वौषधिवीरुद्वनस्पतिवानस्पत्या न जायन्तेऽल्पतेजसो
वा भवन्ति लवणोपहतत्वात्। तस्माल्लवणं नात्युपयुञ्जीत। ये ह्यतिल-
वणसात्म्याः पुरुषास्तेषामपि खालित्येन्द्रलुप्तपालित्यानि तथा वलयश्चा-
काले भवन्ति ॥ १६ ॥
लवण, उष्ण एवं तीक्ष्ण दोनों गुणों से युक्त है, न तो बहुत गुरु और न
बहुत स्निग्ध होता है। क्लिन्न करने वाला, विस्रंसन (बहाने की) शक्ति वाला,
भोजन में रुचि पैदा करने वाला, भली प्रकार उपयोग करने पर सम्पूर्णरूप
में कल्याणकारी है, ठीक प्रकार से न बरतने से दोषों को कुपित करने वाला
होता है। इस का उपयोग रुचि पैदा करने में, पाचन के लिये, क्लिन्न करने
के लिये और विस्रंसन के लिये प्रयुक्त होता है। इस का उपयोग बहुत अधिक
मात्रा में करने से शरीर में ग्लानि, शिथिलता और दुर्बलता उत्पन्न होती है।
जिस ग्राम, नगर, प्रान्त वा देश के व्यक्ति इस का निरन्तर उपयोग करते हैं,
उन को ग्लानि बहुत रहती है और उन के रुधिर, स्नायु और मांस शिथिल हो
जाते हैं। वे निर्बल होने से क्लेश सहने में असमर्थ रहते हैं। जैसे—बाह्लीक
(बल्ख), सौराष्ट्रिक (गुजराती, काठियावाड़ी), सैन्धव (सिन्धु देशी) और
सौवीर देश के लोग। ये लोग दूध के साथ भी लवण खाते हैं।
ऊषर भूमियों में ओषधि (फलवाली), लता, वनस्पति, फल-पुष्पवाले
वृक्ष उत्पन्न नहीं होते। यदि होते हैं तो वे अल्पबल होते हैं। नमक ही इन की
शक्ति को मार देता है, इसलिये नमक का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिये।
इस के अतिरिक्त जिन को लवण बहुत अनुकूल पड़ता है उन के बाल
शीघ्र गिर जाते हैं, जल्दी सफेद हो जाते हैं, इन्द्रलुप्त का रोग हो जाता है और
युवावस्था में ही चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं ॥ १६ ॥
तस्मात्तेषां तत्सात्म्यतः क्रमेणापगमनं श्रेयः; सात्म्यमपि हि क्रमे-
णोपनिर्वर्त्यमानमदोषमल्पदोषं वा भवति ॥ १७ ॥
इसलिये इन पुरुषों को 'न वेगान्धारणीय' (सूत्र ० ७) अध्याय में बतलाये
हुए क्रम से नमक के इस प्रकार सात्म्य (अनुकूलता) से पृथक् होना ही कल्या-
णकारी है, क्योंकि ऐसे सात्म्य से क्रमपूर्वक हटना दोषरहित अथवा थोड़े दोष-
: ॥ १७ ॥