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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 502 of 639

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Page 502

४८४ चरकसंहिता [ अ० १
द्रव्याणां परस्परेण चोपहतानामन्यैश्च विकल्पैर्विकल्पितानामवयवप्र-
भावानुमानेन समुदायप्रभावतत्त्वमभ्यवसातुं शक्यं । तथायुक्ते हि
समुदाये समुदायप्रभावतत्त्वमेवोपलभ्य ततो रस-द्रव्य-विकार-प्रभाव-
तत्त्वं व्यवस्येत् ॥ ९ ॥
परन्तु इस प्रकार सब स्थानों पर जाना नहीं जा सकता । क्योंकि द्रव्य
सम्पूर्ण विकृति भाव से और असमान परिमाण में परस्पर मिलते । इस मिलनेके
समय एक द्रव्य के द्वारा दूसरा द्रव्य नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार नाना रूपमें
भी द्रव्य बदल जाता है। इन अवस्थाओं में अंशांश विकल्पना द्वारा प्रत्येक
अंश का प्रभाव अनुमान द्वारा जानकर उससे सम्पूर्ण समुदाय रूप द्रव्य का
प्रभाव जानना असम्भव है । इस अवस्था में सम्पूर्ण द्रव्य का सम्पूर्ण प्रभाव
जानना चाहिये ॥ ९ ॥
तस्माद्रसप्रभावतश्च द्रव्यप्रभावतश्च दोषप्रभावतश्च विकारप्रभाव-
तश्च तत्त्वमुपदेक्ष्यामः—तत्रैष रस-द्रव्य-दोष-विकार-प्रभाव उपदिष्टो
भवति ॥ १० ॥
इसलिये चिकित्सा में रस-प्रभाव, द्रव्य-प्रभाव, दोष प्रभाव और विकार-
प्रभाव इन चारों की अपेक्षा है । इससे उन चारों प्रकार के प्रभावों का यथार्थ
उपदेश करेंगे। रसों और द्रव्यों का वात, पित्त और कफ इन दोषों को कुपित
और शान्त करने का प्रभाव रसनिरूपण अध्याय में कह दिया ॥ १० ॥
द्रव्यप्रभावं पुनरुपदेक्ष्यामः—तैलसर्पिर्मधूनि वात-पित्त-श्लेष्म-प्रश-
मनार्थानि द्रव्याणि भवन्ति । तत्र तैलं स्नेहोष्णगौरवोपपन्नतत्वाद्वातं
जयति सततमभ्यस्यमानम् । वातो हि रौक्ष्यशैत्यलाघवोपपन्नो विरुद्ध-
गुणो भवति, विरुद्धगुणसन्निपाते हि भूयसाऽल्पमवजीयते, तस्मा-
फल उत्पन्न करते हैं और कहीं नहीं करते, इसी से उनके सम-समवाय या
विषम-समवाय का अनुमान किया जाता है ।
एक ही पदार्थ के नाना रूप बन जाने से भी उनके गुणों में भेद आता है।
रसों और दोषों का दो प्रकार का समवाय अर्थात् मेल होता है । (१) प्रकृतिके
अनुकूल (२) प्रकृति के अननुकूल । जहां नाना रस मिलकर भी प्रकृति के गुणों
का नाश नहीं करते वैसा मेल 'प्रकृति-सम-समवाय' कहाता है । जहां वे विकृति
होकर मूल पदार्थ के गुणों का नाश कर देते हैं, वहां 'विकृति-विषम-समवाय'
कहाता है, क्योकि वहां विकृति हो जाने से विषम अर्थात् प्रकृति के
रसों का विपरीत मेल होता है ।