चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० १] विमानस्थानम् ४८३
भूयिष्ठा वा शमयन्त्यभ्यस्यमानाः—इत्येतद्व्यवस्थाहेतोः षट्त्वमुपदि-
श्यते रसानां परस्परेणासंसृष्टानां, त्रित्वं च दोषाणाम्। संसर्गविकल्प-
विस्तरो ह्येषामपरिसंख्येयो भवति, विकल्पभेदापरिसंख्येयत्वात् ॥८॥
रस और दोषों के सन्निपात होने पर जो जो रस दोषों के समान गुण वाले
तथा समान स्वभाव के होते हैं वे उन दोषों को बढ़ाते हैं, विशेषतः जब ये
रस नित्य प्रति निरन्तर सेवन किये जाते हैं। इसी प्रकार जो रस जिन दोषों
के साथ विपरीत गुण और विपरीत स्वभाव वाले होते हैं वे सेवन करने पर
उन दोषों को शमन करते हैं। इस सामान्य और विपर्यय के कारण जो
वृद्धि और ह्रास का नियम है उस की दृष्टि से परस्पर न मिले हुए रस छः
तथा परस्पर न मिले हुए दोष तीन हैं। इन्हीं में यह उपरोक्त व्यवस्था संभव
है। इन के पारस्परिक संसर्ग में यह संभव नहीं, क्योंकि इन रसो और दोषों
का परस्पर संयोग होने से वे असंख्य हो जाते हैं। क्योंकि विकल्पों के भेद
असंख्य हैं ॥८॥
तत्र खल्वनेकरसेषु द्रव्येष्वनेकदोषामकेषु च विकारेषु रस-
दोषप्रभावमेकैकत्वेनाभिसमीक्ष्य ततो द्रव्यविकारयोः प्रभावतत्त्वं व्यव-
स्येत्।
इन में अनेक रसवाले द्रव्यों में और अनेक दोषों को प्रारम्भ करने वाले
विकारों में रस प्रभाव और दोषों के प्रभाव को पृथक् पृथक् रूप से देखकर,
रसविकार द्रव्य-विकार के प्रभाव का निश्चय करे। अर्थात् जहां पर एक रस
और एक ही दोष हो वहां पर रस और दोष के प्रभाव से द्रव्य-विकार के प्रभाव
का ज्ञान हो ही जाता है; परन्तु जहां पर अनेक रस और अनेक दोष मिले हों
वहां पर भी छः रसों और तीन दोषों के प्रभाव का निश्चय कर लेना चाहिये।
नत्वेवं खलु सर्वत्र। न हि १विकृति-विषम-समवेतानां नानात्मकानां
१. रस का विकृति-समवाय जैसे मधुर भात में। मधुर रस स्वभाव से
स्नेहकारी और वृष्य है, परन्तु द्रव्य के विकार रूप भात में वह मधुरता वह गुण
नहीं करती। भात स्निग्ध और वृष्य नहीं है।
रसों का विषम समवाय अर्थात् विषम मेल जैसे तिल में कषाय, कटु, तिक्त
और मधुर चार रस मिले हैं। यदि वे बिना मात्रा के मिले न होते तो तिल भी
वात और श्लेष्मा को हरने वाला या त्रिदोष-हारी होता, परन्तु तिल में रसों का
[?] अर्थात् विषम रूप से मेल है। अतः वह वैसा नहीं है, प्रत्युत
[?] को उत्पन्न करता है। पदार्थों में कहीं तो ये रस अपना ठीक २