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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 352 of 639

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Page 352

३३४ चरकसंहिता [ अ० २७
नहीं करता, कफ को उत्पन्न नहीं करता । उक्त गुणों के कारण मनुष्यों के मांस
के समान धातुओं वाला है, जो गुण मनुष्य के धातुओं के हैं, वे ही गुण बकरी
के मांस के हैं इसलिये पुष्टिकारक है । मेढ़ का मांस मधुर, ठण्डा और भारी
है । मधुर और शीतल होने से पित्तनाशक१ है । बकरी और मेढ़ के मिश्रित२
स्थान में चरने से मांस का गुण अनिश्चित है, फिर भी सामान्य रूप से कह
दिया । और जो मांस अपने गुणों में विशेषता रखते हैं उन को कहते हैं ।
मोर का मांस—आंख, कान, मेधा, अग्नि, तारुण्य, वर्ण, स्वर और आयु
के लिये हितकारी; बलकारक, वायुनाशक और मांस एवं शुक्रवर्धक है । हंस
का मांस गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर, स्वर, वर्ण, बल को बढ़ाने वाला, बृंहण
पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक और वातनाशक है । कुक्कुट का मांस—स्निग्ध, उष्ण,
वृष्य, पुष्टिकारक, स्वर को अच्छा करने वाला, बलकारक और विशेषतः वात-
नाशक तथा पसीना लाता है । तित्तिर पक्षी का ( मरुभूमि और आनूप देश
दोनों स्थानों में रहने से ) मांस मध्यम गुरु, मध्यम उष्ण और मध्यम मधुर है,
वातप्रधान सन्निपात को शीघ्र शान्त करता है । कपिंजल पक्षी का मांस—ठण्डा,
मधुर और लघु होने से वात का जोर कम होने पर रक्तयुक्त पित्त या रक्तयुक्त
कफ विकार में प्रशस्त है । लावा ( बटेर ), कषाय, मधुर, लघु, अग्निवर्धक,
सन्निपात को शमन करने वाले और विपाक में कटु हैं ।
घर में पाले हुए कबूतरों का मांस—कषाय, विशद, शीत, रक्तपित्तनाशक,
मधुर विपाक वाला होता है । और जो कबूतर जंगल में रहते हैं, उन का मांस
इन से कुछ हल्का और शीतल, संग्राही और मूत्र को कम करने वाला होता है।
तोते का मांस—कषाय, विपाक में अम्ल, रूक्ष, ठण्डा, शोष, क्षय, दमा, में
हितकारी, स्तम्भक, हल्का, दीपक होता है । खरगोश का मांस—कषाय, स्वच्छ,
रूक्ष, शीतल, विपाक में कटु, हल्का, मधुर और हीनवायु सन्निपात में प्रशस्त
है । चिड़िया का मांस—मधुर, स्निग्ध, शक्ति व वीर्य को बढ़ाने वाला, सन्नि-
१. सुश्रुत में भी कहा है—
"बृंहणं मांसमौरभ्रं पित्तश्लेष्मापहं गुरु" ॥
२. मिश्र-गोचरत्वात्—बकरी या मेढ़ आनूप और मरु दोनों प्रदेशों में
रहती है । इसलिये इन की योनि निश्चित नहीं है । तित्तिर पक्षी धन्व और
आनूप किसी एक स्थान पर रहता है, ऐसा निश्चित करके कहा जा सकता है,
इसलिये वह इस श्रेणी में नहीं है ।