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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 353 of 639

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Page 353

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३३५
पात को शान्त करने वाला और विशेषतः वायुनाशक है' । शिवा ( गीदड़ )
का मांस—मधुर रस, मधुर विपाक, त्रिदोषनाशक है । काले हरिण का
मांस—हल्का, मल मूत्र को रोकने वाला और शीतल होता है। गोह का
मांस—विपाक में मधुर, कषाय, कटु रस, वात-पित्तनाशक, पुष्टिकारक, बल-
वर्धक है। शल्लकी का मांस—मधुर अम्लरस, विपाक में कटु, त्रिदोषनाशक,
श्वास-कास नाशक है।
मछलियों का मांस—गुरु, उष्ण, मधुर, बलकारक, पुष्टिकारक, वायुनाशक,
स्निग्ध, वृष्य, वीर्यवर्धक और बहुत से दोषों को उत्पन्न करने वाला है। रोहू
मछली का मांस—शैवाल ( सरवाल ) का भोजन करने से, कभी न सोने से,
दीपनीय, अग्निवर्धक, पचने में लघु और बहुत बल देने वाला है।
सूअर का मांस—स्नेहन, बृंहण, वीर्यवर्धक, थकान और वायुनाशक
बलकारक, रुचिकर और बहुत पसीना लाने वाला है। कछुए का मांस—बल-
कारक, वातनाशक, वीर्यवर्धक, आंखों के लिये हितकारी, बलवर्धक, मेधा, बुद्धि
और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला, आयु के लिये हितकारी, शोषनाशक है।
गाय का मांस—केवल वात रोगों में, पीनस में, विषम ज्वर में, सूखी खांसीमें,
थकान में, अग्नि या मांस के बहुत अधिक क्षय हो जाने में हितकारी है। भैंस
का मांस—स्निग्ध, उष्ण, मधुर, वीर्यवर्धक, भारी, पुष्टिदायक, शरीर में दृढ़ता,
पुष्टि, उत्साहवर्धक और नींद लाने वाला है। हंस ( जिन के पांव और चोंच
काले होते हैं ) चकोर, बत्तख, मोर और चिड़ियां इनके अण्डे वीर्य की क्षीणता
में, कास रोग में, हृदय रोग में, क्षत (उरःक्षत) में हितकारी हैं। ये अण्डे
मधुर अविपाकी और तत्काल बलदायक हैं। खाद्य पदार्थ में शरीर को पुष्ट
करने के लिये मांस से बढ़कर और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। यह तीसरा मांस-
वर्ग कह दिया ॥ ५६-८६॥
इति मांसवर्गः ।
अथ शाकवर्गः ।
पाठा शुषा शटीशाकं वास्तुकं सुनिषण्णकम् ।
विद्याद् ग्राहि त्रिदोषघ्नं भिन्नवर्चस्तु वास्तुकम् ॥ ८७ ॥
त्रिदोषशमनी वृष्या काकमाची रसायनी ।
नात्युष्णशीतवीर्या च भेदिनी कुष्ठनाशनी ॥ ८८ ॥
राजक्षवकशाकं तु त्रिदोषशमनं लघु ॥
वृष्य के लिये—"तृप्तिं चटकमांसानां गत्वा योऽनु पिबेत्पयः ।"