चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० २४ ] सूत्रस्थानम् २६६
अन्धकार का अधिक आना, खाज, कोठ, फुन्सियां, कुष्ठ, चर्मदल ( चर्म फटने
का विशेष रोग ), ये सब रोग रक्त के आश्रित होते हैं। जो रोग शीत, उष्ण,
स्निग्ध, रूक्ष आदि उपक्रमों (चिकित्सा) द्वारा भली प्रकार साध्य होने पर भी
सिद्ध न हों तो इन रोगों को रक्तजन्य समझना चाहिये ॥ ११-१७ ॥
कुर्याच्छोणितरोगेषु रक्तपित्तहरीं क्रियाम्।
विरेकमुपवासं वा स्रावणं शोणितस्य वा ॥ १८ ॥
बलदोषप्रमाणाद्वा विशुद्ध्या रुधिरस्य वा।
रुधिरं स्रावयेज्जन्तौराशयं प्रसमीक्ष्य वा ॥ १६ ॥
चिकित्सा—रक्तजन्य रोगों में रक्त-पित्तनाशक क्रिया करनी चाहिये
अर्थात् विरेचन, उपवास, अथवा रक्त का मोक्षण करना चाहिये । बल की
मात्रा और रक्तजन्य व्याधि के स्वरूप की मात्रा, जितने रक्त के निकालने से
रक्त शुद्ध हो जाय इतने दूषित रक्त के स्थान को देखकर मनुष्य का रक्त ( थोड़ा
या बहुत ) निकालना चाहिये ॥ १८-१६ ॥
अरुणाभं भवेद्वाताद्विशदं फेनिलं तनु ।
पित्तात्पीतासितं रक्तं स्यात्त्यौष्ण्याच्चिरेण च ॥ २० ॥
ईषत्पाण्डु कफाद् दुष्टं पिच्छिलं तन्तुमद्दनम् ।
द्विदोषलिङ्गं संसर्गात् त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् ॥ २१ ॥
वायु से दूषित रक्त लाल रंग का, विशद स्वच्छ, झागदार पतला होता है।
पित्त से दूषित रक्त पीला, काला, घन ( सान्द्र ), बहुत गरम और जड़ होता
है। कफ से दूषित रक्त थोड़ा पीला, पिच्छिल, तन्तु ( तागे जैसा ) और घन
ठोस होता है। दो दोषों के संसर्ग होने से दो दोषों के लक्षण होते हैं और तीन
दोषों के मिलने से तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २०-२१ ॥
तपनीयेन्द्रगोपाभं पद्मालक्तकसन्निभम् ।
गुञ्जाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥ २२ ॥
नात्युष्णशीतं लघु दीपनीयं रक्तेऽपनीते हितमन्नपानम् ।
तदा शरीरं ह्यनवस्थितासृगग्निविशेषेण च रक्षितव्यः ॥ २३ ॥
प्रसन्नवर्णेन्द्रियमिन्द्रियार्थानिच्छन्तमव्याहतपक्तृवेगम् ।
सुखान्वितं पुष्टिबलोपपन्नं विशुद्धरक्तं पुरुषं वदन्ति ॥ २४ ॥
तदा तु रक्तवाहिनि रससंज्ञावहानि च ।
पृथक् पृथक् समस्ता वा स्रोतांसि कुपिता मलाः ॥ २५ ॥
विशुद्ध रक्त का लक्षण—तपे हुए स्वर्ण ( कुन्दन ) के समान, बीर-