चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
Page 288 of 639
Read in context२७० चरकसंहिता [ अ० २४
बहूटी के रंग का, लाल कमल या माहवर (जिसे औरतें पैर के तलुवों पर
लगाती हैं) के समान रंग, लाल रत्ती के रंग के समान विशुद्ध रक्त का रंग
होता है । रक्त मोक्षण करने के उपरान्त न तो बहुत गरम और न बहुत ठण्डा,
लघु एवं दीपक (अग्नि को बढ़ाने वाला), खान-पान सेवन करना चाहिये ।
रक्त मोक्षण होने से शरीर का रक्त अनवस्थित अस्थिर होता है (रक्त का वेग
बहुत चंचल होता है), इसलिये अग्नि की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये,
इसको मन्द नहीं होने देना चाहिये ।
विशुद्ध रक्तवाले पुरुष का लक्षण—जिस पुरुषका वर्ण कान्ति और
इन्द्रियां निर्मल हों, इन्द्रियां अपने विषयों की इच्छा करें, जाठराग्नि का बलू तथा
मल-मूत्र आदि की प्रवृत्ति बिना रुकावट के हों, मनुष्य का मन आनन्द अनुभव
करे, प्रसन्नता और बल दीखता हो, उस पुरुष का रक्त शुद्ध जानना चाहिये ॥२५॥
मलिनाहारशीलस्य रजोमोहावृतात्मनः ।
प्रतिहत्यावतिष्ठन्ते जायन्ते व्याधयस्तदा ॥ २६ ॥
मद-मूर्च्छाय-संन्यासास्तेषां विद्याद्विचक्षणः ।
तथोत्तरं बलाधिक्यं हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ॥ २७ ॥
दुर्बलं चेतसः स्थानं यदा वायुः प्रपद्यते ।
मनो विक्षोभयन् जन्तोः संज्ञां संमोहयेत्तदा ॥ २८ ॥
पित्तमेवं कफश्चैवं मनो विक्षोभयन्नृणाम् ।
संज्ञां नयत्याकुलतां विशेषश्चात्र वक्ष्यते ॥ २६ ॥
सक्ताल्पद्रुतताभाषं चलस्खलितचेष्टितम् ।
विद्याद्वातमदाविष्टं रूक्षश्यावारुणाकृतिम् ॥ ३० ॥
सक्रोधपरुषाभाषं संप्रहारकलिप्रियम् ।
विद्याद् पित्तमदाविष्टं रक्तपीतासिताकृतिम् ॥ ३१ ॥
स्वल्पसंबन्धवचनं तन्द्रालस्यसमन्वितम् ।
विद्यात्कफमदाविष्टं पाण्डुं प्रध्यानातत्परम् ॥ ३२ ॥
सर्वाण्येतानि रूपाणि सन्निपातकृते मदे ।
जायते शाम्यति त्वाशु मदो मद्यमदाकृतिः ॥ ३३ ॥
यश्च मद्यमदः प्रोक्तो विषजो रौधिरश्च यः ।
सर्व एते मदा नर्ते वातपित्तकफत्रयात् ॥ ३४ ॥
मलिन आहार खाने वाले एवं रज और तम से आवृत मन वाले के कुपित
वात, पित्त, कफ दोष पृथक् पृथक् या मिलकर रसवाही, रक्तवाही या संज्ञावाही