बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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परीक्षा में पाठ्यत्वेन निर्धारित है; परन्तु इसके मूल श्लोकों के अत्यन्त कठिन होने के
कारण अर्थज्ञान के लिये विशेष प्रतिभा की आवश्यकता है। इसकी संस्कृत में भट्टोत्पल्लीय
टीका बहुत अच्छी है; किन्तु इस टीका द्वारा सर्वसाधारण के लिए मूल श्लोकों का
अर्थ जानना कठिन था; अतः जनसाधारण के उपकारार्थ मैंने इस ग्रन्थ की सरल
परिशुद्ध हिन्दी टीका की है। आशा है कि पण्डितगण इस ‘विमला’ हिन्दी टीकायुत
अनुपम ग्रन्थ को देखकर मेरे परिश्रम को सफल करेंगे।
काशी के प्रसिद्ध प्रकाशन-संस्थान चौखम्बा संस्कृत सीरीज एवं ‘चौखम्बा विद्याभवन’
के अध्यक्ष श्रीमान् बाबू जयकृष्णदास जी ने तत्परतापूर्वक शीघ्र ही इस ग्रन्थ को
प्रकाशित कर दिया; अतः वे धन्यवाद के पात्र हैं।
अवसान में सविनय करबद्ध प्रार्थना यही है कि अनवधानवश अथवा मुद्रणदोष
से कहीं त्रुटि रह गई हो तो पक्षपातरहित बुद्धि से पण्डितगण उसे सुधार कर मुझे भी
सूचित करें, जिससे कि पुनः अग्रिम संस्करण में उसको ठीक कर उन सज्जनों के
सामने उपस्थित कर सकूँ। कहा भी है—
गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः।।
दुर्जनगण अनेक प्रकार से प्रार्थना करने पर भी अपनी आदत नहीं छोड़ सकते हैं,
अतः उनसे प्रार्थना करना व्यर्थ है; क्योंकि—
खलो मृगयते दोषं गुणपूर्णेषु वस्तुषु।
वने पुष्पफलाकीर्णे पुरीषमिव सूकरः।।
संवत्-२०१५, विदुषां वशंवदः
वसन्तपञ्चमी श्री अच्युतानन्द झा