बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)
Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary
आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा) द्वारा
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परिवर्तनों के आधार पर अपनी भविष्यवाणियों में सुधार करते रहते हैं। आचार्य वराह-
मिहिर ने कहा है कि 'यदि दैवज्ञ प्रतिदिन आकाशलक्षण तथा वृष्टिलक्षण का अवलोकन
सावधान चित्त से करता रहे तो उसकी भविष्यवाणी मुनियों की वाणी की तरह सदैव
सत्य होगी।'¹
यद्यपि मौसम विज्ञान अत्यन्त दुरूह है; फिर भी संहिताओं से इसे अत्यन्त सरल
ढंग से सामान्य कृषक के भी समझने-योग्य बतलाया गया है; ताकि कृषक मौसम के
ज्ञान से अपनी कृषि को सुरक्षित रख सके। भारतीय मनीषियों ने कृषि को अत्यधिक
महत्त्वपूर्ण बतलाया है। कृषि के साथ वायु-वृष्टि का सम्बन्ध होने से दोनों पर गहन
विचार किया है। कृषि के लिये वृष्टि आवश्यक होती है; इसलिये दोनों का महत्त्व
बतलाते हुये कहा है कि—
'समस्त कृषि वृष्टि के आधीन है। प्राणी मात्र का जीवन भी वृष्टि ( जल ) पर ही
आश्रित है। अतः सर्वप्रथम वृष्टि का ज्ञान करना चाहिये।'²
इतना ही नहीं; कृषि की प्रशंसा में अन्न के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुये कहा
गया है कि—कानों में, गलें में तथा हाथों में भले ही रत्नजटित स्वर्ण आभूषण हों;
किन्तु यदि अन्न नहीं होगा तो उपवास ही करना पड़ेगा।'³ अर्थात् क्षुधा की शान्ति केवल
अन्न से ही होगी, स्वर्ण और रत्नों से नहीं। अन्न का साधन एकमात्र कृषि है। इसीलिये
शास्त्रकारों ने कृषि तथा गाय और बैलों के संरक्षण पर विशेष बल दिया है। कृषि की
गुणवत्ता, बीज का संरक्षण, फलों का उत्पादन, वृक्षों और फसलों के रोगों का निदान
और चिकित्सा आदि ऐसे अनेक विषय हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध प्राणीमात्र से है और
संहिताओं में उनका विशद् प्रतिपादन किया गया है।
इनके अतिरिक्त अन्तरिक्षसम्बन्धी अनेक आश्चर्यजनक घटनाओं का भी विवेचन
संहिताग्रन्थों में मिलता है। कभी-कभी कुछ घटनायें आज के वैज्ञानिकों को भी आश्चर्य-
चकित कर देती हैं। इस प्रकार की अनुत्तरित जिज्ञासाओं की भी चर्चा संहिताओं में
यत्र-तत्र मिल जाती है। उदाहरण के रूप में एक घटना का उल्लेख कर देना आवश्यक
समझता हूँ। जब अन्तरिक्षयात्री 'नील आर्मस्ट्रांग' चन्द्रतल पर अवतरण करने जा रहा
१. दैवविदविहितचित्तो द्युनिशं यो गर्भलक्षणे भवति।
तस्य मुनेरिव वाणी न भवति मिथ्याम्बुनिर्देशे।। ( बृ० सं०, गर्भल०-३ )
२. वृष्टिमूला कृषिः सर्वा वृष्टिमूलञ्च जीवनम्।
तस्मादादौ प्रयत्नेन वृष्टिज्ञानं समाचरेत्।। ( कृ० पा०-२.१ )
३. कण्ठे कर्णे च हस्ते च सुवर्णं विद्यते यदि।
उपवासस्तथापि स्यादन्नाभावेन देहिनाम्।। ( कृ० पा०-१.५ )
अन्नं हि धान्यसञ्जातं धान्यं कृष्या विना न च।
तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्।। ( कृ० पा०-१.७ )
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