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बृहत्संहिता: प्रथम भाग (आचार्य वराहमिहिर - विमला हिन्दी व्याख्या, पं. अच्युतानन्द झा)

Brihat Samhita Vol 1 with Vimala Hindi Commentary

by आचार्य वराहमिहिर (टीकाकार: पं. अच्युतानन्द झा)

DevanagariHindipublished728 pages

प्रारंभिक मंगलाचरण एवं आदित्य-चन्द्रचाराध्याय (अध्याय १-५)

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वराहमिहिरविरचिता
बृहत्संहिता
व्याख्याकार
पं. अच्युतानन्द झा

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।। श्रीः ।।
विद्याभवन प्राच्यविद्या ग्रन्थमाला
१५६
✤
वराहमिहिरकृता
बृहत्संहिता
‘भट्टोत्पलविवृति’ समन्वित ‘विमला’ हिन्दीव्याख्यायुता
( पूर्वार्द्धा )
व्याख्याकारः
शर्मोपाह्व पं० अच्युतानन्द झा
ज्योतिषाचार्य-साहित्याचार्य-पोष्ठाचार्यद्युपाधिविभूषितः
प्राक्कथनलेखकः
प्रो० रामचन्द्रपाण्डेयः
सङ्कायप्रमुखचरः
संस्कृतविद्याधर्मविज्ञानसङ्कायः
काशी हिन्दू विश्वविद्यालयः
चौखम्बा विद्याभवन
वाराणसी
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प्रकाशक
चौखम्बा विद्याभवन
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चौक (बैंक ऑफ बड़ोदा भवन के पीछे)
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दूरभाष : 0542-2420404
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प्राक्कथन
बृहत्संहिता : एक दृष्टि
वेदस्य निर्मलं चक्षुः ज्योतिषशास्त्रमकल्मषम्।
यह सूक्ति ज्योतिष शास्त्र के वेदाङ्गत्व एवं उसके निर्दुष्ट स्वरूप को परिभाषित
करती है। ज्योतिष वेदपुरुष का निर्मल चक्षु है। यहाँ केवल चक्षु ही नहीं; अपितु 'निर्मल
चक्षु' कहा गया है। साधारण चक्षु की दृष्टि भी सामान्य होती है तथा मलिन चक्षु की
दृष्टि अस्पष्ट एवं धूमिल होती है। निर्मल (दोषरहित) चक्षु ही किसी भी वस्तु को
यथार्थ रूप में देख सकता है तथा उसका यथार्थ प्रतिपादन कर सकता है। इसीलिये
इसे वेदपुरुष का निर्मल चक्षु कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र भी देखने का ही कार्य करता
है। 'गणित' और 'वेध' नामक इसकी दो आँखें हैं। गणितागत परिणाम भी दृश्य होते
हैं एवं वेधोपलब्ध परिणाम भी दृश्य होते हैं। जब दोनों दृष्टियों से प्राप्त परिणामों में
साम्यता हो जाती है तो ज्योतिष शास्त्र का आकल्मषत्व तथा नेत्रों का निर्मलत्व—दोनों
ही प्रमाणित हो जाता है। सर्वविदित है कि ज्योतिष वेध द्वारा गणितागत परिणामों का
परीक्षण कर उसे पुष्ट करता है; इसीलिये कमलाकर भट्ट ने निःसङ्कोच यह उद्घोष कर
दिया कि 'इस शास्त्र में दृष्ट विरुद्ध मुनि द्वारा कहा गया सिद्धान्त मान्य नहीं है।' १
ज्योतिष अपनी प्रामाणिकता के लिये स्वयं को ही उत्तरदायी मानता है।
वेदाङ्ग ज्योतिष में आचार्य लगध ने इसे 'कालविधान' शास्त्र कहा है। २ काल की
अवधारणा एवं उनके भेदों का प्रतिपादन ज्योतिष शास्त्र ने ही किया है। काल के प्रमुख
नियामक सूर्य और चन्द्रमा हैं, जो ज्योतिष शास्त्र के साक्षी माने जाते हैं। ३
इनकी गतियों के परिणामस्वरूप या इनसे उत्पन्न काल ही हमारे उपयोग में आते
हैं। यद्यपि इनके अतिरिक्त पृथ्वी, बृहस्पति और नक्षत्रों के आधार पर भी कालगणना
की जाती है, जो कि हमारे दैनिक व्यवहार में हैं। इन सभी कालमानकों, इनसे उत्पन्न
कालमानों तथा उनके भेदोपभेदों को परिभाषित करने का एकमात्र श्रेय ज्योतिष शास्त्र
को ही जाता है। वेदाङ्ग होने के कारण इसकी प्राथमिकता एवं प्राचीनता स्वयमेव सिद्ध
है। यह वेदविज्ञान है; अतः जब हम विज्ञान की चर्चा करते हैं तो सर्वप्रथम दृष्टि के
१. सुयुक्ता न मुन्युक्तिरप्यत्र शास्त्रे भवेत् कार्यवर्षस्य या हग्निरुद्धा। (सि० त० वि०)
२. वेदास्तावद्यज्ञकर्मप्रवृत्ता यज्ञा प्रोक्तास्ते तु कालाश्रयेण।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान्।। (वे० ज्यो०)
३. अप्रत्यक्षाणि शास्त्राणि विवादस्तत्र केवलम्।
प्रत्यक्षं ज्योतिषं शास्त्रं चन्द्रार्कौ यत्र साक्षिणौ।।
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( ४ )
समक्ष ज्योतिष शास्त्र ही आता है। यद्यपि आज 'विज्ञान' शब्द कुछ विशिष्ट विषयों का
ही परिचायक-मात्र रह गया है। भारतीय विद्याओं में विशिष्ट ज्ञान-प्रतिपादक शास्त्र को
'विज्ञान' कहा गया है। दोनों में से हम किसी भी अर्थ को ग्रहण करें तो ज्योतिष शास्त्र ही
कनिष्ठिकाधिष्ठित होगा। आज का 'विज्ञान' शब्द इंगलिश के 'साइन्स' ( Science )
शब्द का रूपान्तर है। आधुनिक विज्ञान के अन्तर्गत—गणित, भूगोल, खगोल, भूगर्भ,
ऋतु विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भौतिकी, रसायन आदि विषय परिगणित हैं। इन विज्ञानों
के विकास का इतिहास सत्रहवीं शताब्दी के बाद का ही है; किन्तु आज से सहस्राब्दी
पूर्व भारतीय विद्याओं में गणित, भूगोल, खगोल, कृषि आदि विषयों का विवेचन
देखने को मिलता है। यह भी सत्य है कि आज आधुनिक विज्ञान की सभी शाखायें
अनुसन्धान एवं विविध प्रयोगों द्वारा अहर्निश विकासोन्मुख हैं तथा भारतीय ज्ञान-
विज्ञान का विकास समुचित अनुसन्धान एवं प्रयोगों के अभाव के कारण शताब्दियों से
अवरुद्ध है। सिद्धान्त के क्षेत्र में तो कुछ कार्य हुये भी; किन्तु संहिता के क्षेत्र में कोई
उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ है। ग्यारहवीं शताब्दी के बाद भी ज्योतिष के खगोल-
विज्ञान में प्रगति हुई है; किन्तु वह भी विगत शताब्दी से अवरुद्धप्राय है। खगोल के
साथ-साथ अन्य विज्ञान की शाखाओं का भी अवलोकन करना चाहें तो हमें एकमात्र
अन्तिम प्रतिनिधि ग्रन्थ के रूप में आचार्य वराहमिहिर-विरचित 'बृहत्संहिता' ही उपलब्ध
होती है। आचार्य वराहमिहिर ने १०७ प्रकरणों में अतिसंक्षेप में लगभग ९८ विषयों
का प्रतिपादन किया है, जो अपने-आपमें अद्वितीय संकलन है, जो कि त्रिस्कन्ध ज्योतिष
के मर्मज्ञ आचार्य वराहमिहिर-जैसे दैवज्ञ से ही सम्भव था। उसके बाद इस स्तर की
कोई अन्य रचना प्रकाश में नहीं आई। यद्यपि आचार्य वल्लालसेन ने भी इसी प्रकार
के संकलन का एक सराहनीय प्रयास अपने ग्रन्थ 'अद्भुतसागर' में किया है; परन्तु
बृहत्संहिता की महत्ता आज भी अद्वितीय है। संहिता स्कन्ध के प्रतिनिध ग्रन्थ के रूप
में बृहत्संहिता की ही प्रतिष्ठा है। इस ग्रन्थ के महत्त्व-प्रतिपादन के पूर्व ज्योतिष शास्त्र
का संक्षिप्त परिचय उन जिज्ञासु पाठकों के लिये देना उचित समझता हूँ, जो कि
भारतीय ज्योतिष शास्त्र को यथार्थ रूप में जानना चाहते हैं।
भारतीय ज्योतिष ( जिसे आज 'वैदिक ज्योतिष' के नाम से जाना जाता है )
मुख्यतः तीन भागों में विभक्त है—सिद्धान्त, संहिता एवं होरा।
सिद्धान्त ज्योतिष—काल की सूक्ष्मतम इकाई त्रुटि से लेकर महत्तम इकाई
( प्रलयकाल ) तक कालगणना, विभिन्न प्रकार ( सौर-चान्द्र-सावन आदि ) के कालों
के भेद, ग्रहों की गतियों का निरूपण, पृथ्वी एवं ग्रहों की अन्तरिक्ष में स्थिति का
विवेचन, अङ्कगणित, बीजगणित, दिक्-देश-काल का विवेचन तथा इनके साधनोपयोगी
यन्त्रों का वर्णन, ग्रहगणित से सम्बन्धित उदय-अस्त-युति-ग्रहण आदि का विवेचन
सिद्धान्त ज्योतिष के अन्तर्गत आता है।
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( ५ )
संहिता—संहिता का परिचय देते हुये आचार्य वराहमिहिर ने लिखा है कि 'अनेक
प्रकार के विषयों से परिपूर्ण ज्योतिष तीन स्कन्धों में प्रतिष्ठत है, जिसमें ( सिद्धान्त
और होरा के विषयों को छोड़कर शेष ) समग्र विषयों का विवेचन किया गया हो, उसे
'संहिता' कहते हैं।' वस्तुतः संहिता स्कन्ध के विषय असीमित हैं। इन्हें विस्तारपूर्वक
बताते हुये 'संहितापदार्थाः' नाम से आचार्य ने उन विषयों का निर्देश किया है, जिनका
विवेचन संहिता में किया गया है।
संहिता का क्षेत्र भूगर्भ से अन्तरिक्ष तक है। इनके अन्दर होने वाले परिवर्तनों एवं
उनके परिणामों का निरूपण संहिता स्कन्ध करता है। संहिता के एक-एक अध्याय
आज के विज्ञान के एक-एक विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
होरा—जनसामान्य से सम्बन्धित होने के कारण यह लोकप्रिय स्कन्ध है। प्राणी
के आधानकाल से प्रसवकाल तक तथा प्रसव से अवसानकाल तक जीवन के सभी
शुभाशुभ पक्षों का विवेचन इस स्कन्ध के अन्दर किया गया है। आधानकालिक अथवा
जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति के आधार पर उनके परिणामों का विवेचन किया गया है।
इस प्रकार त्रिस्कन्ध ज्योतिष ब्रह्माण्डीय तथा मानवसम्बन्धी अनेक समस्याओं का
विश्लेषण करता है। कुछ आचार्यों ने मुहूर्त्त और शकुन को पृथक् स्कन्ध कहकर पञ्च
स्कन्धात्मक ज्योतिष शास्त्र बतलाया है; किन्तु यह समीचीन नहीं है; क्योंकि विभिन्न
शकुन और पशु-पक्षियों की चेष्टाओं का निरूपण, अङ्गविद्या तथा वास्तु आदि का
निरूपण संहिताओं में उपलब्ध है; अतः इनकी पृथक् सत्ता को स्वीकार करना संहिता
को खण्डित करना होगा।
इन तीनों स्कन्धों के प्रतिपाद्य विषय आज के विज्ञान की अनेक आवश्यकताओं
की पूर्ति पुराकाल से करते आ रहे हैं। आज विज्ञान के विकास ने इन भारतीय विद्याओं
की महत्ता को परिपुष्ट किया है।
विगत कुछ वर्षों से जनमानस वास्तुशास्त्र की ओर उन्मुख हुआ है; जबकि संहिताओं
में वास्तुशास्त्र का विशद विवेचन किया गया है। शास्त्रों की रचना मानवमात्र के कल्याण
की दृष्टि से होती है। आवश्यकता है, उनके अवलोकन एवं मनन की। संहिताओं के
अन्तर्गत अनेक विषय ऐसे हैं, जिनकी आवश्यकता जनसामान्य को होती है। उदाहरण
के रूप में मौसम विज्ञान को ही लिया जा सकता है। आज करोड़ों रुपये व्यय करने
के बाद भी मौसम विज्ञान २४-३६ घण्टे पूर्व ही वृष्टि, आँधी और तूफान की पूर्व-
सूचना दे पाता है; जबकि भारतीय ज्योतिष ग्रह-नक्षत्रों की गति-स्थिति के आधार पर
लगभग वर्ष भर की मौसमसम्बन्धी भविष्यवाणी कर देता है। त्रुटियाँ दोनों ही पक्षों में
होती हैं। दोनों ही विधाओं में भविष्यवाणियाँ शत-प्रतिशत सत्य नहीं होती हैं। इस
त्रुटि का कारण संहिता शास्त्र बतलाता है—सद्यः होने वाले परिवर्तनों को। इन परिवर्तनों
को 'सद्यो वृष्टिलक्षण' के नाम से प्रतिपादित किया है। आधुनिक विज्ञान भी इन तात्कालिक
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( ६ )
परिवर्तनों के आधार पर अपनी भविष्यवाणियों में सुधार करते रहते हैं। आचार्य वराह-
मिहिर ने कहा है कि 'यदि दैवज्ञ प्रतिदिन आकाशलक्षण तथा वृष्टिलक्षण का अवलोकन
सावधान चित्त से करता रहे तो उसकी भविष्यवाणी मुनियों की वाणी की तरह सदैव
सत्य होगी।'¹
यद्यपि मौसम विज्ञान अत्यन्त दुरूह है; फिर भी संहिताओं से इसे अत्यन्त सरल
ढंग से सामान्य कृषक के भी समझने-योग्य बतलाया गया है; ताकि कृषक मौसम के
ज्ञान से अपनी कृषि को सुरक्षित रख सके। भारतीय मनीषियों ने कृषि को अत्यधिक
महत्त्वपूर्ण बतलाया है। कृषि के साथ वायु-वृष्टि का सम्बन्ध होने से दोनों पर गहन
विचार किया है। कृषि के लिये वृष्टि आवश्यक होती है; इसलिये दोनों का महत्त्व
बतलाते हुये कहा है कि—
'समस्त कृषि वृष्टि के आधीन है। प्राणी मात्र का जीवन भी वृष्टि ( जल ) पर ही
आश्रित है। अतः सर्वप्रथम वृष्टि का ज्ञान करना चाहिये।'²
इतना ही नहीं; कृषि की प्रशंसा में अन्न के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुये कहा
गया है कि—कानों में, गलें में तथा हाथों में भले ही रत्नजटित स्वर्ण आभूषण हों;
किन्तु यदि अन्न नहीं होगा तो उपवास ही करना पड़ेगा।'³ अर्थात् क्षुधा की शान्ति केवल
अन्न से ही होगी, स्वर्ण और रत्नों से नहीं। अन्न का साधन एकमात्र कृषि है। इसीलिये
शास्त्रकारों ने कृषि तथा गाय और बैलों के संरक्षण पर विशेष बल दिया है। कृषि की
गुणवत्ता, बीज का संरक्षण, फलों का उत्पादन, वृक्षों और फसलों के रोगों का निदान
और चिकित्सा आदि ऐसे अनेक विषय हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध प्राणीमात्र से है और
संहिताओं में उनका विशद् प्रतिपादन किया गया है।
इनके अतिरिक्त अन्तरिक्षसम्बन्धी अनेक आश्चर्यजनक घटनाओं का भी विवेचन
संहिताग्रन्थों में मिलता है। कभी-कभी कुछ घटनायें आज के वैज्ञानिकों को भी आश्चर्य-
चकित कर देती हैं। इस प्रकार की अनुत्तरित जिज्ञासाओं की भी चर्चा संहिताओं में
यत्र-तत्र मिल जाती है। उदाहरण के रूप में एक घटना का उल्लेख कर देना आवश्यक
समझता हूँ। जब अन्तरिक्षयात्री 'नील आर्मस्ट्रांग' चन्द्रतल पर अवतरण करने जा रहा
१. दैवविदविहितचित्तो द्युनिशं यो गर्भलक्षणे भवति।
तस्य मुनेरिव वाणी न भवति मिथ्याम्बुनिर्देशे।। ( बृ० सं०, गर्भल०-३ )
२. वृष्टिमूला कृषिः सर्वा वृष्टिमूलञ्च जीवनम्।
तस्मादादौ प्रयत्नेन वृष्टिज्ञानं समाचरेत्।। ( कृ० पा०-२.१ )
३. कण्ठे कर्णे च हस्ते च सुवर्णं विद्यते यदि।
उपवासस्तथापि स्यादन्नाभावेन देहिनाम्।। ( कृ० पा०-१.५ )
अन्नं हि धान्यसञ्जातं धान्यं कृष्या विना न च।
तस्मात् सर्वं परित्यज्य कृषिं यत्नेन कारयेत्।। ( कृ० पा०-१.७ )
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( ७ )
था तो उस समय चन्द्रमण्डल पर क्षणिक प्रकाश दिखलाई दिया, जिसको देखकर
आश्चर्यचकित नील आर्मस्ट्रांग ने पृथिवी पर स्थित अन्तरिक्ष अनुसन्धान केन्द्र को
इसकी सूचना दी। सभी के लिये यह क्षणिक प्रकाश एक रहस्य था। ऐसी ही एक
घटना का उल्लेख पैट्रिक मूरे ने भी अपनी पुस्तक Guide to the Moon में किया
है कि 'जब मैंने अपने दूरदर्शक से चन्द्रमा को देखा तो कुछ क्षण के लिए चन्द्रविम्ब
नीले प्रकाश से युक्त दिखाई दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे नीले बल्ब के
प्रकाश में चन्द्रमा को देख रहा हूँ; किन्तु यह दृश्य कुछ ही क्षणों के बाद समाप्त हो
गया तथा चन्द्रमा अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देने लगा।' १
इस तरह के क्षणिक परिवर्तन निश्चय ही आश्चर्योत्पादक हैं; किन्तु इन विचित्र
घटनाओं से संहिताकार भी अपरिचित नहीं हैं। उन्होंने बड़े ही सहज भाव में लिख
दिया है कि 'चन्द्रविम्ब पर कभी पीला, कभी नीला, कभी हरा क्षणिक प्रकाश होता
रहता है।' २ इन प्रकाश-परिवर्तनों के प्रभावों का भी उल्लेख किया है; परन्तु इस प्रकार
के प्रकाशों का कारण आज भी एक रहस्य ही बना हुआ है। संहिताग्रन्थों को देखने से
प्रतीत होता है कि आधुनिक युग में भी अनेक ऐसे विषय हैं जिन पर गहन शोध के
अपार अवसर उपलब्ध हैं। इनके उल्लेख की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है; यतः
संहिताग्रन्थ स्वयं में ही प्रमाण हैं।
वराहमिहिर
आचार्य वराहमिहिर ज्योतिष शास्त्र के प्रतिनिधि आचार्य हैं। इन्होंने ज्योतिष शास्त्र
के तीनों स्कन्धों पर अद्वितीय कार्य किया है। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि जिस प्रकार
भगवान् वराह ने रसातल से पृथ्वी को उबार कर बाहर लाया, उसी प्रकार कालप्रवाह
में निमग्न ज्योतिष के सिद्धान्त स्कन्ध को इन्होंने उबारा। अपने मानक ग्रन्थ 'पञ्च-
सिद्धान्तिका' में इन्होंने सौर, पैतामह, वसिष्ठ, रोमक और पौलिश सिद्धान्तों का संग्रह
किया तथा उनकी गुणवत्ता को परख कर उन पर अपनी टिप्पणी भी दी; जो इस प्रकार
है—'पौलिश सिद्धान्त स्पष्ट है। उसी के आसन्न रोमक भी है; किन्तु सौर सिद्धान्त
इससे भी शुद्ध ( स्पष्टतर ) है। अन्य दो ( पैतामह और वसिष्ठ ) अत्यन्त ( प्राचीन
होने से ) भ्रष्ट हो गये हैं।
१. The Moon is shining down from a slightly misty sky with a lovely
shimmering blueness like an electric glimmes, utterly unlike any-
thing I have never seen before.
२. विलग्नमध्यो नीलाभो वज्रसंस्थानसंस्थितः।
मध्यच्छिद्रविलीनाभो भयं कारयते महत्।।
हरितो पीतये विद्यात् पशूनां चाप्युपद्रवम्।
पीतवर्णो गजान् हन्ति पीतो व्याधिकरस्तथा।। ( अद्भूतसागर )
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( ८ )
संहिता स्कन्ध में बृहत्संहिता या वाराही संहिता उल्लेखनीय है। अद्यावधि उपलब्ध
संहिताओं में बृहत्संहिता की अप्रतिम प्रतिष्ठा है। संक्षेप में अधिकाधिक विषयों का
समावेश इस ग्रन्थ में आचार्य ने किया है।
इसी प्रकार होरास्कन्ध में वराहविरचित 'बृहज्जातक' की प्रतिष्ठा है। आचार्य भट्टोत्पल
ने वराह की दोनों कृतियों—बृहत्संहिता और बृहज्जातक पर अपनी सुप्रसिद्ध टीका
लिखी है, जो 'भट्टोत्पल' के नाम से ही जानी जाती है।
आचार्य वराहमिहिर का जन्म अवन्ती ( उज्जैन ) के पास कापित्थक नामक स्थान
में हुआ था। इनके पिता कर नाम आदित्य दास था। ये सूर्य के उपासक थे। इसके
आधार पर ये मगद्विज कुल में उत्पन्न थे। ये सभी सूचनायें वराहमिहिर द्वारा लिखित
बृहज्जातक के एक पद्य¹ के आधार पर प्राप्त होती हैं। आज के पुरातात्त्विक साक्ष्य भी
अवन्ती के पास ही इनके जन्मस्थान की पुष्टि करते हैं। इन्होंने अपने कुल एवं जन्म-
स्थान का तो उल्लेख किया है; किन्तु जन्मकाल का उल्लेख नहीं किया है। अतः
पञ्चसिद्धान्तिका² में उल्लिखित शक ४२७ के आधार पर इनका जन्मसमय शक
४०७-४१२ ( सन् ४८५-४९० ) के बीच माना जाता है। ज्योतिर्विदाभरण में जिस
वराहमिहिर का उल्लेख है, वे कोई अन्य हो सकते हैं अथवा काल्पनिक भी हो सकते
हैं; क्योंकि विक्रमादित्य के नवरत्नों में जिन आचार्यों के नाम हैं, उनकी एक कालावधि
में उपस्थिति सम्भव नहीं है। स्वयं ज्योतिर्विदाभरण के लेखक ने अपनी ही लेखनी से
अपने-आपको सन्देह के घेरे में डाल दिया है। अतः निःसंशय ही पञ्चसिद्धान्तिका के
वराहमिहिर ज्योतिर्विदाभरण में उल्लिखित वराहमिहिर से सर्वथा भिन्न हैं।
इनके तिरोधान का काल सन्दिग्ध है। एक अज्ञात लेखक के आयुष्य विवरण के
आधार पर इनका देहावसान शक ५०९ में हुआ।³ निश्चित तिथि ज्ञात न होने पर भी
कृतियों के आधार पर यह निश्चित ही है कि पाँचवी शताब्दी के ये मूर्धन्य खगोलशास्त्री
थे। इनके ज्ञान तथा इनके द्वारा प्रयुक्त शब्दावलियों के आधार पर इनके विषय में श्रुति
है कि इन्होंने विदेशों में भ्रमण करके भी ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन किया था। कुछ
इतिहासकारों का मत है कि ये विदेशों में भ्रमण नहीं किये थे; अपितु इनके समय तक
देश और विदेशों में ज्ञान का आदान-प्रदान हो चुका था। इनके
पूर्ववर्ती साहित्य में भी विदेशी शब्दों के उल्लेख मिलते हैं।⁴ आचार्य वराहमिहिर
१. आदित्यदासतनयस्तदवाप्तबोधः कापित्थके सवितृलब्धवरप्रसादः।
आवन्तिको मुनिमतान्यवलोक्य सम्यग्घोरां वराहमिहिरो रुचिरां चकार।।
( बृ० जा० उप०, अ०-९)
२. सप्ताश्वि वेदसङ्ख्यम्।
३. नवाधिकपञ्चशतसङ्ख्यशाके वराहमिहिराचार्यो दिवङ्गतः।। ( भारतीय ज्योतिष )
४. द्रष्टव्य—भारतीय ज्योतिषं।

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( ९ )
विदेश गये थे या नहीं? यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्त्वपूर्ण यह है कि वे
खुले मस्तिष्क वाले, उदार दृष्टिकोण एवं विश्वबन्धुत्व की भावना से ओत-प्रोत मनीषी
थे। उनकी यह उदारता एक पद्य से ज्ञात होती है, जिसका भाव यह है कि 'जिसके पास
सम्यक् ( संशयरहित पुष्ट ) ज्ञान होता है, वह ऋषि के समान पूज्य होता है ( वहाँ
जाति का पन्थ बाधक नहीं होता ) और इस प्रकार का ज्ञान यदि किसी विप्र में हो तो
फिर कहना ही क्या है?'१ यहाँ 'म्लेच्छ' शब्द का प्रयोग हीनार्थ-बोधक नहीं है; अपितु
शास्त्रों में वैदिक ( आर्य ) संस्कृति के अतिरिक्त अन्य संस्कृति के अनुयायियों के लिए
इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि आचार्य वराहमिहिर किसी भी
देश, किसी भी जाति एवं किसी भी व्यक्ति से ज्ञानार्जन में परहेज के पक्षधर नहीं थे।
बृहत्संहिता
उपलब्ध संहिताओं में बृहत्संहिता सर्वाधिक प्रतिष्ठित एवं सुव्यस्थित है। इसमें
संगृहीत विषयों को देखने से प्रतीत होता है कि आचार्य वराहमिहिर ने यत्र-तत्र से
महत्त्वपूर्ण विषयों का सङ्कलन कर भावी पीढ़ी के लिये गहन अध्ययन एवं अनुसन्धान
की प्रभूत सामग्री प्रदान की है। आज आवश्यकता है—बृहत्संहिता के प्रत्येक अध्याय
पर पृथक्-पृथक् कार्य ( अनुसन्धान ) करने की; तभी इस ग्रन्थ की सार्थकता अद्यतन
के युग में सिद्ध होगी तथा ज्योतिष शास्त्र को एक नया आयाम प्राप्त हो सकेगा। आचार्य
अत्यन्त दूरदर्शी थे। उन्होंने अपने काल में ही अनुमान लगा लिया था कि भविष्यत्
काल में ज्योतिष शास्त्र अल्पज्ञों एवं पाखण्डियों के हाथों में जाकर अपनी प्रतिष्ठा पर
प्रश्नचिह्न लगा सकता है। इसीलिये उन्होंने इस शास्त्र के अध्येताओं की अर्हता का
प्रतिपादन किया है।
सांवत्सर सूत्राध्याय के १५ पद्यों में आचार्य ने केवल दैवज्ञों का लक्षण निरूपित
किया है। उन लक्षणों से युक्त व्यक्ति को ही ज्योतिष शास्त्र पढ़ना चाहिये अथवा जिसे
ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन की जिज्ञासा हो, उस व्यक्ति को सर्वप्रथम अपने अन्दर उन
गुणों को धारण करना चाहिये।
दैवज्ञ-लक्षण बताने के बाद २२-३९ पद्यों में दैवज्ञों की प्रशंसा तथा पाखण्डियों
की निन्दा की गई है। किसी भी शास्त्र को उपयुक्त, जिज्ञासु एवं प्रबुद्ध व्यक्ति के हाथ
में देने से उसका विस्तार होता है; अन्यथा शास्त्र की हानि होती है। आचार्य ने लिखा
है—'संहितापारगश्च दैवचिन्तको भवति।' विना संहिताओं के सम्यग् अध्ययन के
व्यक्ति दैवचिन्तक नहीं हो सकता। प्रकृति और भावी घटनाओं को जानने के लिये
अन्तरिक्ष में प्रतिक्षण हो रहे परिवर्तनों पर दृष्टि रखना आवश्यक है। अतः आचार्य ने
सर्वप्रथम पात्रता-निर्धारण के अनन्तर सूर्यादि ग्रहों, अगस्त्य तारा तथा सप्तर्षि मण्डल
१. म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यग् ज्ञानं प्रतिष्ठितम्।
ऋषिवत्तेऽपि पूज्यन्ते किं पुनर्देवविद् द्विजः।। ( बृ० सं०-२.३० )
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( १० )
के चार ( सञ्चरण ) एवं उनके परिणामों को परिभाषित किया। तदनन्तर पृथ्वी का
( भूगोल का ) वर्णन 'कूर्मचक्र' के अन्तर्गत किया है, जिसके आधार पर भूमण्डल पर
किसी प्रकार के प्रकृतोत्पातों के क्षेत्रों का निर्धारण किया जाता है। तदनन्तर 'नक्षत्रव्यूह'
नामक अध्याय में नक्षत्रों के प्रभावक्षेत्र का उल्लेख किया, जो अपने-आपमें अद्वितीय
और महत्त्वपूर्ण है। जैसे कि यदि मृगशिरा नक्षत्र पर कोई दुष्प्रभाव ग्रहचार अथवा
अन्तरिक्षोत्पात द्वारा पड़ता है तो उसके प्रभावक्षेत्र में आने वाले सभी प्रभावित होंगे।
मृगशिरा का प्रभावक्षेत्र बृहत्संहिता के आधार पर इस प्रकार है—सुगन्धियुक्त द्रव्य,
वस्त्र, जलोत्पन्न पदार्थ, पुष्प, फल, रत्न, वनवासी, पक्षी, मृग, सोमरस पीने वाले,
गायक ( सङ्गीतज्ञ ) का भी तथा सन्देहवाहक।१
इसी प्रकार सभी नक्षत्रों के प्रभावक्षेत्रों का उल्लेख किया गया है। तदनन्तर
'ग्रहभक्ति' अध्याय में ग्रहों से सम्बन्धित भूभाग का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार
प्रारम्भिक अध्यायों में प्राकृत उत्पातों से प्रभावित होने वाले पदार्थों तथा क्षेत्रों का
उल्लेख करने के अनन्तर भूस्थ एवं आन्तरिक्ष उत्पातों तथा आकाशीय परिवर्तनों का
उल्लेख किया गया है। २१वें अध्याय से २८वें अध्याय तक वायु और वृष्टि का
विवेचन किया गया है, जो अपने-आपमें अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं कृषि की दृष्टि से
अत्यन्त उपयोगी है। २९ से ३९ अध्यायों तक भूमि एवं आन्तरिक्षोत्पातों का उल्लेख
है। ३८वाँ अध्याय 'रजोवर्षाणाध्याय' नाम से निर्दिष्ट है। यद्यपि यह अध्याय सभी संस्करणों
में नहीं है; किन्तु है महत्त्वपूर्ण। 'रजोवर्षण' नाम ही इसके वास्तविक अर्थ को व्यक्त
कर रहा है। इसमें आकाश से धूलि की वृष्टि का वर्णन है। कुछ लोगों ने भ्रमवश इसमें
भूमि से उड़ने वाली धूलि का वर्णन ही मान लिया है, जो कि उपयुक्त नहीं है। आज
आधुनिक विज्ञान के समक्ष भी यह धूलि ( Cosmic dust ) रहस्य बनी हुई है। ४०
से ५२ अध्याय तक प्रकीर्ण विषय हैं, जिनमें ५१वाँ अध्याय अङ्गविद्या का है। इसमें
शरीर के अवयवों के लक्षणों का निरूपण किया गया है।
५३वें अध्याय से बृहत्संहिता का उत्तरार्ध माना जाता है। सम्भवतः पूर्वार्ध और
उत्तरार्ध का विभाजन आदरणीय गुरुवर्य स्व० पं० अवधविहारी त्रिपाठी जी द्वारा सम्पादित
एवं वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित बृहत्संहिता के गवेषणापूर्ण
संस्करण के आधार पर ही माना गया है। उत्तरार्ध वास्तुविद्या से प्रारम्भ होता है। ५३
से ६० अध्याय तक वास्तुविद्या का विवेचन है, जिसमें प्रासाद-निर्माण तथा उन पर
वज्रलेप ( प्लास्टर ) की भी महत्त्वपूर्ण चर्चा की गई है। साथ ही ५४वें अध्याय में
भूगर्भस्थ जल के स्रोत का भी उल्लेख किया गया है, जो 'दकार्गल' या 'उदकार्गल'
नाम से जाना जाता है। आवासीय क्षेत्र में जल के स्रोत तथा पर्यावरण की दृष्टि से वृक्ष
१. मृगशिरसि सुरभिवस्त्राब्जकुसुमफलरत्नवनचरविहङ्गाः।
मृगसोमपीथिगान्धर्वकामुकाः लेखहराश्च ।। ( बृ० सं०-१५.३ )
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( ११ )
की आवश्यकता होती है। इसीलिये वास्तुविद्या के साथ इनका भी उल्लेख है। विशेषता
यह है कि ‘वृक्षायुर्वेद’ नाम से वृक्षों में होने वाली व्याधियों एवं उनके उपचार की विधि
भी उक्त अध्याय में बताई गई है। ६२ से ६७ अध्याय तक पशु-पक्षियों के लक्षण,
६८ से ७० तक स्त्री-पुरुषों के लक्षण एवं ७१ से ७९ तक स्त्री-पुरुषों एवं राजचिह्नों
से सम्बन्धित विविध विषयों का निरूपण किया गया है।
८० से ८३ तक रत्नों के लक्षण, ८४ में दीपज्वाला-लक्षण, ८५वें में दन्तकाष्ठलक्षण
तथा ८६ से ९६ तक शकुन एवं पशु-पक्षियों की चेष्टाओं का विवेचन है। ९७ से
१०५ अध्यायों तक ग्रह-नक्षत्रों से सम्बन्धित परिणामों के उल्लेख के अनन्तर १०६
तथा १०७ अध्यायों में ग्रन्थ का उपसंहार किया गया है।
यदि हम इन विषयों का सूक्ष्मेक्षण करते हैं तो पाते हैं कि प्रत्येक अध्याय एक
स्वतन्त्र एवं अनुसन्धानयोग्य विषय को स्वयं में समाविष्ट किये हुये है। एक ग्रन्थ में
इतने विषयों का संकलन वस्तुतः गागर में सागर के समान ही है। आचार्य वराहमिहिर
ने इतने विषयों को संगृहीत कर आगे कार्य करने के लिये सामग्री उपलब्ध कराई है।
आज आवश्यकता है—बृहत्संहिता को भाषान्तर के साथ सर्वसुलभ कराने की; ताकि
आधुनिक वैज्ञानिकों के साथ संयुक्त रूप से इस दिशा में शोधकार्य को प्रोत्साहित किया
जा सके। बृहत्संहिता का वास्तविक उपयोग तभी संभव है, जब पारम्परिक और
आधुनिक विज्ञानवेत्ता समवेत प्रयास कर इसमें निहित विज्ञान को प्रयोग के आधार पर
परिवर्धित कर प्रकाशित करें और व्यवहार में लायें।
आचार्य भट्टोत्पलकृत विवृति से समन्वित बृहत्संहिता के हिन्दी रूपान्तरणसहित
पुनः प्रकाशन पर अतिशय प्रसन्नता का अनुभव करते हुये आशा करता हूँ कि आधुनिक
वैज्ञानिक भी बृहत्संहिता के मनन में अभिरुचि लेंगे तथा सम्बन्धित विषयों में शोध एवं
परीक्षणों द्वारा प्राचीन ज्ञान-परम्परा को आगे बढ़ाने में अपना सक्रिय योगदान करेंगे।
अन्त में पुनः श्री अच्युतानन्द झाकृत हिन्दी टीका से समन्वित बृहत्संहिता के
वर्तमान प्रकाश्यमान संस्करण के प्रकाशक—चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी के स्वत्वा-
धिकारी गुप्तबन्धुओं को मैं अपनी हार्दिक शुभकामनाओं से विभूषित करते हुये कामना
करता हूँ कि वे इसी प्रकार अनवरत रूप से माँ भारती की सेवा में सतत प्रयत्नशील
रहेंगे एवं जिज्ञासुओं को लाभान्वित कराते रहेंगे।
वैशाख शुक्ल-३ प्रो० रामचन्द्र पाण्डेय
संवत्-२०६२ सङ्कायप्रमुखचरः
संस्कृतविद्याधर्मविज्ञानसङ्कायः
काशी हिन्दू विश्वविद्यालयः
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भूमिका
तिष्ठन्तीं शववक्षसि स्मितमुखीं हस्ताम्बुजैर्बिभ्रतीं
मुण्डं खड्गवराभयानि विजितारातिव्रजां भीषणाम्।
मुण्डस्रक्प्रविकाशमानविपुलोत्तुङ्गस्तनोद्भासिनीं
नत्वेमां किल भूमिकां वितनुते नन्दोऽच्युतादिः कृती।।
परमेश्वर के सम्बन्ध में शास्त्रों में प्रतिपादित है कि 'अणोरणीयान्महतो महीयान्'
अर्थात् यह परमात्मा छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा है। इस अखण्ड ब्रह्माण्ड-नायक
परमात्मा के निःश्वासभूत, प्राणियों के आधिभौतिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक—इन
तीनों प्रकार के दुःखों का अपहरण करने वाला और चतुर्वर्ग-प्राप्ति का अतिशय सुन्दर
मार्गप्रदर्शक वेद है।
प्राचीन तथा आधुनिक इतिहासों के द्वारा यह सर्वथा सिद्ध हो चुका है कि उपलब्ध
पुस्तकों में सबसे प्राचीन वेद है। इसको अपौरुषेय कहते हैं अर्थात् किसी मनुष्य ने
इसको नहीं बनाया, किन्तु प्राणियों के हित के लिये सर्वशक्तिमान् परमात्मा ने त्रिकालज्ञ
महर्षियों के द्वारा सृष्टि के आरम्भ में इसे प्रकाशित किया।
यहाँ पर मनु—
वेदोऽखिलो कर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च।।
श्लोकवार्तिक में—
श्रेयःसाधनता ह्येषा नित्यं वेदात्प्रतीयते।
ताद्रूप्येण च धर्मत्वं तस्मान्नेन्द्रियगोचरः।।
और भी—
प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते।
एवं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता।।
ब्राह्मणों को इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिये।
यहाँ पर मनु—
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः।।
इसके व्याकरण आदि छः अङ्ग हैं, जैसे—व्याकरण मुख, ज्योतिष नेत्र, निरुक्त
कान, कल्प हाथ, शिक्षा नासिका और छन्द पैर है।
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( १४ )
श्रीमान् भास्कराचार्य—
शब्दशास्त्रं मुखं ज्योतिषं चक्षुषी श्रोत्रमुक्तं निरुक्तं च कल्पं करौ।
या तु शिक्षाऽस्य वेदस्य सा नासिका पादपद्मद्वयं छन्द आद्यैर्बुधैः।।
वेदपुरुष का नेत्ररूप होने के कारण ज्योतिष शास्त्र सभी अङ्गों में उत्तम गिना जाता
है, क्योंकि अन्य सभी अङ्गों से समन्वित प्राणी भी नेत्ररहित होने पर कुछ नहीं कर
सकता।
यहाँ पर भास्कराचार्य—
वेदचक्षुः किलेदं स्मृतं ज्योतिषं मुख्यता चाङ्गमध्येऽस्य तेनोच्यते।
संयुतोऽपीतरैः कर्णनासादिभिश्चक्षुषाङ्गेन हीनो न किञ्चित्करः।।
काश्यप के मत से इस शास्त्र के सूर्य आदि अठारह महर्षि प्रणेता हैं—
सूर्यः पितामहो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिः पराशरः।
कश्यपो नारदो गर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः।।
लोमशः पौलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः।
शौनकोऽष्टादशाश्चैते ज्योतिःशास्त्रप्रवर्तकाः।।
किन्तु पराशर के मत से ज्योतिःशास्त्रप्रवर्त्तक उन्नीस हैं—
विश्वसृड् नारदो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिः पराशरः।
लोमशो यवनः सूर्यश्च्यवनः कश्यपो भृगुः।।
पुलस्त्यो मनुराचार्यः पौलिशः शौनकोऽङ्गिराः।
गर्गो मरीचिरित्येते ज्ञेया ज्यौतिःप्रवर्तकाः।।
पराशर के मत से ज्योतिषशास्त्र में गुरु और शिष्य की सम्बन्ध-परम्परा इस प्रकार है—
नारदाय यथा

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( १५ )
सञ्चार का ज्ञान-प्रकार हो, दो प्रकार का ( व्यक्त-अव्यक्त ) गणित हो, उत्तरसहित प्रश्न
हो; पृथ्वी, नक्षत्र और ग्रहों की स्थिति का वर्णन हो और यन्त्रादि का वर्णन हो।
सिद्धान्तशिरोमणि द्वारा यही परिभाषा मान्य है—
त्रुट्यादिप्रलयान्तकालकलना मानप्रभेदस्तथा
चारश्च द्युसदां द्विधा च गणितं प्रश्नास्तथा सोत्तराः।
भूधिष्ण्यग्रहसंस्थितेश्च कथनं यन्त्रादि यत्रोच्यते
सिद्धान्तः स उदाहृतोऽत्र गणितस्कन्धप्रबन्धे बुधैः॥
‘गणितस्कन्ध’ उसको कहते हैं, जिसमें व्यक्त-अव्यक्त आदि अनेक प्रकार के
गणित वर्णित हों। यह स्कन्ध सिद्धान्तस्कन्ध के अन्तर्गत ही पाया जाता है।
‘फलितस्कन्ध’ के मुख्य पाँच भेद हैं—जातक, ताजिक, मुहूर्त, प्रश्न एवं संहिता।
जिसमें जन्मकाल के द्वारा प्राणियों के जीवनसम्बन्धी सब तरह के फल कहे गये
हैं, उसको ‘जातक’ कहते हैं। वस्तुतः जन्मकाल के ज्ञान के विना प्राणियों का जीवन
अन्धकार में रहता है—
यस्य नास्ति किल जन्मपत्रिका या शुभाशुभफलप्रदायिनी।
अन्धकं भवति तस्य जीवितं दीपहीनमिव मन्दिरं निशि॥
ताजिकविभाग से वर्षफल, मासफल आदि का ज्ञान होता है।
पूर्वापर सन्दर्भ देखने से यह निश्चित होता है कि यवनों ने ताजिक शास्त्र में विशेष
उन्नति की; अतः ज्यौतिष शास्त्र के प्रवर्त्तकों में यवनाचार्य का भी नाम आता है। ऐसा
जान पड़ता है कि पूर्व समय में अत्रत्य ज्योतिषी लोग वर्षफल आदि अन्य प्रकार से
बनाते थे। नीलकण्ठाचार्य ने यवनों से ताजिक शास्त्र का अध्ययन करके ‘ताजिकनीलकण्ठी’
नामक ग्रन्थ का निर्माण किया। इसमें योगों के नाम फारसी शब्दों में इक्कवाल, इन्दुवार
आदि हैं। इन शब्दों को बदल कर संस्कृत शब्दों के द्वारा योगों के नाम नहीं लिखे;
अतः यह भी सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में विद्वानों में गुणग्राहकता अत्यधिक थी।
मुहूर्तविभाग में जातकर्म, अन्नप्राशन आदि सकल मुहूर्तों का वर्णन है।
प्रश्नविभाग में मूकप्रश्न आदि का वर्णन है।
संहिताविभाग फलित ज्यौतिष का प्रधान अङ्ग है। इसमें ग्रहचार आदि फलों के
अतिरिक्त वायसविरुत, शिवारुत, मृगचेष्टित, श्वचेष्टित, गवेङ्गित, अश्वेङ्गित, हस्तिचेष्टित,
शाकुन आदि विषयों का फल भी लिखा है; अतः इसको फलित का एक प्रधान अङ्ग
मानना पड़ेगा।
इस विभाग के अन्तर्गत यह ‘बृहत्संहिता’ नामक ग्रन्थ अनुपम है, जिसको आदित्य-
दास के पुत्र, त्रिस्कन्ध ज्यौतिष शास्त्र में पारङ्गत श्री वराहमिहिराचार्य ने बनाया।
इस समय एतद्देशीय सम्पूर्ण संस्कृत विद्यालयों में यह बृहत्संहिता नामक ग्रन्थ
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( १६ )
परीक्षा में पाठ्यत्वेन निर्धारित है; परन्तु इसके मूल श्लोकों के अत्यन्त कठिन होने के
कारण अर्थज्ञान के लिये विशेष प्रतिभा की आवश्यकता है। इसकी संस्कृत में भट्टोत्पल्लीय
टीका बहुत अच्छी है; किन्तु इस टीका द्वारा सर्वसाधारण के लिए मूल श्लोकों का
अर्थ जानना कठिन था; अतः जनसाधारण के उपकारार्थ मैंने इस ग्रन्थ की सरल
परिशुद्ध हिन्दी टीका की है। आशा है कि पण्डितगण इस ‘विमला’ हिन्दी टीकायुत
अनुपम ग्रन्थ को देखकर मेरे परिश्रम को सफल करेंगे।
काशी के प्रसिद्ध प्रकाशन-संस्थान चौखम्बा संस्कृत सीरीज एवं ‘चौखम्बा विद्याभवन’
के अध्यक्ष श्रीमान् बाबू जयकृष्णदास जी ने तत्परतापूर्वक शीघ्र ही इस ग्रन्थ को
प्रकाशित कर दिया; अतः वे धन्यवाद के पात्र हैं।
अवसान में सविनय करबद्ध प्रार्थना यही है कि अनवधानवश अथवा मुद्रणदोष
से कहीं त्रुटि रह गई हो तो पक्षपातरहित बुद्धि से पण्डितगण उसे सुधार कर मुझे भी
सूचित करें, जिससे कि पुनः अग्रिम संस्करण में उसको ठीक कर उन सज्जनों के
सामने उपस्थित कर सकूँ। कहा भी है—
गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः।।
दुर्जनगण अनेक प्रकार से प्रार्थना करने पर भी अपनी आदत नहीं छोड़ सकते हैं,
अतः उनसे प्रार्थना करना व्यर्थ है; क्योंकि—
खलो मृगयते दोषं गुणपूर्णेषु वस्तुषु।
वने पुष्पफलाकीर्णे पुरीषमिव सूकरः।।
संवत्-२०१५, विदुषां वशंवदः
वसन्तपञ्चमी श्री अच्युतानन्द झा