बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
प्रभासस्य च माहात्म्यं पुराणाख्यानकन्तथा ।
प्रभासस्य च माहात्म्यं पुराणाख्यानकन्तथा ।
गौतमाख्यानकं पश्चाद् वेदपादस्तवस्ततः ॥
गोकर्णक्षेत्रमाहात्म्यं नर्मदातीर्थवर्णनम् ।
अवन्त्याश्चैव माहात्म्यं मथुरायास्ततः परम् ।
वृन्दावनस्य महिमा वसोर्द्धान्तिके गतिः ।
फलश्रुति--
यः शृणोति नरो भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः ।
स याति ब्रह्मणो धाम नात्र कार्या विचारणा ॥
यस्त्वेतादिषुपूर्णायां धेनूनां सप्तकाचितम् ।
प्रदद्याद् द्विजवर्याय स लभेन्मोक्षमेव च ॥
यश्चानुक्रमणीमेतां नारदीयस्य वर्णयेत् ।
शृणुयाद्वैकचित्तेन सोऽपि स्वर्गगतिं लभेत् ॥
(ना० पु० पूर्वभाग, अ० ६७)
इस प्रकार नारदीयपुराण ने जहाँ अपने विषयों की अनुक्रमणी दी है वहीं अठारहों पुराणों की भी
विस्तृत विषयानुक्रमणिका प्रस्तुत की है। यह अनुक्रमणी सभी पुराणों के विषयों को जानने के लिए अत्यन्त
आवश्यक है। इसकी सहायता से हम वर्तमान पुराणों के मूलरूप तथा प्रक्षिप्त अंश की छानबीन बड़ी सुग-
मता से कर सकते हैं। इस पुराण में विविध ज्ञान-विज्ञान की बातें, अनेक इतिहास-गाथायें, गोपनीय अनुष्ठान
आदि का वर्णन, धर्मनिरूपण तथा भक्तिमहत्त्वपरक विलक्षण कथायें, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, मन्त्र-विज्ञान
आदि का अलौकिक और महत्त्वपूर्ण व्याख्यान संगृहीत है।
यद्यपि सभी पुराण श्रीहरि के स्वरूप ही हैं। फिर भी छह पुराण सात्त्विक माने जाते हैं। वे ये हैं—
वैष्णवं नारदीयं च तथा भागवतं शुभम् ।
गारुडं च तथा पाद्मं वाराहं शुभदर्शने ॥
सात्त्विकानि पुराणानि विज्ञेयानि शुभानि वै ।
(पद्मपुराण उत्तरखण्ड, २६३।८२-८३)
अतएव नारदीय पुराण सात्त्विक पुराण है। इसमें परात्पर ब्रह्म विशुद्ध सत्त्वमूर्ति श्रीहरि की लीलाओं
का गायन हुआ है। यह पुराण 'भक्त्या तुष्यति माधवो न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः' इस सिद्धान्त का परि-
पोषक है। यह कहता है—
यथा भूमि समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः ।
तथा भक्ति समाश्रित्य सर्वकार्याणि साधयेत् ॥
(पूर्वभाग ४।५)
किन्तु इस पुराण की दृष्टि में भक्ति के साथ वर्णाश्रमधर्म एवं शास्त्रोक्त कर्त्तव्यों का पालन भी अत्या-
वश्यक है। सदाचारपरायण, भवाचारत्यागी भक्त पर भगवान् कभी प्रसन्न नहीं होते—
( १० )
हरिभक्तिपरो वापि हरिध्यानरतोऽपि वा ।
भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात् पतितः सोऽभिधीयते ।।
वेदो वा हरिभक्तिर्वा भक्तिर्वापि महेश्वरे ।
आचारात्पतितं मूढं न पुनाति द्विजोत्तमम् ।।
(पूर्व० ४, २४-२५)
यः स्वधर्मं परित्यज्य भक्तिमात्रेण जीवति ।
न तस्य तुष्यते विष्णुश्चारेणैव तुष्यति ।।
तस्मात् कार्या हरेर्भक्तिः स्वधर्मस्याविरोधिनी ।
स्वधर्महीना भक्तिश्चाप्यकृतैव प्रकीर्तिता ।।
(पूर्व० १५, १२३, १२४)
यह पुराण एकादशी व्रत के अनुष्ठान का माहात्म्य बड़े विस्तार से प्रभावक शब्दों में वर्णन करता है।
यहाँ परम वैष्णव रुक्मांगद राजा का उल्लेख है, जिन्होंने अपने राज्य में आठ वर्ष से लेकर अस्सी वर्ष वय
वाले व्यक्तियों के लिए आदेश जारी कर रखा था कि इनमें जो एकादशी का व्रत नहीं करेगा वह वध्य माना
जाएगा। यह पुराण अग्निपुराण तथा गरुड़पुराण के समान समस्त विद्याओं का प्रतिपादन करने वाला विश्व-
कोश के समान है। इन विद्याओं के प्रतिपादक किसी मान्य ग्रन्थ का संक्षेप यहाँ प्रस्तुत किया गया है
कृतज्ञता-ज्ञापन
लगभग ४० वर्ष पहले नारदीयपुराण (आनन्दाश्रम पूना संस्करण) का अपूर्ण हिन्दी अनुवाद हमने किया
था। उसके बाद सम्मेलन में शासनतन्त्र बदल जाने से बहुत वर्षों तक पुराण-कार्य स्थगित रहा। पुनः श्री प्रभात
शास्त्री के प्रशासनकाल में यह कार्य पुनरुज्जीवित हुआ। शास्त्री जी का दृढ़संकल्प है कि वे जब तक सम्मेलन में
रहेंगे तब तक पुराणों का प्रकाशन निर्बाध गति से चलता रहेगा। उनके इस सत्य संकल्प के लिए जितना साधुवाद
और धन्यवाद दिया जाय, वह कम ही होगा। शास्त्रीजी ने मुझे इस पुण्य कार्य का भार सौंपा, अतः मैं उनके
प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
ऊपर संकेत के अनुसार मुझे अपूर्ण हिन्दी अनुवाद को पूर्ण करने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा;
कारण जिस संस्करण से इसका अनुवाद किया था, वह संस्करण प्रेस में देने से पूर्व मुझे नहीं मिला। नारदीय-
पुराण की खोजबीन करने पर प्रयागस्थ पं० श्री महादेवप्रसाद पाठक'वैद्य जी से नारदीय पुराण (बम्बई संस्करण)
की एक प्रति प्राप्त हुई। उसकी 'फोटो स्टेट' कापी कराकर हमने प्रेस में दी। पाठकजी की इस उदारता के
लिए हम उनके प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं।
अनुवाद-कार्य को पूर्ण करने में मुझे कल्याण के 'नारद विष्णु पुराण अंक' से बहुत सहायता मिली।
अतः मैं 'कल्याण' के कर्णधारों के प्रति अपनी हार्दिक कार्तज्ञ्य ज्ञापित करता हूँ।
जैसा कि मैंने ऊपर संकेत किया है कि इसका अनुवाद पूना संस्करण से और संशोधन बम्बई संस्करण से
किया गया है, इससे कुछ स्थलों पर पाठभिन्नता के कारण भावानुवाद ही करना पड़ा। कुछ कारणवश मंत्र-संशो-
धन और मन्त्रोद्धार भी सब जगह नहीं कर सका। इसके लिए मैं पाठकों से क्षमा चाहता हूँ। यदि इसके दूसरे
संस्करण तक मैं क्रियाशील रहा तो इस कमी को पूर्ण करने का भरसक प्रयास करूँगा। 'करकृतमपराधं क्षन्तुम-
र्हन्ति सन्तः' इस अभ्यर्थना के साथ अपना निवेदन समाप्त करता हूँ।
मौनी अमावास्या
सन् १९८६
निवेदक
तारिणीश झा
ॐ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
श्रीनारदीयपुराणम्
पूर्वार्द्धम्
अथ प्रथमोऽध्यायः
ओं नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥१॥
ओं वेदव्यासाय नमः ॥
वन्दे वृन्दावनासीनमिन्दिरानन्दमन्दिरम् । उपेन्द्रं सांद्रकारुण्यं परानन्दं परात्परम् ॥१॥
ब्रह्मविष्णुमहेशाख्यं यस्यांशा लोकसाधकाः । तमादिदेवं चिद्रूपं विशुद्धं परमं भजे ॥२॥
शौनकाद्या महात्मान ऋषयो ब्रह्मवादिनः । नैमिषाख्ये महारण्ये तपस्तेपुर्मुमुक्षवः ॥३॥
जितेन्द्रिया जिताहाराः सन्तः सत्यपराक्रमाः । यजन्तः परया भक्त्या विष्णुमाद्यं सनातनम् ॥४॥
अनीर्ष्याः सर्वधर्मज्ञा लोकानुग्रहतत्पराः । निर्ममा निरहंकाराः परस्मिन् रतमानसाः ॥५॥
न्यस्तकामा विवृजिनाः शमादिगुणसंयुताः । कृष्णाजिनोत्तरीयास्ते जटिला ब्रह्मचारिणः ॥६॥
अध्याय १
पुरुषोत्तम नर और नारायण तथा भगवती सरस्वती देवी को नमस्कार करके जय शब्द का उच्चारण
करना चाहिए ॥१॥
वृन्दावन में बैठे हुए, लक्ष्मी के आनन्द के धाम, इन्द्र के छोटे भाई, करुणापूर्ण, परानन्दस्वरूप, श्रेष्ठ
से भी श्रेष्ठ तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामक भगवान् की मैं वन्दना करता हूँ । जिस परब्रह्म के लोक-साधक
देव अंश रूप हैं, उस चित्स्वरूप, विशुद्ध, परम तत्त्व, आदि देव का मैं भजन करता हूँ ॥२॥
प्राचीन काल में मुक्ति की कामना से शौनक आदि ब्रह्मवादी ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्र में तपस्या करते थे ।
वे ऋषि जितेन्द्रिय, परमव्रती, सत्यसन्ध और अपनी उत्कृष्ट भक्ति से आद्य सनातन भगवान् विष्णु की उपासना
में रत थे ॥३॥
वे ईर्ष्या से रहित, अखिल धर्मों के मर्मज्ञ, लोक-कल्याण में निरत, निर्मम, निरभिमान और परब्रह्म के
ध्यान में मग्न रहते थे । अपनी सम्पूर्ण भौतिक कामनाओं को छोड़कर, शम आदि गुणों से युक्त होकर वे जटाधारी
ब्रह्मचारी कृष्णमृगचर्म को ही धारण करते थे ॥६॥
फा०—१
२ प्रथमोऽध्यायः
गृणन्तः परमं ब्रह्म जगच्चक्षुः समौजसः । धर्मशास्त्रार्थतत्त्वज्ञास्तेपुनैमिषकानने ॥७॥
यज्ञैर्यज्ञपतिं केचिज्ज्ञानैर्ज्ञानात्मकं परे । केचिच्च परया भक्त्या नारायणमपूजयन् ॥८॥
एकदा ते महात्मानः समाजं चक्रुरुत्तमाः । धर्मार्थकाममोक्षाणामुपायाञ्ज्ञातुमिच्छवः ॥६॥
षड्िंवशतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् । तेषां शिष्यप्रशिष्याणां संख्या वक्तुं न शक्यते ॥१०॥
मुनयो भावितात्मानो मिलितास्ते महौजसः । लोकानुग्रहकर्त्तारो वीतरागा विमत्सराः ॥११॥
कानि क्षेत्राणि पुण्यानि कानि तीर्थानि भूतले । कथं वा प्राप्यते मुक्तिर्नृणां तापार्तचेतसाम् ॥१२॥
कथं हरौ मनुष्याणां भक्तिरव्यभिचारिणी । केन सिध्येत च फलं कर्मणस्त्रिविधात्मनः ॥१३॥
इत्येवं प्रष्टुमात्मानमुद्यतान्प्रेक्ष्य शौनकः । प्राञ्जलिर्वाक्यमाहेदं विनयावनतः सुधीः ॥१४॥
शौनक उवाच
आस्ते सिद्धाश्रमे पुण्ये सूतः पौराणिकोत्तमः । यजन्मुखैर्बहुविधैर्विश्वरूपं जनार्दनम् ॥१५॥
स एतदखिलं वेत्ति व्यासशिष्यो महामुनिः । पुराणसंहितावक्ता शान्तो वै रोमहर्षणिः ॥१६॥
युगे युगेऽल्पकान्धर्मान्निरोक्ष्य मधुसूदनः । वेदव्यासस्वरूपेण वेदभानं करोति वै ॥१७॥
वेदव्यासमुनिः साक्षान्नारायण इति द्विजाः । शुश्रुमः सर्वशास्त्रेषु सूतस्तु व्यासशासितः ॥१८॥
तेन संशासितः सूतो वेदव्यासेन धीमता । पुराणानि स वेत्त्येव नान्यो लोके ततः परः ॥१६॥
स पुराणार्थविल्लोके स सर्वज्ञः स बुद्धिमान् । स शान्तो मोक्षधर्मज्ञः कर्मभक्तिकलापवित् ॥२०॥
इस प्रकार धर्मशास्त्रों के अर्थ एवं रहस्य को जानने वाले, सर्वदा परब्रह्म की स्तुति में ही लीन रहने
वाले, सर्वद्रष्टा और समान ओज रखने वाले ऋषि उस नैमिषकानन में तपोरत थे ॥७॥
उनमें से कुछ तो यज्ञों के द्वारा यज्ञपति की, कुछ ज्ञान के द्वारा ज्ञानस्वरूप ब्रह्म की और कुछ ऋषि
अपनी पराभक्ति के द्वारा नारायण की उपासना करते थे ॥८॥
एक दिन उन महात्मा मुनियों ने धर्म-अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति के साधनों को जानने की इच्छा से एक
गोष्ठी का आयोजन किया। उस गोष्ठी में छब्बीस हजार ऊर्ध्वरेता, जिनके शिष्योपशिष्यों की संख्या नहीं
कही जा सकती, एवं अन्यान्य महातेजस्वी और ज्ञानी मुनि सम्मिलित हुए। वे लोककल्याणकर्त्ता, वीत-राग
और ईर्ष्यारहित मुनि-इस भूतल पर कौन-कौन से पवित्र तीर्थ ओर पुण्यदायक क्षेत्र हैं, अथवा त्रिविधताप
से संतप्त मनुष्यों को कैसे मुक्ति मिल सकती है, किस प्रकार श्री विष्णु में मनुष्यों की अचल भक्ति हो सकती है
और किस उपाय से त्रिविध कर्म (दैविक, दैहिक और आध्यात्मिक, अथवा कायिक, वाचिक और मानसिक) सफल
हो सकते हैं, आदि प्रश्नों को महर्षि शौनक से पूछने के लिए उद्यत हुए।
उन्हें देखकर विनयावनत सुधी शौनक ने हाथ जोड़कर कहा ॥ ६—१४॥
शौनक बोले- 'सभ्यगण ! पुनीत सिद्ध आश्रम में महान् पुराण विद्या के ज्ञाता सूत जी रहते हैं। वे
बहुविध यज्ञों में विश्वरूप जनार्दन की अराधना किया करते हैं। वे ही व्यास के प्रिय शिष्य, पुराण संहिता के वक्ता,
शान्त, महामुनि रोमहर्षण जी इन सम्पूर्ण तत्त्वों को जानते हैं। युग-युग में धर्म का ह्रास देखकर स्वयं मधुसूदन
वेदव्यास के रूप में अवतार लेकर वेदों का विभाग करते हैं। द्विजगण ! मुनि वेदव्यास साक्षात् नारायण हैं। सुना
जाता है कि कृपालु व्यास जी ने सूत को सब शास्त्रों का उपदेश किया है। जब उन्ही धीमान् वेदव्यास जी ने
सूत को शास्त्रों का उपदेश किया है तो मैं यह कह सकता हूँ कि इस लोक में वे ही पुराणों को जानते हैं। उनसे
बढ़कर दूसरा कोई पुराणविद् नहीं है। वे ही इसलोक में पुराण के तत्त्वज्ञाता हैं। वे ही सर्वज्ञ ओर वे ही बुद्धिमान्
नारदीयपुराणम् ३
वेदवेदाङ्गशास्त्राणां सारभूतं मुनीश्वराः । जगद्धितार्थं तत्सर्वं पुराणेषूक्तवान्मुनिः ॥२१॥
ज्ञानार्णवो वै सूतस्तत्सर्वतत्त्वार्थकोविदः । तस्मात्तमेव पृच्छाम इत्यूचे शौनको मुनीन् ॥२२॥
ततस्ते मुनयः सर्वे शौनकं वाग्विदां वरम् । समाश्लिष्य सुसंप्रीताः साधु साध्विति चाब्रुवन् ॥२३॥
अथ ते मुनयो जग्मुः पुण्यं सिद्धाश्रमं वने । मृगव्रजसमाकीर्णं मुनिभिः परिशोभितम् ॥२४॥
मनोज्ञभूरुहलताफलपुष्पविभूषितम् । युक्तं सरोभिरच्छोदैरतिथ्यातिथ्यसंकुलम् ॥२५॥
ते तु नारायणं देवमनन्तमपराजितम् । यजन्तमग्निष्टोमेन ददृशु रोमहर्षणम् ॥२६॥
यथार्हमर्चितास्तेन सूतेन प्रथितौजसः । तस्यावभृथमैक्षन्तस्तत्र तस्थुर्मखालये ॥२७॥
अधरावभृथस्नातं सूतं पौराणिकोत्तमम् । पप्रच्छुस्ते सुखासीनं नैमिषारण्यवासिनः ॥२८॥
ऋषय ऊचुः
वयं त्वतिथयः प्राप्ता आतिथेयास्तु सुव्रत । ज्ञानदानोपचारेण पूजयास्मान्यथाविधि ॥२६॥
दिवौकसो हि जीवन्ति पीत्वा चन्द्रकलामृतम् । ज्ञानामृतं भूसुरास्तु मुने त्वन्मुखनिःसृतम् ॥३०॥
येनेदमखिलं जातं यदाधारं यदात्मकम् । यस्मिन्प्रतिष्ठितं तात यस्मिन्वा लयमेष्यति ॥३१॥
केन विष्णुः प्रसन्नः स्यात्स कथं पूज्यते नरैः । कथं वर्णाश्रमाचारश्चातिथेः पूजनं कथम् ॥३२॥
सफलं स्याद्यथा कर्म मोक्षोपायः कथं नृणाम् । भक्त्या किं प्राप्यते पुंभिस्तथा भक्तिश्च कीदृशी ॥३३॥
हैं। परमशान्त, उदारचेता सूत जी ही मोक्ष धर्म के ज्ञाता तथा कर्म और भक्तितत्त्व के मर्मज्ञ हैं। मुनिवर व्यास जी
ने जगत्-कल्याण के लिए वेद-वेदाङ्ग और शास्त्रों के सारभूत तत्त्व को पुराणों में कह दिया है। ज्ञान के सागर
सूत जी उन सम्पूर्ण तत्त्वों के ज्ञाता हैं, अतः उन्हीं सर्वज्ञ सूत जी से इन प्रश्नों को पूछना चाहिए। शौनक जी इतना
कह कर चुप हो गये ॥१५-२२॥
उपर्युक्त बातों को सुनकर वे सभी मुनि प्रेम-गद्गद हो गये। उन्होंने परमवाग्मी शौनक को छाती से
लगाया और साधुवाद द्वारा सम्मानित किया। तत्पश्चात् वे मुनि वनमें उस पवित्र सिद्धाश्रम में पहुँचे,
जो मृग-समूह से व्याप्त, मुनिगण से शोभायमान और मनोहर वृक्षों, लताओं, फूलों और फलों से विभूषित था।
विमल जल वाले सरोवर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहां आये हुए अतिथियों के आतिथ्य से विचित्र चहल पहल
थी। उन मुनियों ने अग्निष्टोम यज्ञ द्वारा अनन्त, सर्वातिशायी नारायण की उपासना में तल्लीन रोमहर्षण को
देखा। विख्यात तेजस्वी उन ऋषियों का सूत जी ने यथायोग्य सत्कार किया। वे मुनि भी उस यज्ञशाला में
सूत जी के यज्ञ को देखने के लिए बैठ गए। जब पौराणिकप्रवर सूत जी अवभृथ स्थान (यज्ञ के बाद का स्थान)
कर चुके और सुखपूर्वक अपने आसन पर बैठ गए तब नैमिषारण्यनिवासी उन मुनियों ने विनयपूर्वक
पूछा ॥२३-२८॥
ऋषियों ने कहा—सुव्रत ! हम अतिथि आज आप के समीप आए हुए हैं और आप अतिथिसवापरायण
हैं। अतः आप अपने ज्ञान दान द्वारा हम लोगों की यथाविधि पूजा कीजिए। स्वर्ग में निवास करने वाले
देवता चन्द्रमा की किरणों से अमृत पीकर जीते हैं और मुने ! इस धरातल के निवासी देवता (ब्राह्मण) आपके
मुख चन्द्र से निकली ज्ञानसुधा को पीकर जीते हैं। किससे इस लोक की सृष्टि हुई है ? कौन इसका आधार है ?
क्या इसका स्वरूप है ? तात ! किसमें यह ब्रह्माण्ड प्रतिष्ठित है ? अथवा किसमें यह अखिल लोक पुनः लीन
होगा ? किस उपाय से भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ? किस प्रकार मनुष्यों को उनकी पूजा करनी चाहिए ?
वर्णाश्रमव्यवस्थानुकूल आचार किस प्रकार करनी चाहिए ? मनुष्यों को कर्म में सफलता कैसे मिलेगी ? और
४ प्रथमोऽध्यायः
वद सूत मुनिश्रेष्ठ सर्वमेतदसंशयम् । कस्य नो जायते श्रद्धा श्रोतुं त्वद्वचनामृतम् ॥३४॥
सूत उवाच
शृणुध्वमृषयः सर्वे यदिष्टं वो वदामि तत् । गीतं सनकमुख्यैस्तु नारदाय महात्मने ॥३५॥
पुराणं नारदोपाख्यमेतद्वेदार्थसंमितम् । सर्वपापप्रशमनं दुष्टग्रहनिवारणम् ॥३६॥
दुःस्वप्ननाशनं धर्म्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् । नारायणकथोपेतं सर्वकल्याणकारणम् ॥३७॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां हेतुभूतं महाफलम् । अपूर्वं पुण्यफलदं शृणुध्वं सुसमाहिताः ॥३८॥
महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । श्रुत्वैतदार्षं दिव्यं च पुराणं शुद्धिमाप्नुयात् ॥३९॥
यस्यैकाध्यायपठनाद्वाजिमेधफलं लभेत् । अध्यायद्वयपाठेन राजसूयफलं तथा ॥४०॥
ज्येष्ठमासे पूर्णिमायां मूलर्क्षे प्रयतो नरः । स्नात्वा च यमुनातोये मथुरायामुपोषितः ॥४१॥
अभ्यर्च्य विधिवत्कृष्णं यत्फलं लभते द्विजाः । तत्फलं समवाप्नोति अध्यायत्रयपाठतः ॥४२॥
तत्प्रवक्ष्यामि वः सम्यक् शृणुध्वं गदतो मम । जन्मायुताजितैः पापैर्मुक्तः कोटिकुलान्वितः ॥४३॥
ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्रैव प्रतितिष्ठति । श्रुत्वास्य तु दशाध्यायान्भक्तिभावेन मानवः ॥४४॥
निर्वाणमुक्तिं लभते नात्र कार्या विचारणा । श्रेयसां परमं श्रेयः पवित्राणामनुत्तमम् ॥४५॥
दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं श्रोतव्यं यत्नतो द्विजाः । श्रद्धया सहितो मर्त्यः श्लोकं श्लोकार्द्धमेव वा ॥४६॥
पठित्वा मुच्यते सद्यो महापातकराशिभिः । सतामेव प्रवक्तव्यं गुह्याद्गुह्यतरं यतः ॥४७॥
वाचयेत्पुरतो विष्णोः पुण्यक्षेत्रे द्विजान्तिकै । ब्रह्मद्रोहपराणां च दम्भाचारयुतात्मनाम् ॥४८॥
मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी ? भक्ति से मनुष्य क्या प्राप्त करता है ? भक्ति का स्वरूप क्या है ? हे मुनिश्रेष्ठ
सूत ! इन प्रश्नों का अवश्य समाधान कीजिये जिससे हम लोगों का संशय दूर हो । आपका वचनामृत पान करने
के लिए भला किसकी श्रद्धा नहीं होगी ॥२६-३४॥
सूत बोले—ऋषिवर्यवृन्द ! एवमस्तु, कृपाकर सुनिए ? इस विषय में सनकादि प्रमुख ऋषियों ने
महात्मा नारद से जिस पुराण को कहा है उसी को यहाँ कह रहा हूँ। वह वेदार्थसम्मत पुराण
नारद पुराण नाम से प्रसिद्ध है। वह पापनाशक, दुष्टग्रह-शान्ति-कारक, भुक्ति-मुक्ति-प्रदाता, पुण्यवर्धक, दुःस्व-
प्ननाशक, भगवान् श्रीनारायण की पुण्यकथाओं से सम्पन्न एवं कल्याणप्रद है। ऐसे धर्म-अर्थ, काम और मोक्ष
के हेतुभूत, महाफलदायक अपूर्व और पुण्यफलदायक पुराण आप लोग सावधान होकर सुनें ! छोटे बड़े पापों को करने
वाले व्यक्ति भी इस आर्ष एवं दिव्य पुराण को सुनकर शुद्ध हो जाते हैं। इसके एक अध्याय के पाठ करने से भी
मनुष्य अश्वमेध के बराबर फल पाते हैं । दो अध्याय के पाठ से तो वह राजसूय का फल पा जाता है। जेठ मास की
पूर्णिमा को मूल नक्षत्र में एकाग्र भाव से यमुना में स्नान करने और मथुरा पुरी में उपवास-व्रत करके कृष्ण की
विधिवत् पूजा करने से मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह फल इस पुराण के तीन अध्याय के पाठ से मिल
जाता है । अतएव इस पुराण की कथा आज मैं भलीभाँति कह रहा हूँ, आप लोग सुनें । मनुष्य इस पुराण को
सुनकर दस हजार जन्मों के किये हुए पापों से मुक्त होकर अपने करोड़ों कुलों के साथ ब्रह्म-पद को प्राप्त करता
है । भक्ति पूर्वक इसके दश अध्यायों के सुनने से निर्वाण प्राप्त होता है । इसमें किसी प्रकार की शंका करने की
आवश्यकता नहीं है । द्विजगण ! इस परम पवित्र, कल्याणमय, दुःस्वप्न नाशक पुण्य पुराण को यत्न पूर्वक सुनना
चाहिए । श्रद्धा के सहित मनुष्य यदि एक श्लोक अथवा आधा श्लोक भी पढ़े तो भी असंख्य महापापों से छूट जाता
है ३५-४६३॥ यह पुराण श्रद्धालु व्यक्ति को ही सुनाना चाहिए, क्योंकि इसका रहस्य गोपनीय है । इस पुराण को
नारदीयपुराणम् ५
जनानां बकवृत्तीनां न ब्रूयादिदमुत्तमम् । त्यक्तकामादिदोषाणां विष्णुभक्तिरतात्मनाम् ॥४९॥
सदाचारपराणां च वक्तव्यं मोक्षसाधनम् । सर्वदेवमयो विष्णुःस्मरतामार्त्तिनाशनः ॥५०॥
सद्भक्तिवत्सलो विप्रा भक्त्या तुष्यति नान्यथा । अश्रद्धयापि यन्नाम्नि कीर्त्तितेऽथस्मृतेऽपि वा ॥५१॥
विमुक्तः पातकैर्मर्त्यो लभते पदमव्ययम् । संसारघोरकान्तारदावाग्निर्मधुसूदनः ॥५२॥
स्मरतां सर्वपापानि नाशयत्याशु सत्तमाः । तदर्थद्योतकमिदं पुराणं श्राव्यमुत्तमम् ॥५३॥
श्रवणात्पठनाद्वापि सर्वपापविनाशकृत् । यस्यास्य श्रवणे बुद्धिर्जायते भक्तिसंयुता ॥५४॥
स एव कृतकृत्यस्तु सर्वशास्त्रार्थकोविदः । यदजितं तपः पुण्यं तन्मन्ये सफलं द्विजाः ॥५५॥
यदस्य श्रवणे भक्तिरन्यथा नहि जायते । सत्कथासु प्रवर्त्तन्ते सज्जना ये जगद्धिताः ॥५६॥
निन्दायां कलहे वापि ह्यसन्ततः पापतत्पराः । पुराणेष्वर्थवादत्वं ये वदन्ति नराधमाः ॥५७॥
तैरर्जितानि पुण्यानि क्षयं यान्ति द्विजोत्तमाः । समस्तकर्मनिर्मूलसाधनानि नराधमः ॥५८॥
पुराणान्यर्थवादेन ब्रुवन्नरकमाश्नुते । अन्यानि साधयन्त्येव कार्याणि विधिना नराः ॥५९॥
पुराणानि द्विजश्रेष्ठाः साधयन्ति न मोहिताः । अनायासेन यः पुण्यानीच्छतीह द्विजोत्तमाः ॥६०॥
श्रोतव्यानि पुराणानि तेन वै भक्तिभावतः । पुराणश्रवणे बुद्धिर्यस्य पुंसः प्रवर्त्तते ॥६१॥
पुरार्जितानि पापानि तस्य नश्यन्त्यसंशयम् । पुराणे वर्त्तमानेऽपि पापपाशेन यन्त्रितः ॥
आदरेणान्यगाथासु सक्तबुद्धिः पतत्यधः ॥६२॥
पवित्र क्षेत्र में द्विजातियों के समीप भगवान् विष्णु के सान्निध्य में सुनाना चाहिए । ब्रह्मद्रोह करने वालों, पाखण्ड
में रत रहने वालों और बगुला भक्तों को तो कभी भी यह उत्तम पुराण नहीं सुनाना चाहिए । यह मोक्षदायी
पुराण सदाचारपरायण, कामादिदोषरहित और विष्णु-भक्ति में तल्लीन रहने वाले महापुरुषों को सुनाना
चाहिए । विप्रगण ! स्मरण करने वालों की पीड़ा दूर करने वाले, सच्ची भक्ति के स्नेही और अखिल देव स्वरूप
विष्णु भक्ति से सन्तुष्ट होते हैं, अन्य प्रकार से नहीं । मनुष्य यदि बिना श्रद्धा के भी विष्णु का नाम कीर्तन अथवा
स्मरण करे तो भी अपने पापों से मुक्त होकर शाश्वत पद को प्राप्त करता है । सज्जनो ! संसार रूपी घोर महा-
वन के लिए वनाग्नि के समान मधुसूदन भगवान् अपने स्मरण करने वालों का सब पाप शीघ्र नष्ट कर देते हैं ।
उनकी महिमा को प्रकट करने वाले इस उत्तम पुराण का तो सर्वदा श्रवण करना चाहिए । इसके सुनने और
स्वयं पाठ करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । द्विजो ! जिस मनुष्य की इस पुराण के श्रवण में
श्रद्धायुक्त बुद्धि हो जाती है, वही कृतकृत्य है वही सब शास्त्रों का ज्ञाता है । द्विजगण ! अर्जित किये हुए तप
और पुण्य के फलोदय होने से इस पुराण के सुनने में भक्ति होती है, अन्यथा नहीं । सत्कथाओं को सुनने की इच्छा
उन्हीं व्यक्तियों को होती है जो सज्जन और जगत् का कल्याण करने वाले हैं ।४७-५६॥
जो दुष्ट और पापी हैं वे तो सर्वदा परनिन्दा और कलह में लगे रहते हैं । जो नराधम पुराणों पर अर्थ-
वाद का दोष लगाते हैं अर्थात् पुराणों को असत्य और अत्युक्ति कहते हैं, उनके पूर्वार्जित सभी सुकृत नष्ट
हो जाते हैं । समस्त कर्मों को निर्मूल करने के साधन पुराणों को अर्थवाद से युक्त कहने वाला नराधम
नरक भोग करता है । मोहग्रस्त द्विजवर पुराणों को नहीं साधते हैं । द्विजश्रेष्ठो ! जो व्यक्ति अनायास
पुण्य प्राप्त करना चाहते हैं, उनको अवश्य भक्तिपूर्वक पुराणों का श्रवण करना चाहिए । पुराणों के श्रवण में
जिस मनुष्य की रुचि हो जाती है निःसन्देह उसके पूर्वार्जित पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । पुराणों के रहते हुए
भी पाप की रस्सी में बँधा प्राणी अन्य कथाओं की ओर मन लगाकर पाप के गड्ढे में गिरता है ॥५७-६२॥