सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

नारदीयपुराणम् ३
वेदवेदाङ्गशास्त्राणां सारभूतं मुनीश्वराः । जगद्धितार्थं तत्सर्वं पुराणेषूक्तवान्मुनिः ॥२१॥
ज्ञानार्णवो वै सूतस्तत्सर्वतत्त्वार्थकोविदः । तस्मात्तमेव पृच्छाम इत्यूचे शौनको मुनीन् ॥२२॥
ततस्ते मुनयः सर्वे शौनकं वाग्विदां वरम् । समाश्लिष्य सुसंप्रीताः साधु साध्विति चाब्रुवन् ॥२३॥
अथ ते मुनयो जग्मुः पुण्यं सिद्धाश्रमं वने । मृगव्रजसमाकीर्णं मुनिभिः परिशोभितम् ॥२४॥
मनोज्ञभूरुहलताफलपुष्पविभूषितम् । युक्तं सरोभिरच्छोदैरतिथ्यातिथ्यसंकुलम् ॥२५॥
ते तु नारायणं देवमनन्तमपराजितम् । यजन्तमग्निष्टोमेन ददृशु रोमहर्षणम् ॥२६॥
यथार्हमर्चितास्तेन सूतेन प्रथितौजसः । तस्यावभृथमैक्षन्तस्तत्र तस्थुर्मखालये ॥२७॥
अधरावभृथस्नातं सूतं पौराणिकोत्तमम् । पप्रच्छुस्ते सुखासीनं नैमिषारण्यवासिनः ॥२८॥
ऋषय ऊचुः
वयं त्वतिथयः प्राप्ता आतिथेयास्तु सुव्रत । ज्ञानदानोपचारेण पूजयास्मान्यथाविधि ॥२६॥
दिवौकसो हि जीवन्ति पीत्वा चन्द्रकलामृतम् । ज्ञानामृतं भूसुरास्तु मुने त्वन्मुखनिःसृतम् ॥३०॥
येनेदमखिलं जातं यदाधारं यदात्मकम् । यस्मिन्प्रतिष्ठितं तात यस्मिन्वा लयमेष्यति ॥३१॥
केन विष्णुः प्रसन्नः स्यात्स कथं पूज्यते नरैः । कथं वर्णाश्रमाचारश्चातिथेः पूजनं कथम् ॥३२॥
सफलं स्याद्यथा कर्म मोक्षोपायः कथं नृणाम् । भक्त्या किं प्राप्यते पुंभिस्तथा भक्तिश्च कीदृशी ॥३३॥
हैं। परमशान्त, उदारचेता सूत जी ही मोक्ष धर्म के ज्ञाता तथा कर्म और भक्तितत्त्व के मर्मज्ञ हैं। मुनिवर व्यास जी
ने जगत्-कल्याण के लिए वेद-वेदाङ्ग और शास्त्रों के सारभूत तत्त्व को पुराणों में कह दिया है। ज्ञान के सागर
सूत जी उन सम्पूर्ण तत्त्वों के ज्ञाता हैं, अतः उन्हीं सर्वज्ञ सूत जी से इन प्रश्नों को पूछना चाहिए। शौनक जी इतना
कह कर चुप हो गये ॥१५-२२॥
उपर्युक्त बातों को सुनकर वे सभी मुनि प्रेम-गद्गद हो गये। उन्होंने परमवाग्मी शौनक को छाती से
लगाया और साधुवाद द्वारा सम्मानित किया। तत्पश्चात् वे मुनि वनमें उस पवित्र सिद्धाश्रम में पहुँचे,
जो मृग-समूह से व्याप्त, मुनिगण से शोभायमान और मनोहर वृक्षों, लताओं, फूलों और फलों से विभूषित था।
विमल जल वाले सरोवर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहां आये हुए अतिथियों के आतिथ्य से विचित्र चहल पहल
थी। उन मुनियों ने अग्निष्टोम यज्ञ द्वारा अनन्त, सर्वातिशायी नारायण की उपासना में तल्लीन रोमहर्षण को
देखा। विख्यात तेजस्वी उन ऋषियों का सूत जी ने यथायोग्य सत्कार किया। वे मुनि भी उस यज्ञशाला में
सूत जी के यज्ञ को देखने के लिए बैठ गए। जब पौराणिकप्रवर सूत जी अवभृथ स्थान (यज्ञ के बाद का स्थान)
कर चुके और सुखपूर्वक अपने आसन पर बैठ गए तब नैमिषारण्यनिवासी उन मुनियों ने विनयपूर्वक
पूछा ॥२३-२८॥
ऋषियों ने कहा—सुव्रत ! हम अतिथि आज आप के समीप आए हुए हैं और आप अतिथिसवापरायण
हैं। अतः आप अपने ज्ञान दान द्वारा हम लोगों की यथाविधि पूजा कीजिए। स्वर्ग में निवास करने वाले
देवता चन्द्रमा की किरणों से अमृत पीकर जीते हैं और मुने ! इस धरातल के निवासी देवता (ब्राह्मण) आपके
मुख चन्द्र से निकली ज्ञानसुधा को पीकर जीते हैं। किससे इस लोक की सृष्टि हुई है ? कौन इसका आधार है ?
क्या इसका स्वरूप है ? तात ! किसमें यह ब्रह्माण्ड प्रतिष्ठित है ? अथवा किसमें यह अखिल लोक पुनः लीन
होगा ? किस उपाय से भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ? किस प्रकार मनुष्यों को उनकी पूजा करनी चाहिए ?
वर्णाश्रमव्यवस्थानुकूल आचार किस प्रकार करनी चाहिए ? मनुष्यों को कर्म में सफलता कैसे मिलेगी ? और