बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 621 of 1402
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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ : ६१३
| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स एव हि परमेश्वरो नामरूपे व्याकुर्वाणो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । | नाम और रूपको व्यक्त करनेवाला वह परमेश्वर ही रूप-रूपके प्रतिरूप हो गया। |
| किमर्थं पुनः प्रतिरूपमागमनं तस्य ? इत्युच्यते—तदस्यात्मनो रूपं प्रतिचक्षणाय प्रतिख्यापनाय। यदि हि नामरूपे न व्याक्रियेते, तदा अस्यात्मनो निरुपाधिकं रूपं प्रज्ञानघनाख्यं न प्रतिख्यायेत। यदा पुनः कार्यकारणात्मना नामरूपे व्याकृते भवतः, तदास्य रूपं प्रतिख्यायेत । | किंतु उसका प्रतिरूपको प्राप्त होना किसलिये हुआ ! सो अब बतलाया जाता है—वह इस आत्माके रूपके प्रतिचक्षण—प्रतिख्यापनके लिये है, क्योंकि यदि नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति न होती तो इस आत्माका प्रज्ञानघनसंज्ञक निरुपाधिक रूप प्रकट नहीं हो सकता था। किंतु जिस समय कार्य-करणभावसे नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति होती है, तभी इसका रूप प्रकट होता है। |
| इन्द्रः परमेश्वरो मायाभिः प्रज्ञाभिः नामरूपभूतकृतमिथ्याभिमानैर्वा, न तु परमार्थतः; पुरुरूपो बहुरूप ईयते गम्यते, एकरूप एव प्रज्ञानघनः सन्—विद्याप्रज्ञाभिः। कस्मात् पुनः कारणात् ? युक्ता रथ इव वाजिनः स्वविषयप्रकाशनाय, हि यस्मादस्य हरयो हरणादिन्द्रियाणि, शता | इन्द्र—परमेश्वर मायाओंसे अर्थात् प्रज्ञासे अथवा नाम-रूप उपाधिजनित मिथ्या अभिमानसे पुरुरूप—अनेकरूप हुआ जाना जाता है, परमार्थतः अनेकरूप नहीं होता। अर्थात् वह प्रज्ञानघन एकरूप ही होते हुए अविद्याजनित प्रज्ञाओंसे अनेकरूप भासता है। किंतु ऐसा किस कारणसे होता है ! क्योंकि अपने विषयोंको प्रकाशित करनेके लिये, रथमें जुते हुए घोड़ोंके समान, इसके शत और दश हरि (इन्द्रियाँ) हैं। विषयोंको हरण करनेके कारण इन्द्रियोंका |