Skip to content
SarvaKosh
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 620 of 1402

Read in context
Page 620
६१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । रूपँ रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दशेति । अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १९ ॥

उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। यह देखते हुए ऋषिने कहा—वह रूप-रूपके प्रतिरूप हो गया। इसका वह रूप प्रतिख्यापन (प्रकट) करनेके लिये है। ईश्वर मायासे अनेकरूप प्रतीत होता है [ शरीररूप रथमें जोड़े हुए ] इसके [ इन्द्रियरूप ] घोड़े शत और दश हैं! यह (परमेश्वर) ही हरि (इन्द्रियरूप अश्व) है; यही दश, सहस्र, अनेक और अनन्त है। वह यह ब्रह्म अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित), अनन्तर (विजातीय द्रव्यसे रहित) और अबाह्य है। यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। यही समस्त वेदान्तोंका अनुशासन (उपदेश) है॥ १९॥

| इदं वै तन्मध्वित्यादि पूर्ववत् । रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । रूपं रूपं प्रति प्रतिरूपो रूपान्तरं बभूवेत्यर्थः । प्रतिरूपोऽनुरूपो वा यादृक्संस्थानौ मातापितरौ तत्संस्थानस्तदनुरूप एव पुत्रो जायते । न हि चतुष्पदो द्विपाज्जायते द्विपदो वा चतुष्पात् । | ‘इदं वै तन्मधु’ इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है। रूप-रूपके प्रतिरूप हो गया अर्थात् रूप-रूपके प्रति उसीके समान अन्य रूपवाला हो गया। प्रतिरूप अर्थात् अनुरूप, क्योंकि माता-पिता जैसे स्वरूपवाले होते हैं वैसे ही स्वरूपवाला अर्थात् उन्हींके अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है; क्योंकि चतुष्पदसे द्विपद और द्विपदसे चतुष्पदकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सो |