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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 622 of 1402

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Page 622

६१४ : बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २

संस्कृतहिन्दी
शतानि, दश च प्राणिभेदबाहुल्याच्छतानि दश च भवन्ति। तस्मादिन्द्रियविषयबाहुल्यात्तत्प्रकाशनायैव च युक्तानि तानि न आत्मप्रकाशनाय । “पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः” (२। १। १) इति हि काठके। तस्मात्तैरेव विषयस्वरूपैरीयते न प्रज्ञानघनैकरसेन स्वरूपेण ।नाम हरि है, प्राणिभेदकी बहुलताके कारण वे शत और दश हैं। अतः इन्द्रियोंके विषयोंकी बहुलता होनेके कारण वे उन्हींको प्रकाशित करनेमें नियुक्त हैं, आत्माको प्रकाशित करनेमें नहीं। कठोपनिषद्‌में कहा भी है कि “स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है।” अतः वह उन विषयरूपोंसे ही अनेकरूप भासता है, प्रज्ञानघन एकरसस्वरूपसे नहीं।
एवं तर्हि अयमन्यः परमेश्वरोऽन्ये हरय इत्येवं प्राप्ते उच्यते—इस प्रकार तब तो यह परमेश्वर अन्य है और इन्द्रियाँ अन्य हैं—ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं—
अयं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च।यह परमेश्वर ही इन्द्रियाँ हैं तथा यही दश, सहस्र, अनेक और अनन्त हैं,
प्राणिभेदस्यानन्त्यात्। किं बहुना,क्योंकि प्राणियोंके भेदका कोई अन्त नहीं है। अधिक क्या कहा जाय,
तदेतद्ब्रह्म य आत्मा। अपूर्वं नास्य कारणं पूर्वं विद्यत इत्यपूर्वम्। नास्यापरं कार्यं विद्यत इत्यनपरम्। नास्य जात्यन्तरमन्तराले विद्यत इत्यनन्तरम्। तथा बहिरस्य न विद्यत इत्यबाह्यम्।यह जो आत्मा है वही ब्रह्म है। यह अपूर्व है इसका कोई पूर्व यानी कारण नहीं है, इसलिये यह अपूर्व है। इसका अपर—कार्य नहीं है, इसलिये यह अनपर है। इसके मध्यमें कोई जात्यन्तर नहीं है, इसलिये यह अनन्तर है। तथा इसके बाहर कुछ नहीं है, इसलिये यह अबाह्य है।
किं पुनस्तन्निरन्तरं ब्रह्म ? अयमात्मा। कोऽसौ ? यः प्रत्य-तो फिर वह निरन्तर ब्रह्म कौन है? यह आत्मा। आत्मा कौन