ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context३७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
गया है कि 'वह मनके द्वारा संकल्पमात्रसे ही सब दिव्य भोगोंको प्राप्त कर
लेता है।'
सम्बन्ध—उसे संकल्पमात्रसे जो दिव्य भोग प्राप्त होते हैं, उनके उपभोगके
लिये वह शरीर भी धारण करता है या नहीं ? इसपर आचार्य बादरिका मत
उपस्थित करते हैं—
अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ ४ । ४ । १० ॥
अभावम्=उसके शरीर नहीं होता ऐसा; बादरिः=आचार्य बादरि मानते
हैं; हि=क्योंकि; एवम्=इसी प्रकार; आह=श्रुति कहती है।
व्याख्या—आचार्य बादरिका कहना है कि उस लोकमे स्थूल शरीरका
अभाव है, अतः बिना शरीरके केवल मनसे ही उन भोगोंको भोगता है; क्योकि
श्रुतिमे इस प्रकार कहा है—'स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान्
पश्यन् रमते । य एते ब्रह्मलोके।' (छा० उ० ८ । १२ । ५, ६) 'निश्चय
ही वह यह आत्मा इस दिव्य नेत्र मनके द्वारा जो ये ब्रह्मलोकके भोग हैं, इनको
देखता हुआ रमण करता है।' इसके सिवा, उसका अपने दिव्यरूपसे
सम्पन्न होना भी कहा है (८। १२। २)। दिव्य रूप स्थूल देहके बन्धनसे
रहित होता है। इसलिये कार्यब्रह्मके लोकमे गये हुए मुक्तात्माके स्थूल शरीरका
अभाव मानना ही उचित है। (८ । १३ । १)।
सम्बन्ध—इस विषयमें आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं—
भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ॥ ४ । ४ । ११ ॥
जैमिनिः=आचार्य जैमिनि; भावम्=मुक्तात्माके शरीरका अस्तित्व मानते हैं;
विकल्पामननात्=क्योंकि कई प्रकारसे स्थित होनेका श्रुतिमें वर्णन आता है।
व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कहना है कि 'मुक्तात्मा एक प्रकारसे होता
है, तीन प्रकारसे होता है, पाँच प्रकारसे होता है, सात प्रकारसे, नौ प्रकारसे
तथा ग्यारह प्रकारसे होता है, ऐसा कहा गया है।' (छा० उ० ७ । २६ । २)
इस तरह श्रुतिमे उसका नाना भावोंसे युक्त होना कहा है, इससे यही सिद्ध
होता है कि उसके स्थूल शरीरका भाव है अर्थात् वह शरीरसे युक्त होता है,
अन्यथा इस प्रकार श्रुतिका कहना सङ्गत नहीं हो सकता।