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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 396

सूत्र ६-९ ] अध्याय ४ ३७५
परमात्माके सदृश दिव्यगुणोंसे सम्पन्न होता है—यह बात श्रुतियों और
स्मृतियोंमे कही गयी है तथा आचार्य औडुलोमिके कथनानुसार चेतनमात्र
स्वरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी पाया जाता है। इसी प्रकार पहले
( ४ । ४ । ४ सूत्रमे ) जैसा बताया गया है, उसके अनुसार परमेश्वरमें
अभिन्नरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी मिलता है। इसलिये यही मानना ठीक है
कि उस मुक्तात्माके भावानुसार उसकी तीनों ही प्रकारसे स्थिति हो सकती है।
इसमें कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—यहाँतक परमधाममें जानेवाले उपासकोंके विषयमें निर्णय किया
गया। अब जो उपासक प्रजापति ब्रह्माके लोकको प्राप्त होते हैं, उनके विषयमें
निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। यहाँ प्रश्न होता
है कि उन उपासकोंको ब्रह्मलोकोंके भोगोंकी प्राप्ति किस प्रकार होती है, इसपर
कहते हैं—
संकल्पादेव तु तच्छ्रुतेः ॥ ४ । ४ । ८ ॥
तु=( उन भोगोंकी प्राप्ति ) तो; संकल्पात्=संकल्पसे; एव=ही होती है;
तच्छ्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें यही बात कही गयी है।
व्याख्या—'यह आत्मा मनरूप दिव्य नेत्रोंसे ब्रह्मलोकके समस्त भोगोंको
देखता हुआ रमण करता है।' (छा० उ० ८ । १२। ५, ६) यह बात श्रुतिमें
कही गयी है; इससे यह सिद्ध होता है कि मनके द्वारा केवल संकल्पसे ही
उपासकको उस लोकके दिव्य भोगोंका अनुभव होता है।
सम्बन्ध—युक्तिसे भी उसी बातको दृढ़ करते हैं—
अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ४ । ४ । ९ ॥
अत एव=इसीलिये; च=तो; अनन्याधिपतिः=( मुक्तात्माको ) ब्रह्माके
सिवा अन्य स्वामीसे रहित बताया गया है।
व्याख्या—'वह स्वाराज्यको प्राप्त हो जाता है, मनके स्वामी हिरण्यगर्भको
प्राप्त हो जाता है; अतः वह स्वयं बुद्धि, मन, वाणी, नेत्र और श्रोत्र—सबका
स्वामी हो जाता है ?' ( तै० उ० १ । ६ ) । भाव यह कि एक ब्रह्माजीके
सिवा अन्य किसीका भी उसपर आधिपत्य नहीं रहता, इसीलिये पूर्वसूत्रमें कहा