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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 398

सूत्र १०—१४ ] अध्याय ४ ३७७
सम्बन्ध—अब इस विषयमें आचार्य बादरायण अपना मत प्रकट करते हैं—
द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥ ४ । ४ । १२ ॥
बादरायणः=वेदव्यासजी कहते हैं कि; अतः=पूर्वोक्त दोनों मतोंसे;
द्वादशाहवत्=द्वादशाह यज्ञकी भाँति; उभयविधम्=दोनों प्रकारकी स्थिति
उचित है ।
व्याख्या—वेदव्यासजी कहते हैं कि दोनों आचार्योंका कथन प्रमाणयुक्त है;
अतः उपासकके संकल्पानुसार शरीरका रहना और न रहना दोनों ही सम्भव
हैं। जैसे द्वादशाह-यज्ञ श्रुतिमें कहीं अनेककर्तृक होनेपर 'सत्र' और नियत-
कर्तृक होनेपर 'अहीन' माना गया है, उसी तरह यहाँ भी श्रुतिमें दोनों
प्रकारका कथन होनेसे मुक्तात्माका स्थूल शरीरसे युक्त होकर दिव्य भोगोंका
भोगना और बिना शरीरके केवल मनसे ही उनका उपभोग करना भी सम्भव है।
उसकी यह दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है, इसमें कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—बिना शरीरके केवल मनसे उपभोग कैसे होता है ? इस जिज्ञासा-
पर कहते हैं—
तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ॥ ४ । ४ । १३ ॥
तन्वभावे=शरीरके अभावमें; सन्ध्यवत्=स्वप्नकी भाँति ( भोगोंका उपभोग
होता है ); उपपत्तेः=क्योंकि यही मानना युक्तिसंगत है ।
व्याख्या—जैसे स्वप्नमें स्थूल शरीरके बिना केवल मनसे ही समस्त भोगों-
का उपभोग होता देखा जाता है, वैसे ही ब्रह्मलोकमें भी बिना शरीरके समस्त
दिव्य भोगोंका उपभोग होना सम्भव है; इसलिये बादरायणकी यह मान्यता सर्वथा
उचित ही है ।
सम्बन्ध—शरीरके द्वारा किस प्रकार उपभोग होता है ? इस जिज्ञासापर
कहते हैं—
भावे जाग्रद्वत् ॥ ४ । ४ । १४ ॥
भावे=शरीर होनेपर; जाग्रद्वत्=जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति ( उपभोग होना
युक्तिसंगत है )।