Skip to content
SarvaKosh
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

Page 241 of 417

Read in context
Page 241

२२० वेदान्त-दर्शन [ पाद १
सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी बातको कहते हैं—
अपि च सप्त ॥ ३ । १ । १५ ॥
अपि च = इसके सिवा; सप्त = पापकर्मका फल भोगनेके लिये प्रधानतः सात
नरकोंका भी वर्णन आया है।
व्याख्या—इसके सिवा, पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये पुराणोंमें प्रधानतासे
रौरव आदि सात नरकोंका भी वर्णन किया गया है, इससे उन पापकर्मियोंके
स्वर्गगमनकी तो सम्भावना ही नहीं की जा सकती।
सम्बन्ध—नरकोंमें तो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी बताये गये हैं, फिर
यह कैसे कहा कि पापीलोग यमराजके अधिकारमें दण्ड भोगते हैं ? इसपर
कहते हैं—
तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॥ ३ । १ । १६ ॥
च=तथा; तत्र=उन यातनाके स्थानोंमे; अपि=भी; तद्व्यापारात्=उस यमराज-
के ही आज्ञानुसार कार्य होनेसे; अविरोधः=किसी प्रकारका विरोध नहीं है।
व्याख्या—यातना भोगनेके लिये जो रौरव आदि सात नरक बताये गये हैं,
और वहाँ जो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी हैं, वे यमराजके आज्ञानुसार कार्य
करते हैं, इसलिये उनका किया हुआ कार्य भी यमराजका ही कार्य है। अतः
यमराजके अधिकारमें पापियोंके दण्ड भोगनेकी जो बात कही गयी है, उसमें
कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—ऐसा मान लेनेपर भी पूर्वोक्त श्रुतिमें जो सबके चन्द्रलोकमें जाने-
की बात कही गयी, उसकी संगति (कौ० १ । २) कैसे होगी ? इसपर
कहते हैं—
विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥ ३ । १ । १७ ॥
विद्याकर्मणोः=ज्ञान और शुभ कर्म—इन दोनोंका; तु=ही; प्रकृत-
त्वात्=प्रकरण होनेके कारण; इति=ऐसा कथन उचित ही है।
व्याख्या—जिस प्रकार छान्दोग्योपनिषद् (५ । १० । १) मे विद्या और
शुभ कर्मोंका फल बतानेका प्रसङ्ग आरम्भ करके देवयान और पितृयान-
मार्गकी बात कही गयी है, उसी प्रकार वहाँ कौषीतकि उपनिषद्मे भी ज्ञान