ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र ११-१४ ] अध्याय ३ २१९
व्याख्या—यहाँ पापीलोगोंका चन्द्रलोकमें जाना नहीं कहा गया है, क्योंकि
पुण्यकर्मोंका फल भोगनेके लिये ही स्वर्गलोकमें जाना होता है; चन्द्रलोकमें बुरे
कर्मोंका फल भोगनेकी व्यवस्था नहीं है; इसलिये यही समझना चाहिये कि
अच्छे कर्म करनेवाले ही चन्द्रलोकमें जाते हैं। उनसे भिन्न जो पापीलोग हैं, वे
अपने पापकर्मका फल भोगनेके लिये यमलोकमें जाते हैं, वहाँ पापकर्मोंका फल
भोग लेनेके बाद उनका पुनः कर्मानुसार गमनागमन यानी नरकसे
मृत्युलोकमें आना और पुनः नये कर्मानुसार स्वर्गमें जाना या नरक आदि
अधोगतिको पाना होता रहता है। उन लोगोंकी गतिका ऐसा ही वर्णन श्रुतिमें
देखा जाता है। कठोपनिषद्में यमराजने स्वयं कहा है कि—
न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥
'सम्पत्तिके अभिमानसे मोहित हुए, निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको
परलोक नहीं दीखता। वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही सत्य है,
दूसरा कोई लोक नहीं, इस प्रकार माननेवाला मनुष्य बार-बार मेरे वशमें पड़ता है।'
(कठ० १। २। ६) इससे यही सिद्ध होता है कि शुभ कर्म करनेवाला ही
पितृयानमार्गसे या अन्य मार्गसे स्वर्गलोकमें जाता है, पापीलोग यमलोकमें जाते
हैं। कौषीतकि-ब्राह्मणमें जिनके चन्द्रलोकमें जानेकी बात कही गयी है, वे-सब
पुण्यकर्म करनेवाले ही हैं; क्योंकि उसी श्रुतिमें चन्द्रलोकसे लौटनेवालोंकी
कर्मानुसार गति बतायी गयी है। इसलिये दोनों श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये स्मृतिका प्रमाण देते हैं—
स्मरन्ति च ॥ ३ । १ । १४ ॥
च=तथा; स्मरन्ति=स्मृतिमें भी इसी बातका समर्थन किया गया है।
व्याख्या—गीतामें सोलहवें अध्यायके ७ वें श्लोकसे १५ वें श्लोकतक
आसुरी प्रकृतिवाले पापी पुरुषोंके लक्षणका विस्तारपूर्वक वर्णन करके अन्तमें
कहा है कि 'वे अनेक प्रकारके विचारोंसे भ्रान्त हुए, मोहजालमें फँसे हुए और
भोगोंके उपभोगमें रचे-पचे हुए मूढ़लोग कुम्भीपाक आदि अपवित्र नरकोंमें गिरते हैं'
(गीता १६। १६)। इस प्रकार स्मृतिके वर्णनसे भी उसी बातका समर्थन होता है।
अतः पापकर्मियोंका नरकमें गमन होता है; यही मानना ठीक है।