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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 242

सूत्र १५-१९ ] अध्याय ३ २२१ .
और शुभ कर्मोंका फल बतानेके प्रकरणमे ही उक्त कथन है। इसलिये यह
समझना चाहिये कि जो शुभ कर्म करनेवाले अधिकारी मनुष्य इस लोकसे जाते
है, वे ही सब-के-सब चन्द्रलोकको जाते है; अनिष्ट कर्म करनेवाले नहीं; क्योंकि
उनका प्रकरण नहीं है।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'कठोपनिषद्में जो पापियोंके लिये
यमलोकमे जानेकी बात कही गयी है, वह छान्दोग्य-श्रुतिमें बतायी हुई तीसरी
गतिके अन्तर्गत है, या उससे भिन्न ?' इसके उत्तरमें कहते है—
न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ ३ । १ । १८ ॥
तृतीये=वहाँ कही हुई तीसरी गतिमेः न=(यमलोकगमनरूप गतिका )
अन्तर्भाव नहीं होता; तथा उपलब्धेः=क्योकि उस वर्णनमे ऐसी ही बात मिलती है।
व्याख्या—वहाँ छान्दोग्योपनिषद् (५ । १० । ८) मे यह बात कही गयी है कि
'अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व
म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम्।' अर्थात् 'देवयान और पितृयान—इन दोनो मार्गोंमेंसे
किसी भी मार्गमे जो ऊपरके लोकोमे नहीं जाते, वे क्षुद्र तथा वार-वार जन्मने-
मरनेवाले प्राणी होते हैं; 'उत्पन्न होओ और मरो'—यह मृत्युलोक ही उनका
तीसरा स्थान है।' इत्यादि। इस वर्णनमे यह पाया जाता है कि उनका किसी
भी परलोकमे गमन नहीं होता, वे इस मृत्युलोकमे ही जन्मने-मरते रहते हैं।
इसलिये इस तीसरी गतिमे यमयातणारूप नरकलोकवाली गतिका अन्तर्भाव नहीं है।
सम्बन्ध—इन तीन गतियोंके सिवा चौथी गति जिसमें नरकयातना आदिके
भोग हैं तथा जो ऊपर कही हुई तीसरी गतिसे भी अधम गति है, उसका
वर्णन कहाँ आता है, इसपर कहते है—
स्मर्यतेऽपि च लोके ॥ ३ । १ । १९ ॥
स्मर्यते=स्मृतियोंमे इसका समर्थन किया गया है; च=तथा; लोके=लोकोंमे,
अपि=भी ( यह बात प्रसिद्ध है )।
व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता ( १४ । १८) मे कहा है कि—
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥