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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 239

२१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
सम्बन्ध—अब पूर्वोक्त शङ्काके उत्तरमें महर्षि बादरिका मत प्रस्तुत करते हैं—
सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॥ ३ । १ । ११ ॥
बादरिः तु = बादरि आचार्य तो; इति = ऐसा ( मानते हैं कि ); सुकृत-
दुष्कृते = इस प्रकरणमें 'चरण' नामसे शुभाशुभ कर्म; एव = ही कहे गये हैं।
व्याख्या—आचार्य श्रीबादरिका कहना है कि यहाँ उपलक्षण माननेकी
कोई आवश्यकता नहीं है; यहाँ 'रमणीयचरण' शब्द पुण्यकर्मोंका और 'कपूयचरण'
शब्द पापकर्मका ही वाचक है। अतः यह समझना चाहिये कि जो रमणीयचरण हैं,
वे शुभ कर्माशयवाले हैं और जो कपूयचरण हैं वे पाप कर्माशयवाले हैं। इसलिये
यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा बचे हुए कर्मसंस्कारोंको साथ लिये हुए ही लौटता है।
सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षी पुनः शङ्का उपस्थित करता है—
अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॥ ३ । १ । १२ ॥
च = किन्तु; अनिष्टादिकारिणाम् = अशुभ आदि कर्म करनेवालोंका; अपि = भी
( चन्द्रलोकमें जाना ); श्रुतम् = वेदमें सुना गया है।
व्याख्या—कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्मे कहा है कि 'ये वैके चास्माल्लोकात्
प्रयन्ति, चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति।' ( १ । २ ) अर्थात् 'जो कोई भी इस
लोकसे जाते हैं, वे सब चन्द्रमाको ही प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार यहाँ
कोई विशेषण न देकर सभीका चन्द्रलोकमें जाना कहा गया है। इससे तो बुरे
कर्म करनेवालोंका भी स्वर्गलोकमें जाना सिद्ध होता है, अतः श्रुतिमें जो यह कहा
गया है कि इष्टापूर्त्त और दानादि शुभ कर्म करनेवाले धूममार्गसे चन्द्रलोकको
जाते हैं, उसके साथ उपर्युक्त श्रुतिका विरोध प्रतीत होता है; उसका निराकरण
कैसे होगा ?
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें उपस्थित की हुई शङ्काका सूत्रकार उत्तर देते हैं—
संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गति-
दर्शनात् ॥ ३ । १ । १३ ॥
तु = किन्तु; इतरेषाम् = दूसरोंका अर्थात् पापकर्म करनेवालोंका; संयमने =
यमलोकमें; अनुभूय = पापकर्मोंका फल भोगनेके बाद; आरोहावरोहौ = चढ़ना-उतरना
होता है; तद्गतिदर्शनात् = क्योंकि उनकी गति श्रुतिमें इसी प्रकार देखी जाती है।