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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 223

२०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
हुई कहने लगीं—'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ।' अन्तमें वे अपना न्याय करानेके
लिये प्रजापतिके पास गयीं। वहाँ उन सबने उनसे पूछा—'भगवन् ! हममें
सर्वश्रेष्ठ कौन है ?' प्रजापतिने कहा—'तुममेसे जिसके निकलनेसे शरीर मुर्दा
हो जाय, वही श्रेष्ठ है।' यह सुनकर वाणी शरीरसे बाहर निकली, फिर चक्षु,
उसके बाद श्रोत्र। इस प्रकार एक-एक इन्द्रियके निकलनेपर भी शरीरका काम
चलता रहा; अन्तमें जब मुख्य प्राणने शरीरसे बाहर निकलनेकी तैयारी की, तब
प्राणशब्दवाच्य मनसहित सब इन्द्रियोंको अपने-अपने स्थानसे विचलित कर दिया।
यह देख वे सब इन्द्रियाँ घबरायीं और मुख्य प्राणसे कहने लगीं 'तुम्हीं हम सबमें
श्रेष्ठ हो, तुम बाहर मत जाओ।' (छा० उ० ५। १। ६ से १२)। इस वर्णनमें
जीवात्माके मन और चक्षु आदि अन्य करणोंके साथ-साथ प्राणका वर्णन आया
है, इससे यह सिद्ध होता है कि जिस प्रकार वे स्वतन्त्र नहीं हैं, जीवात्माके
अधीन हैं, उसी प्रकार मुख्य प्राण भी उसके अधीन है। इसीलिये इन्द्रियनिग्रह-
की भाँति शास्त्रोंमे प्राणको निग्रह करनेका भी उपदेश है। तथा 'आदि' शब्दसे
यह भी सूचित किया गया है कि इन्द्रियादिकी भाँति यह जड भी है, अतः
जीवात्माकी भाँति स्वतन्त्र नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—"यदि चक्षु आदि इन्द्रियोंकी भाँति प्राण भी किसी विषयके
अनुभवका द्वार अथवा किसी कार्यकी सिद्धिमें सहायक होता तब तो इसको भी
'करण' कहना ठीक था; परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता। शास्त्रमें भी मन तथा
दस इन्द्रियोंको ही प्रत्येक कार्यमें करण बताया गया है; प्राणको नहीं। यदि
प्राणको 'करण' माना जाय तो उसके लिये भी किसी ग्राह्य विषयकी कल्पना
करनी पड़ेगी।" इस शङ्काका निवारण करनेके लिये कहते हैं—
अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति ॥ २ । ४ । ११ ॥
च=निश्चय ही; अकरणत्वात्=(इन्द्रियोंकी भाँति) विषयोंके उपभोगमें
करण न होनेके कारण; दोषः=उक्त दोष; न=नहीं है; हि=क्योंकि; तथा=
इसका करण होना कैसा है, यह बात; दर्शयति=श्रुति स्वयं दिखाती है।
व्याख्या—जिस प्रकार चक्षु आदि इन्द्रियाँ रूप आदि विषयोंका ज्ञान करानेमें
करण हैं, इस प्रकार विषयोंके उपभोगमें करण न होनेपर भी उसको जीवात्माके
लिये करण माननेमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि उन सब इन्द्रियोंको प्राण ही