ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र ६—१० ] अध्याय २ २०१
शरीरको आच्छादित किये हुए रहती है, इस बातका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है। अतः
विद्वान् पुरुषोको इसपर विचार करना चाहिये । इन्द्रियोको अणु बतानेवाले
व्याख्याकारोने इस विषयमे श्रुतियों तथा स्मृतियोंका कोई प्रमाण भी उद्धृत नहीं किया है।
श्रेष्ठश्च ॥ २ । ४ । ८ ॥
श्रेष्ठः = मुख्य प्राण; च = भी ( उस परमात्मासे ही उत्पन्न होता है ) ।
व्याख्या—जिसे प्राण नामसे कही जानेवाली इन्द्रियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ सिद्ध
किया गया है, ( प्र० उ० २ । ३, ४; छा० उ० ५ । १ । ७ ) जिसका प्राण,
अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँच नामोंसे वर्णन किया जाता है, वह
मुख्य प्राण भी इन्द्रिय आदिकी भाँति उस परमेश्वरसे ही उत्पन्न होता है। श्रुति भी
इसका समर्थन करती है ( मु० उ० २ । १ । ३ )।
सम्बन्ध—अब प्राणके स्वरूपका निर्धारण करनेके लिये अगला प्रकरण
आरम्भ करते हैं—
न वायुक्रिये पृथगुपदेशात् ॥ २ । ४ । ९ ॥
वायुक्रिये = ( श्रुतिमें वर्णित मुख्य प्राण ) वायु-तत्त्व और उसकी क्रिया;
न = नहीं है (क्योंकि ); पृथगुपदेशात् = उन दोनोंसे अलग इसका वर्णन है।
व्याख्या—श्रुतिमे जहाँ प्राणकी उत्पत्तिका वर्णन आया है (मु० उ० २ । १ ।
३ ) वहाँ वायुकी उत्पत्तिका वर्णन अलग है। इसलिये श्रुतिमे वर्णित मुख्य
प्राण न तो वायुतत्त्व है और न वायुकी क्रियाका ही नाम मुख्य प्राण है, वह
इन दोनोंसे भिन्न पदार्थ है, यही सिद्ध होता है।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि प्राण यदि वायुतत्त्व नहीं है, तो
क्या जीवात्माकी भाँति स्वतन्त्र पदार्थ है, इसपर कहते हैं—
चक्षुरादिवत्तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॥ २ । ४ । १० ॥
तु = किन्तु ( प्राण भी ); चक्षुरादिवत् = चक्षु आदि इन्द्रियोंकी भाँति ( जीवात्मा-
का करण है ); तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः = क्योंकि उन्हींके साथ प्राण और इन्द्रियोंके
संवादमें इसका वर्णन किया गया है तथा उनकी भाँति यह जड भी है ही ।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्मे मुख्य प्राणकी श्रेष्ठता सूचित करनेवाली एक
कथा आती है, जो इस प्रकार है—एक समय सब इन्द्रियाँ परस्पर विवाद करती