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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र ११-१३ ] अध्याय २ २०३
धारण करता है, इस शरीर और इन्द्रियोंका पोषण भी प्राण ही करता है,
प्राणके संयोगसे ही जीवात्मा एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें जाता है ।
इस प्रकार श्रुतिमें इसके करणभावको दिखाया गया है । ( छा० उ०
५ । १ । ६ से प्रकरणकी समाप्तितक ) इस प्रकरणके सिवाय और भी
जहाँ-जहाँ मुख्य प्राणका प्रकरण आया है, सभी जगह ऐसी ही बात कही गयी
है ( प्र० उ० ३ । १० ) ।
सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपि तु—
पञ्चवृत्तिर्मनोवद् व्यपदिश्यते ॥ २ । ४ । १२ ॥
मनोवत् = ( श्रुतिके द्वारा यह ) मनकी भाँति; पञ्चवृत्तिः = पाँच वृत्तियों-
वाला; व्यपदिश्यते = बताया जाता है।
व्याख्या—जिस प्रकार श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियोंके रूपमें मनकी पाँच वृत्तियाँ
मानी गयी हैं, उसी प्रकार श्रुतिने इस मुख्य प्राणको भी पाँच वृत्तियोंवाला बताया
है ( बृह० उ० १ । ५ । ३ )। प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—ये
ही उसकी पाँच वृत्तियाँ हैं, इनके द्वारा यह अनेक प्रकारसे जीवात्माके उपयोगमें
आता है। श्रुतियोंने इसकी वृत्तियोंका भिन्न-भिन्न कार्य विस्तारपूर्वक बताया गया
है ( प्र० उ० ३ । १ से ७ ) । इसलिये भी प्राणको जीवात्माका उपकरण मानना
उचित ही है।
सम्बन्ध—मुख्य प्राणके लक्षणोंका प्रतिपादन करनेके लिये नवें सूत्रसे प्रकरण
आरम्भ करके बारहवें सूत्रतक यह सिद्ध किया गया है कि 'प्राण' जीवात्मा तथा
वायुतत्त्वसे भी भिन्न है। मन और इन्द्रियोंको धारण करनेके कारण यह भी
जीवात्माका करण है। शरीरमें यह पाँच प्रकारोंसे विचरता हुआ शरीरको
धारण करता है और उसमें क्रियाशक्तिका संचार करता है। अब अगले सूत्रमें
इसके स्वरूपका प्रतिपादन करके इस प्रकरणको समाप्त करते हैं—
अणुश्च ॥ २ । ४ । १३ ॥
अणुः = यह सूक्ष्म; च = भी है।
व्याख्या—यह प्राणतत्त्व अपनी पाँच वृत्तियोंके द्वारा स्थूलरूपमें उपलब्ध
होता है; इसके सिवा, यह अणु अर्थात् सूक्ष्म भी है। यहाँ 'अणु' कहनेसे यह