वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context३०६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
सम्बन्ध—पुनः उसी बातको समझानेके लिये कहते हैं—
पूर्ववद्वा॥ ३।२।२९॥
वा = अथवा; पूर्ववत् = जिस प्रकार पहले सिद्ध किया जा चुका है, वैसे
ही (दोनोंका अभेद समझ लेना चाहिये)।
व्याख्या—अथवा पहले (सूत्र २।३।४३ में) जिस प्रकार परमात्माका
अपने अंशभूत जीवसमुदायसे अभेद सिद्ध किया गया है, उसी प्रकार यहाँ
शक्ति और शक्तिमान्का अभेद समझ लेना चाहिये।
सम्बन्ध—शक्ति और शक्तिमान्के अभेदका मुख्य कारण बताते हैं—
प्रतिषेधाच्च॥ ३।२।३०॥
प्रतिषेधात् = दूसरेका प्रतिषेध होनेसे; च = भी (अभेद ही सिद्ध होता है)।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि 'यह जगत् प्रकट होनेसे पहले
एकमात्र परमात्मा ही था, दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था' (ऐ० उ०
१।१।१)। इस कथनमें अन्यका प्रतिषेध होनेके कारण भी यही समझा
जाता है कि जगत्की उत्पत्तिके पहले प्रलयकालमें उस परब्रह्म परमेश्वरकी
दोनों प्रकृतियाँ उसमें विलीन रहती हैं; अतः उनमें किसी प्रकारके भेदकी
प्रतीति नहीं होती है; इसीलिये उनका अभेद बताया गया है।
सम्बन्ध—यहाँतक उस परब्रह्म परमात्माका अपनी दोनों प्रकृतियोंसे
अभेद किस प्रकार है—इसका स्पष्टीकरण किया गया। अब उन दोनोंसे
उसकी विलक्षणता और श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं—
परमतः सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः ॥ ३।२।३१॥
अतः = इस जड-चेतनरूप दोनों प्रकृतियोंके समुदायसे; परम् = (वह ब्रह्म)
अत्यन्त श्रेष्ठ है; सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः = क्योंकि श्रुतिमें सेतु,
उन्मान, सम्बन्ध तथा भेदका वर्णन (करके यही सिद्ध) किया गया है।
व्याख्या—इस जड-चेतनात्मक समस्त जगत्की कारणभूता जो