वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र २८ ] अध्याय ३ ३०५
व्याख्या—जिस प्रकार सर्प कभी संकुचित हो कुण्डलाकार हो जाता
है और कभी अपनी साधारण अवस्थामें रहता है; किंतु दोनों अवस्थाओंमें
वह सर्प एक ही है। साधारण अवस्थामें रहना उसका कारणभाव है, उस
समय उसकी कुण्डलादिभावमें प्रकट होनेकी शक्ति अप्रकट है, तथापि
वह उसमें विद्यमान है और उससे अभिन्न है। एवं कुण्डलादि आकारमें
स्थित होना उसका कार्यभाव है, यही उसकी पूर्वोक्त अप्रकट शक्तिका
प्रकट होना है। उसी प्रकार वह परब्रह्म जब कारण-अवस्थामें रहता है,
उस समय उसकी अपरा तथा परा प्रकृतिरूप दोनों शक्तियाँ सृष्टिके पूर्व
उसमें अभिन्नरूपसे विद्यमान रहती हुई भी अप्रकट रहती हैं और वही
जब कार्यरूपमें स्थित होता है, तब उसकी उक्त दोनों शक्तियाँ भी भिन्न-
भिन्न नाम-रूपोंमें प्रकट हो जाती हैं। अतः श्रुतिमें जो ब्रह्मको निराकार
बताया गया है, वह उसकी कारणावस्थाको लेकर है और जो उसे अपनी
शक्तियोंसे युक्त एवं साकार बताया है, वह उसकी कार्यावस्थाको लेकर
है। इस प्रकार श्रुतिमें उसके कारण और कार्य दोनों स्वरूपोंका वर्णन
हुआ है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमात्मामें उसकी शक्ति
सदा ही अभिन्न रूपसे विद्यमान रहती है।
सम्बन्ध— प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध करते हैं—
प्रकाशाश्रयवद्वा तेजस्त्वात् ॥ ३। २। २८ ॥
वा = अथवा; प्रकाशाश्रयवत् = प्रकाश और उसके आश्रयकी भाँति उनका
अभेद है; तेजस्त्वात् = क्योंकि तेजकी दृष्टिसे दोनों एक ही हैं।
व्याख्या—जिस प्रकार प्रकाश और उसका आश्रय सूर्य वास्तवमें
तेज-तत्त्वके नाते अभिन्न हैं तो भी दोनोंको पृथक्-पृथक् कहा
जाता है, उसी प्रकार परमेश्वर और उसकी शक्ति-विशेष वास्तवमें अभिन्न
होनेपर भी उनका अलग-अलग वर्णन किया जाता है। भाव यह
कि प्रकाश और सूर्यकी भाँति परमात्मा और उसकी प्रकृतिमें परस्पर
भेद नहीं है तो भी इनमें भेद माना जा सकता है।