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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

Page 310 of 486

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Page 310

सूत्र ३१ ] अध्याय ३ ३०७
भगवान्की अपरा एवं परा नामवाली दो प्रकृतियाँ हैं (गीता ७।४, ५),
श्वेताश्वतरोपनिषद् (१।१०)-में जिनका 'क्षर' और 'अक्षर' के नामसे
वर्णन हुआ है, श्रीमद्भगवद्गीतामें कहीं क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके नामसे (१३।१)
तथा कहीं प्रकृति और पुरुषके नामसे (१३।१९) जिनका उल्लेख किया
गया है, उन दोनों प्रकृतियोंसे तथा उन्हींके विस्ताररूप इस दृश्य जगत्से
वह परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वथा विलक्षण एवं परम श्रेष्ठ है (गीता १५।१७);
क्योंकि वेदमें उसकी श्रेष्ठताको सिद्ध करनेवाले चार हेतु उपलब्ध होते
हैं—१-सेतु, २-उन्मान, ३-सम्बन्ध और ४-भेदका वर्णन। सेतुका वर्णन
श्रुतिमें इस प्रकार आया है—'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिः।' (छा० उ०
८।४।१)—'यह जो परमात्मा है, यही सबको धारण करनेवाला सेतु है।'
'एष सेतुर्विधरणः' (बृह० उ० ४। ४। २२)—'यह सबको धारण
करनेवाला सेतु है।' इत्यादि। दूसरा हेतु है उन्मानका वर्णन। उन्मानका अर्थ
है सबसे बड़ा माप-महत् परिमाण। श्रुतिमें उस परमेश्वरको सबसे बड़ा
बताया गया है—'तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँँश्च पूरुषः। पादोऽस्य
सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥' (छा० उ० ३।१२।६)—'उतनी
उसकी महिमा है, वह परम पुरुष परमात्मा इससे भी श्रेष्ठ हैं। सम्पूर्ण
भूत-प्राणी इसका एक पाद हैं और शेष तीन अमृतस्वरूप पाद
अप्राकृत परमधाममें हैं।' तीसरा हेतु है सम्बन्धका प्रतिपादन। परब्रह्म
परमेश्वरको पूर्वोक्त प्रकृतियोंका स्वामी, शासक एवं संचालक बताकर
श्रुतिने इनमें स्वामि-सेवकभाव, शास्य-शासकभाव तथा नियन्तृ-नियन्तव्यभावरूप
सम्बन्धका उपपादन किया है। जैसे—'ईश्वरोंके भी परम महेश्वर,
देवताओंके भी परम देवता, पतियोंके भी परम पति, समस्त ब्रह्माण्डके
स्वामी एवं स्तुति करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हम जानते
हैं।'* (श्वेता० उ० ६।७) 'वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा सबका स्रष्टा,

  • यह मन्त्र सूत्र १।३।४३ की व्याख्यामें आ चुका है।