बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
Page 89 of 315
Read in context- ८१ -
गुणम सहेलिय म्हारीय वात ।
कंचूउ खोति दिपाया गात ।
त्रिय चरित्र मह छपकिया ।
म्हारिय राढ न जाणए बात ।
तउ नउ उपरि अगस पीड़ाडू ।
जिण दीठा मुनियर चळइ ।
म्हे सठ कर योंलियउ कोपियउ नाह ।
तिणि कुवचनइ सपीधण छती ।
ढालीयउ पांसउ चूकउ दाउ ॥ ६९ ॥
[ अर्थात् हे सखी मेरी बात सुनो—मैंने कंचुकी खोलकर अपने अपूर्व यौवन
का दर्शन राजा को कराया तथा अनेक प्रकार के त्रियाचरित्र भी किये ताकि राजा
विदेश भ्रमण न करें लेकिन राजा मेरी बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ ।
जिस नारी सौन्दर्य ने बड़े बड़े मुनियों को भी वशीभूत कर लिया उसी
सौन्दर्य की राजा ने उपेक्षा की । ऐसा करके राजा ने 'भैंस के आगे बीन बजावे
भैस पड़ी पगुराय' वाली उक्ति को चरितार्थ किया है । इत्यादि । ]
ऐसे ही एक अन्य स्थल पर जहाँ बीसलदेव राजमती की पहिचान बताते
हुए उसके सौन्दर्य का वर्णन नाना प्रकार की उपमाओं को देकर योगी को बताता
है उसी जगह उसकी अंगुलियों की उपमा 'मूँगफली' से देकर हास्य रस
उपस्थित कर देता है । देखिये -
भति जोगी कहइ नर नाथ ।
रतन अचोलउ धण कइ हाथि ।
मुंगफली जैसी आँगुली ।
वणारागवन पयडहर काजला रेखि ।
बोलती बोलइ वर अकरी ।
रुणरइ सोवन चूडली झझकइ हाथि ।
चूड़ि ददइ कइ चूडिलउ ।
थे तउ धीरा तिण धण कइ हाथि ॥ २४१ ॥
[ अर्थात् रानी राजमती की अंगुलियाँ मूंगफली जैसी हैं, उसके पयोधर पर
काली रेखायें हैं, वह सुन्दर वाणी बोलती है, उसके हाथों में सुवर्ण की चुड़िया
सुशोभित हैं, इत्यादि ।