बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
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वह सम्भवतः संभोग में नहीं मिलता, और इसीलिए शायद किसी शायर ने कहा
है कि 'जो मज़ा इन्तज़ार में देखा, वह नहीं वस्लेयार में देखा।' वियोग
के पश्चात् सम्भोग का होना स्वाभाविक है। अस्तु, कवि नाल्ह ने वियोग के
वर्णन को प्राथमिकता देकर अपने कवि हृदय का परिचय देते हुए परम्परा
के निर्वाह के लिए ग्रन्थ को समाप्त करते करते सम्भोग शृंगार का चित्र भी
अंकित कर दिया है। नायक नायिका के पारस्परिक अवलोकन, आलिंगन आदि
असंख्येय भेदों को सम्भोग शृंगार के अन्तर्गत माना गया है, तथा कहीं यह
नायिकारब्ध और कहीं नायकारब्ध होता है। इस रासो में नायकारब्ध सम्भोग
शृंगार का उदाहरण ही हमें प्राप्त होता है। बीसलदेव बारह वर्षों के प्रवास के
पश्चात् लौटकर जब रानी राजमती से मिलता है तो उसकी अंग शोभा वीसल-
देव के मन में उद्दीपन भाव उत्पन्न करती है। उसके पयोधर पर राजा का हाथ
अनुभाव तथा राजा द्वारा उसका आलिंगन व्यभिचारी भाव हैं। नायकारब्ध
सम्भोग शृंगार के इस चित्र का कवि ने अपने शब्दों में इस प्रकार वर्णन
किया है—
बारा वरस। घरि आवीयउ राउ।
दियठलइ हाथ गळा गाढ़े बाहु।
अवली सबलो चुंबणी।
आंत रग थी राजा लीयउ टीपि।
सही सहेली चमकउ हूवड।
म्हारुइ भैरव कचूड भीनउ छइ पारु ॥ २३६ ॥
विप्रलम्भ और सम्भोग शृंगार के अतिरिक्त न तो अन्य रसों की अवतारणा
का कवि ने प्रयास किया है और न इस खण्ड काव्य में अन्य रसों के पूर्ण परि-
पाक की सम्भावना थी। कहीं-कहीं तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि
रस परिपाक तो दूर, वर्ण्य विषय को सुन्दर ढंग से रखने में भी कवि असमर्थ
होकर रसाभास के उदाहरण उपस्थित करता है। राजमती द्वारा अनादृत होकर
बीसलदेव जब उड़ीसा चला जाता है तब राजमती कलहान्तरिता नायिका की
भाँति जहाँ विप्रलंभ शृंगार का उदाहरण सामने रखती है उसी जगह बीसलदेव
को भैंस का पीड़ार (पाड़ा) कहकर बीभत्स रस उपस्थित कर देती है और ग्रामीण
कलहान्तरिता नायिकाओं तक को भी लज्जित कर देती है। संदर्भ से सम्बन्धित
पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—