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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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  • ८३ -

यद्यपि भैंस और मूरगच्छी की उक्तियाँ शृंगार रस में रसाभास उत्पन्न करती
हैं फिर भी इन उक्तियों के अप्रस्तुत रूप में लाये जाने के कारण इस काव्य के
लोकगीत होने का प्रमाण भी मिलता है ।
अलंकार
जिस प्रकार 'रस' काव्य की आत्मा है और काव्य के लिए परमावश्यक
है उसी प्रकार अलंकारों के अतिरिक्त भी काव्य रचना संभव नहीं। क्योंकि
अलंकार हैं क्या ? वर्णन करने की अनेक प्रकार की चमत्कारपूर्ण शैलियाँ जिन्हें
काव्यों से चुन कर प्राचीन आचार्यों ने नाम रखे और लक्षण बनाये ।¹ शैलियाँ
विभिन्न कवियों की विभिन्न हो सकती हैं । इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि
जितने अलंकारों के नाम आचार्यों ने निश्चित कर दिये हैं उनके अतिरिक्त अलंकार
नहीं हो सकते । देखा यह गया है कि नए आचार्य नये अलंकारों की सृष्टि करते
आये हैं । अतः किसी ग्रन्थ विशेष में यदि हमें मिलने वाले अलंकारों में से कोई
अलंकार नहीं मिलता तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह काव्यग्रन्थ अलंकार शून्य
है, क्योंकि काव्य रचना के लिए किसी न किसी शैली की आवश्यकता कवि को
पड़ेगी और जब वह किसी शैली का अनुसरण करेगा तब अलंकार भी उस काव्य
में होगा ही ।
बीसलदेव रासो में नाल्ह ने सादृश्यमूलक अलंकारों का ही आश्रय अधिक
लिया है । इन अलंकारों के सहारे कवि को अपनी कल्पना की उड़ान में बहुत
ऊपर तक उड़ने का अवसर मिला है । कहीं कहीं तो ऐसे उपमान और उपमेय का
आयोजन हुआ है जिनका सम्बन्ध पृथ्वी के जीव से नहीं वरन् ज्योतिष शास्त्र से
है । सादृश्यमूलक अलंकारों में से उपमा अलंकार का आरोप गौरीनन्दन की
शोभा में देखिये :—
गवरि कानंदन त्रिभुवन सार ।
नाद भेदइ थारइ चउर मडार ।
एक दंतउ मूषक लाइलइ ।
मुखिकउ बाहण तिलक संदूरि ।
करि जोडी नरपति भणइ ।
जाणि फरि रोहिणी जिभ तपउ सूरि ॥ १ ॥
१—जायसी ग्रन्थावली—सं० आचार्य रामचन्द्र शुक्ल—पृ० १४६-१४७।