बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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बाह्रिय सरिसउ मति इसउ ।
बठइ राइ भोलाइसी भीतर गोठि ।
राजमती करि बोलिज्यो ।
फाक नरङ्गा अरु नीची दिठि । ८८॥"
राजा के उड़ीसा गमन के पश्चात् रानी राजमती राजा के विरह में व्याकुल
हो जाती है। वर्ष की किसी ऋतु में उसे शान्ति नहीं मिलती। वह पूर्णयौवना
है और युवावस्था में पति का वियोग कितना दुःखदायी होता है यह तो एक
विरहिणी नारी ही बता सकती है। ऐसी परिस्थिति में प्राय देखा जाता है
कि नारियाँ पातिव्रत धर्म को ताक पर रखकर स्वैराचार की ओर प्रेरित हो जाती
हैं। लेकिन राजमती एक आदर्श पतिव्रता हिन्दू नारी की भाँति इन विकट
परिस्थितियों का सामना करती है और कुटनी द्वारा भ्रष्ट आचरण के प्रस्ताव को
ठुकरा देती है।¹
अन्त में रानी राजमती के सुख के दिन लौटते हैं। बीसलदेव उड़ीसा से
अगाध द्रव्य लेकर लौटते हैं। रानी को उन निर्जीव द्रव्यों को तो नहीं पर अपने
सजीव द्रव्य को पाकर अत्यन्त खुशी होती है। कवि नाल्ह मुखरा, प्रगल्भा
नीति निपुणा, तथा पतिव्रतपरायणा राजमती के चरित्र चित्रण में प्रत्येक दृष्टि से
सफल हुआ है।
इस रासो में उपर्युक्त दोनों चरित्रों को छोड़कर अन्य चरित्रों का विकास
नहीं हुआ है।
रस
हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने रासो काव्य को 'वीरगाथा' काल की
संज्ञा दी है। निस्सन्देह यदि 'पृथ्वीराज रासो' को इस काल का प्रतीक ग्रन्थ
१—असीय वरस की बुढडइ वेसि ।
दंत पडूया सिरि पाहुरा केस ।
आइ आवीसइ सघरी ।
गलि लागइ अरू रूदन करति ।
किमदिन काढइ भाखिणी ।
राति दिवस भामइ घारोय चीत ।
जेवइ आवइ साभर धणी ।
तेवइ चञ्चल पाठव करउ ये मीत ॥१३७॥