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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 84 of 315

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Page 84
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कोमल भावनाओं से भी पूर्ण है। यह राजा के विरह को सहन करने के लिए
तैयार नहीं है, और इसीलिए कहती है कि—
"म्हे विर। स्या बोलियड दोस।
पग की पाणिही संकिसउ रोस।
कीडी उपरि कटकी किसी।
म्हे हरया थे फेरि जाणोयड साथ।
उमी मेलिह ऊलग घडउ।
जल विहुणीय किम जीवइ मछ ॥ ४३ ॥”
लेकिन उसकी यह चातुरीपूर्ण बातें उसे राजा के विरह से वंचित करने में
असमर्थ होती हैं। अतः वह अपने उस अस्त्र का प्रयोग करती है जिस पर प्रत्येक
स्त्री को ऐकांतिक भरोसा होता है लेकिन उसका यह शस्त्र भी चूक जाता है
जिसे वह अपनी सहेलियों से राजा के विछोह के पश्चात् स्वीकार करती है—
सुणउ सहेलीय म्हारीय वात।
कंचूउ पोलि दिपाया गात्त।
त्रिय चरित्र मइ लप किया।
म्हरिय राउ न जाणए घात।…
अपने इस शस्त्र के चूक जाने के पश्चात् भी यह राजा के उड़ीसा प्रवास को
रोकने का प्रयत्न जारी रखती है। राजज्योतिषी से प्रवास के लिये चार मास
पश्चात् की तिथि देने के उसके आग्रह में उसके चरित्र का प्रगाढ़ पति-प्रेम एव
पतिव्रता हिन्दू पत्नी का पति द्वारा अनादर होने पर भी पति के प्रति शुभ
कामना सन्निहित है।
चार मास के बाद निश्चित तिथि पर जब राजा उड़ीसा गमन के लिये
तैयार होता है, रानी अपने विरह के समय आने वाले दुखों को भूलकर अपने
नीतिपूर्ण उदात्त चरित्र का परिचय देते हुए राजा को शिक्षा देती है कि—
"उलग जाण की धरीय अगीस।
राज चालण की ऐहछइ सीष।
इणि विधि राज माहे संचरे।
बइठा राजा सभा परधान।
विणि सं मीठा बोलिथ्यो।
नाई साहणी दूणउ मान।