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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 86 of 315

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Page 86
  • ७९ -

स्वीकार कर लिया जाय तो इतिहासकारों द्वारा दिया गया उपर्युक्त नाम सार्थक
सिद्ध हो सकता है। लेकिन 'बीसलदेवरासो' जिसे इस काल का प्राचीनतम
ग्रन्थ मानने में दो मत नहीं हो सकते, एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें वीर रस का
तो सर्वथा अभाव है और है शृंगार रस की प्रधानता। अतएव प्राचीनतम ग्रन्थ
होने के नाते यदि यह काव्य रासो काल का प्रतीक ग्रन्थ माना जाय तब तो
इस काल को वीरगाथा काल कहना कहाँ तक सार्थक होगा यह विवादग्रस्त
प्रश्न हो जाता है।
'बीसलदेवरासो' चूँकि शृंगार रस प्रधान काव्य है इसलिए इसमें शृंगार रस
खोजने का प्रयास नहीं करना पड़ता। संयोग और वियोग शृंगार से सारा
ग्रन्थ परिपूर्ण है। संयोग शृंगार का तो कम लेकिन वियोग शृंगार का अभाव
ग्रन्थ में परिलक्षित नहीं होता। कहा तो यह भी जा सकता है कि वियोग शृंगार
की ही प्रधानता है। वियोग शृंगार का चित्र इस खण्ड काव्य में हमें बीसलदेव
के रानी राजमती के विवाह के पश्चात् उड़ीसा गमन पर मिलता है। रानी
राजमती का विवाह राजा के साथ उसकी बारह बरस की अवस्था में होता है।
विवाह के तुरन्त पश्चात् ही राजा के परदेश गमन से राजमती को विरह का
सामना करना पड़ता है। प्रोषितपतिका नायिका राजमती के विरह को षड्ऋतु में
घटने वाली प्राकृतिक घटनायें उद्दीप्त करती हैं। सावन का सुन्दर महीना है।
वर्षा-ऋतु आरम्भ हो गयी है। पानी की छोटी-छोटी बूँदें पड़ रही हैं। युवतियाँ
कजली गा रही हैं। पपीहा 'पी कहाँ-पी कहाँ' की रट लगाये हुए है। लेकिन
ये सारे सुन्दर दृश्य विरहिणी राजमती के हृदय में शूल पैदा करते हैं। वह
कहती है-
सावण वरसइँ छइ छोटिय धार ।
प्रीयविण जीविजइ किसइ आधारि ।
छह को खेलइ काजली ।
तठइ चोतीय कमठीय पड़िया झाल ।
पापीहा पीव पीव करइ ।
मोनई अणप छायइ सावण मास ॥ २९ ॥
विप्रलम्भ शृङ्गार के प्रवासहेतुक वियोग के भविष्यत् प्रवास का चित्र अंकित
करते हुए कवि बीसलदेव के भविष्यत् प्रवास से व्याकुल राजमती के मुख से
कहवाता है-