Skip to content
SarvaKosh
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished315 pages

Page 83 of 315

Read in context
Page 83
  • ७९ -
    की खान को प्राप्त करने के लिए करता है। उड़ीसा पहुँच कर राजा बीसलदेव
    को अपने कार्य में सिद्धि बिना किसी लड़ाई के ही प्राप्त हो जाती है और वह
    उड़ीसा के प्रधान के यहाँ एक अति सम्मानित अतिथि के समान रहता है। कुछ
    समय पश्चात् रानी राजमती का यह समाचार दूत के हाथ प्राप्त होने पर कि अब
    रानी राजमती का जीवित रहना राजा के विरह में असम्भव है राजा उड़ीसा से
    लौटने की तैयारी करता है। उड़ीसा के राजा तथा रानी उसको रोकना चाहते
    हैं। रानी तो बीसलदेव से यहाँ तक कहती है कि वह अब साँभर लौटकर न जाय
    और उड़ीसा में ही उसके विवाह का प्रबन्ध सुन्दरी से सुन्दरी कन्या के साथ
    होने का कर दिया जायगा। लेकिन राजा बीसलदेव उड़ीसा प्रवास के समय
    रानी राजमती को दिये गये अपने वचन की दृढ़तापूर्वक रक्षा करता है और
    उड़ीसा की रानी द्वारा किये गये प्रस्ताव को अस्वीकार कर असंख्य धन लेकर
    अजमेर लौट आता है। इतिहास में कहीं भी बीसलदेव तृतीय के उड़ीसागमन
    की कथा नहीं मिलती। ऐसा ज्ञात होता है कि कवि ने राजा बीसलदेव के
    के चरित्र के विकास के हेतु ही इस कथा का सृजन कल्पना के आधार पर किया
    है। कल्पना की सहायता भले ही कवि ने बीसलदेव के चरित्र चित्रण में ली
    हो लेकिन इसे तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि बीसलदेव तृतीय के जीवन-चरित्र
    का यह अंश अधूरा ही रह जाता यदि कवि ने इस ग्रन्थ की रचना न की
    होती। साहित्य की रक्षा इसीलिए किसी देश अथवा जाति के लिए (इतिहास
    का भी साहित्य के अन्तर्गत ही मैं मानता हूँ) स्वतन्त्रता से बढ़कर होती है।
    रानी राजमती के चरित्र को कवि ने स्त्री-सुलभ गुणों से पूर्ण चित्रित किया
    है। राजमती की प्रगल्भता से ही इस रासो का प्रारम्भ होता है। वह राजा
    बीसलदेव के गर्वयुक्त कथनों को नहीं सह सकती और ऐसा चुभता हुआ
    प्रत्युत्तर १ उन्हें देती है कि राजा को अपना राज्य छोड़ कर विदेश गमन करना
    पड़ता है। लेकिन जहाँ उसमें इतनी प्रगल्भता है वहीं उसका हृदय स्त्रियोचित
    १—गरब न कीजइ धणी संभरि धाणि।
    तुहू समा छह घणारि भूवाल।
    ऐक उडीसा कउ धणी।
    वचइ माफा मानि न मानि।
    नउ थारइ साभरिउ महइ।
    तिन्हठवा घरि उमहइ हीरा की पाणि ॥ ४१ ॥