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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

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Page 82
  • ७५ -

उन ऐतिहासिक तथ्यों की पुनरुक्ति न होगी यदि यह कहा जाय कि इतिहास में
बीसलदेव चतुर्थ का जो चरित्र हमें प्राप्त होता है उसका कोई वर्णन इस रासो
में नहीं है। इतिहास के अनुसार बीसलदेव चतुर्थ बड़ा वीर और प्रतापी राजा
था। उसने मुसलमानों से कई लड़ाइयाँ लड़ी थीं और उत्तर पश्चिम भारत
में पुनः एक बार हिन्दू राज्य की स्थापना की थी। शिब्जी और हाँसी प्रदेश भी
इसने अपने राज्य में मिलाया था। २ इसके घोर चरित्र का बहुत कुछ वर्णन
इसके राजकवि सोमदेव रचित 'ललित विग्रहराज नाटक' (संस्कृत) में है। ३
ऐसे पराक्रमी राजा के वीर चरित्रों के चित्रण का चूँकि इस रासो में अभाव है
इसलिए ऊपर इस बात की सम्भावना प्रगट की गयी है कि इस रासो का
सम्बन्ध बीसलदेव चतुर्थ से नहीं है।
बीसलदेव तृतीय का चरित्र इतिहास में बीसलदेव चतुर्थ के समान म्लेच्छों से
आर्यावर्त का उद्धार करने वाला अथवा विन्ध्य से लेकर हिमालय तक अपना
राज्य स्थापित करने वाला नहीं चित्रित किया गया है। अस्तु, बहुत कुछ सम्भव
है कि इसी कारण प्रस्तुत रासोकार ने इस खंडकाव्य की रचना करते समय
बीसलदेव तृतीय के गुजरात आक्रमण के समय चालुक्यवंशीय राजा कर्ण से
युद्ध को गौण रखकर उसके जीवन की एक स्वतः पूर्ण घटना परमारवंशीय
राजा भोज की कन्या के साथ विवाह को प्रधानता दी। बीसलदेव के चरित्र
का विकास इस रासो में रानी राजमती के विवाह के पश्चात् से आरम्भ होता
है। विवाह के पश्चात् रानी द्वारा सिर्फ इतना ही कहने पर कि बीसलदेव के
समान और इनसे बढ़कर भी इस भू-खण्ड पर और अन्य नृप हैं, राजा प्रण
करता है कि वह अवश्य उन राजाओं को जीतेगा और अपने राज्य को हर
प्रकार से समृद्ध बनायेगा। अपने इस प्रण की रक्षा के हेतु वह जिस रानी को
ब्याह कर वह कुछ मास पूर्व ही लाया है और जो अनन्य सुन्दरी है उसके रूप
और यौवन की कुछ परवाह नहीं करता और बारह वर्षों का उड़ीसा प्रवास धीरे
२. आर्यावर्तं यथार्थं पुनरपि कृतवा म्लेच्छविच्छेदनाभि-
र्देवः शाकम्भरीन्द्रो जयति विजयते वीसलः क्षोणिपालः ॥
मूते सम्प्रति चाहुवाणतिलकः शाकम्भरीभूपति
श्रीमान्विग्रहराज एष विजयी सन्तानगानात्मनः । -- फीरोजशाह की
लाट (दिल्ली) पर वि० सं० १२२० वैशाख शुक्ला १५ का लेख
३. Indian Antiquary vol. XX P. 201—D. Keilhorn