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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

DevanagariHindipublished315 pages

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Page 272
  • १६७ -
    प्रीति मोरा धर दादुरा।
    प्रीति मोटी म्हाक¹ अध सरीरि²॥२५२॥
    उछग पूगी³ घरि आवत भरतार।
    वाणि करि उतरि⁴ समुद्द कउ पार⁵॥
    कलंकम कोइ सिरि चड़िउ⁶।
    वाधतउ जोवन⁷ विरह की झाल⁸॥
    छंडण को छाग्यउ⁹ नहीं।
    म्हा तउ¹⁰ पणि पगि सपोष न झपियउ झाल¹¹॥२५३॥
    १. आ० ६ म्हाफै, आ० १२ म्हाकै।
    २. आ० ६ अधर शरीर।
    यह छंद आ० ६ में २४४ तथा आ० १२ में २३८ है।
    ३ आ० १२ पहुत्ती।
    ४. अ० २ जाणि उलटइ, आ० ६ वाणि कि उतरइ, आ० १२
    जाणि कि उतरि।
    ५. अ० २ समद अथाह।
    ६ अ० २ अकलंक कलक मो चढ्यो, आ० ६ अकलकलंका मोदि न
    चढ़यो।
    ७ अ० २, आ० ६ सामुहो जोवन, आ० १२ वाधते योवन।
    ८. अ० २ वीरह बीकराल, आ० १२ विरह की फाल।
    ९ आ० १२ लागा।
    १० ०२ (म नहीं है)।
    ११. अ० २ सोखपा भडइ अल, आ० ६ सषी गो भाउता झाल, आ०
    १२ झपिया झाल।
    यह छंद अ० २ खड ३ में ८८, आ० ६ खड ३ में ८६,
    आ० ६ में २४५ तथा आ० १२ म २३६ है। लेकिन इसकी पाचवीं
    पक्ति अ० २ और आ० ६ में है:—
    "अण वलइ दय ( यत-आ० ६ ) परजलै।"