बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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प्रीति मोरा धर दादुरा।
प्रीति मोटी म्हाक¹ अध सरीरि²॥२५२॥
उछग पूगी³ घरि आवत भरतार।
वाणि करि उतरि⁴ समुद्द कउ पार⁵॥
कलंकम कोइ सिरि चड़िउ⁶।
वाधतउ जोवन⁷ विरह की झाल⁸॥
छंडण को छाग्यउ⁹ नहीं।
म्हा तउ¹⁰ पणि पगि सपोष न झपियउ झाल¹¹॥२५३॥
१. आ० ६ म्हाफै, आ० १२ म्हाकै।
२. आ० ६ अधर शरीर।
यह छंद आ० ६ में २४४ तथा आ० १२ में २३८ है।
३ आ० १२ पहुत्ती।
४. अ० २ जाणि उलटइ, आ० ६ वाणि कि उतरइ, आ० १२
जाणि कि उतरि।
५. अ० २ समद अथाह।
६ अ० २ अकलंक कलक मो चढ्यो, आ० ६ अकलकलंका मोदि न
चढ़यो।
७ अ० २, आ० ६ सामुहो जोवन, आ० १२ वाधते योवन।
८. अ० २ वीरह बीकराल, आ० १२ विरह की फाल।
९ आ० १२ लागा।
१० ०२ (म नहीं है)।
११. अ० २ सोखपा भडइ अल, आ० ६ सषी गो भाउता झाल, आ०
१२ झपिया झाल।
यह छंद अ० २ खड ३ में ८८, आ० ६ खड ३ में ८६,
आ० ६ में २४५ तथा आ० १२ म २३६ है। लेकिन इसकी पाचवीं
पक्ति अ० २ और आ० ६ में है:—
"अण वलइ दय ( यत-आ० ६ ) परजलै।"