बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
Page 273 of 315
Read in contextPage 273
- १६८ -
धन्य हो पंडिया धन्य हो राइ ।
नगर पंड्राया दिवस गिणाइ ॥
धन्य हो जोगी¹ दरसणी ।
जिणि वेणि ले मेलण धणउड नाह² ॥
धन्य दिहांडउ आज कट ॥२४४॥
संवत सहस सत्तित्तरइ³ जाणि ।
नदह क्यांसिरि कही अमृत वाणि⁴ ॥
गुण गुर्या खतडाण का ।
सुकल पक्ष पंचमी श्रावण मास ॥
रोहणी नक्षत्र सोहामण्डठ ।
सो दिन⁵ गिणि जोइसी जोडइ⁶ रास ॥२४५॥
१ आ० १२ जोगीय ।
२. आ० ६ मेलण्वउ धण को नाह, आ० १० वेगिमिलायो धण
को नाह ।
यह छंद आ० ६ में २४५ तथा आ० १२ में २४० है ।
लेकिन आ० ६ में उपर्युक्त ५, ६ नहीं हैं। और उपर्युक्त ३ के
पूर्व निम्नलिखित और है —
धन्य हो गोरी गुण भरी ।
धन्य हो पूरण्डउ समण कहाइ ।
धन्य वैशागर मत्रवी ।
भानुमती रमणी ध य सभाइ ।
आ० १२ में दूसरी पंक्ति नहीं है तथा अंतिम पंक्ति के
अतिरिक्त एक निम्न पंक्ति और है—
"राणी राजमती मिल्या वीसल राउ ।"
३. आ० १२ विहुत्तरै ।
४ आ० १२ सरसोतवाणी ।
५ आ० १२ सुदिन ।
६ आ० ६ जोइसी जोड्यो, आ० १२ जोडीयो ।
यह छंद आ० ६ में २४७ तथा आ० १२ में २४२ है ।