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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 271 of 315

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Page 271
  • १६६ -
    तब बोलइ बीसल चहुवाण।
    अभीय सूं मूंघ न मेलइ, मान¹ ॥
    इहु माण तुम्ह ही मलइ² ।
    परम पारद छोडो³ दे नारि ॥
    सुपवन था उड़त गयंद ।
    अजू मूं गरब न⁴ छोड़इ गवारि⁵॥२४१॥
    रूसणा कपड स्वामी मुखड जिघार ।
    रूसण⁶ मीठउ मुधि⁷ भरतार ॥
    प्रीत परेवा⁸ थागळी ।
    प्रीति धी⁹ स्वामी साटखो¹⁰ नीर ॥
    और छठी पंक्ति उपयुक्त छंद की अंतिम पंक्ति है । इसके
    अतिरिक्त इन दोनों प्रतियों म दो और पंक्तियाँ हैं—
    देव सताणी ( राजाजी-आ० ६ )
    राजा तु फिरइ (देव हताशीयो-आ० ६)
    घीव वीसाणी ( घी वसायो-आ० ६ )
    तु जीमो छह तेल ( भीयो तेल-आ० ६ )
    आ० १२ में भी दो अतिरिक्त पंक्तियाँ हैं :—
    "अमृत अधर न घूंटिया।
    तह कउ पो विएख्यो अर जीनीयो तेल ।"
    १. आ. १३ मेलई माथ ।
    २. आ० ६ इहु माण तुम्हरी मले, आ० १२ ईणि माणे तूं ही माल ।
    ३. आ० १२ 'पारह और 'छू डा' के बीच में "लाग" है ।
    ४ आ० ६ अनो गरब, आ० १२ अभीयतूं गर्वन ।
    ५. आ० ६ तूं न तिनै ममारि, आ० १२ तजै गवारि ।
    यह छंद आ० ६ में २४३ तथा आ० १२ में २३७ है ।
    ६. आ० १२ रूसणी ।
    ७. आ० १२ मु। ८. आ० १२ पारे ।
    ९. आ० १२ मीठा जीसा । १०. आ० १२ माळुता ।