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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

by नरपति नाल्ह

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DevanagariHindipublished315 pages

Page 270 of 315

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Page 270
  • १६५ -
    कोया¹ भाजता² आहुट्या³।
    ग्है सड⁴ तिखि घणि मेश्रीय मापह् मारि॥२३९॥
    तइ तउ उत्तग गाहू किसउ कीयड नाह⁵।
    मोडिउ सीस⁶ न दोन्हीय⁷ पोह ॥
    कठिन पटहर ना मिल्या⁸।
    सहूँ सड अंग स अग न भीट्योड राउ॥
    जंघ जुगल कोह्या नहीं।
    राउ जी¹⁰ सैति विद्धाय, न पेकीय¹¹ पेखि ॥२४०॥
    १. आ० ६ काया।
    २ आ० १२ आजत।
    ३ आ० १२ अकुटा।
    ४. आ० १२ ( में नहीं है)।
    यह छंद आ० ६ में २४१ तथा आ० १२ में २३५ है।
    ५ अ० २ काइ कियो नाह, आ० ६ तइ की कीयउ नाह, आ० १२
    किसु कियो नाह।
    ६. अ० २, आ० ६ मोडोउ सोसो आ० ६ मोल्यो सीसे, आ० १२
    मोडीया सीस नै।
    ७ अ० २ नूहतो, आ० १२ नहीं दीयो।
    ८ आ० १२ मल्या।
    ६ आ० १२ तई।
    १०. अ ९ रग भरि रयण, आ० ९ राजा, आ० १० राशं।
    ११ अ० २ नू माढिया, आ० १२ पेखियो।
    यह छंद अ० २ खड ३ मे १००, आ० ६ खड २ में ६८,
    अ० ६ ग ७४२ तथा आ० १२ में २३६ है। लेकिन अ० और
    आ० ६ म चौथा, पाँचवीं और छुटी पंक्तियों हैं -
    ४ केलो गरम सा तूं मिल्हा गात।
    ५ जाघ जोडावी, नू नीरखीथी (आ० ६ न निरख्यो
    नाह।)