बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
by नरपति नाल्ह
DevanagariHindipublished315 pages
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कोया¹ भाजता² आहुट्या³।
ग्है सड⁴ तिखि घणि मेश्रीय मापह् मारि॥२३९॥
तइ तउ उत्तग गाहू किसउ कीयड नाह⁵।
मोडिउ सीस⁶ न दोन्हीय⁷ पोह ॥
कठिन पटहर ना मिल्या⁸।
सहूँ सड अंग स अग न भीट्योड राउ॥
जंघ जुगल कोह्या नहीं।
राउ जी¹⁰ सैति विद्धाय, न पेकीय¹¹ पेखि ॥२४०॥
१. आ० ६ काया।
२ आ० १२ आजत।
३ आ० १२ अकुटा।
४. आ० १२ ( में नहीं है)।
यह छंद आ० ६ में २४१ तथा आ० १२ में २३५ है।
५ अ० २ काइ कियो नाह, आ० ६ तइ की कीयउ नाह, आ० १२
किसु कियो नाह।
६. अ० २, आ० ६ मोडोउ सोसो आ० ६ मोल्यो सीसे, आ० १२
मोडीया सीस नै।
७ अ० २ नूहतो, आ० १२ नहीं दीयो।
८ आ० १२ मल्या।
६ आ० १२ तई।
१०. अ ९ रग भरि रयण, आ० ९ राजा, आ० १० राशं।
११ अ० २ नू माढिया, आ० १२ पेखियो।
यह छंद अ० २ खड ३ मे १००, आ० ६ खड २ में ६८,
अ० ६ ग ७४२ तथा आ० १२ में २३६ है। लेकिन अ० और
आ० ६ म चौथा, पाँचवीं और छुटी पंक्तियों हैं -
४ केलो गरम सा तूं मिल्हा गात।
५ जाघ जोडावी, नू नीरखीथी (आ० ६ न निरख्यो
नाह।)