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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

॥ श्रीः ॥
वि० आ० ग्रन्थमाला
२८
श्रीमद्भावमिश्रप्रणीतः
भावप्रकाशनिघण्टुः
सविमर्श-हिन्दीव्याख्योपेतः
( संशोधित परिवर्धित संस्करण )
विमर्शकार
डॉ० कृष्णचन्द्र चुनेकर, ए.एम.एस.
भूतपूर्व प्राध्यापक : द्रव्यगुण विभाग, चिकित्सा विज्ञान संस्थान,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
सम्पादक
डॉ० गंगासहाय पाण्डेय, ए.एम.एस.
भूतपूर्व प्राध्यापक : आयुर्वेद विभाग, चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय,
तथा चिकित्सक : सरसुन्दरलाल आतुरालय,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
चौखम्भा भारती अकादमी
आकर ग्रन्थों के प्रकाशक एवं वितरक
गोकुल भवन, के. ३७/१०९, गोपाल मन्दिर लेन
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वाराणसी २२१००१ (भारत)

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प्रकाशक
चौखम्भा भारती अकादमी
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टेलीफोन : ३३०३४९, ३३०३४५
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पुनर्मुद्रित : २००२
मूल्य : ३५०/-
❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖
क्रियात्मक-औषधि परिचय विज्ञान (सचित्र)
आचार्य विश्वनाथ द्विवेदी
मूल्य : १००-००
निघण्टु आदर्श
श्री बापालाल ग. वैद्य
१-२ भाग (सम्पूर्ण) मूल्य ६७५-००
❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖-❖
शाखा
चौखम्भा विश्वभारती
भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक एवं वितरक
के. ३७/१०९, गोपाल मन्दिर लेन
पो. आ. बॉक्स नं. १०८४
वाराणसी-२२१००१ ( भारत )
सुरभि प्रिन्टर्स वाराणसी


[Right Page]

V. AYURVEDA SERIES
28
❦
BHĀVAPRAKĀSA NIGHANTU
(INDIAN MATERIA MEDICA)
OF
ŚRĪ BHĀVAMIŚRA
(c. 1600-1600 A.D.)
Commentary by
Dr. K. C. CHUNEKAR, A.M.S.
Ex-Lecturer, Department of Dravyaguṇa,
Institute of Medical Sciences, B.H.U., Varanasi
Edited by
Dr. G. S. PANDEY, A.M.S.
Ex-Lecturer, Ayurveda Department, College of Medical,
Sciences and Physician, S.S. Hospital, B.H.U., Varanasi
CHAUKHAMBHA BHARATI ACADEMY
Publisher and Distributor of Monumental Treatises of the East
Gokul Bhawan, K. 37/109, Gopal Mandir Lane
P. O. Box No. 1065
VARANASI-221001 (INDIA)

[वाम पृष्ठ / Left Page]

Publishers :
CHAUKHAMBHA BHARATI ACADEMY
Publishers and Distributors of Monumental Treatises of the East
P.O. Box No. 1065
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Telephone 330349, 330345 (O)
332702, 332637 (R)
© Chaukhambha Bharati Academy, Varanasi
Reprint : 2002
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Oriental Publishers and Distributors
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K. 37/109, Gopal Mandir Lane
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[दक्षिण पृष्ठ / Right Page]

विषय-सूची

हरीतक्यादिवर्गः ... ... ... ३
कर्पूरादिवर्गः ... ... ... १७३
गुडूच्यादिवर्ग ... ... ... २६६
पुष्पवर्गः ... ... ... ४७६
वटादिवर्गः ... ... ... ५१३
आम्रादिफलवर्गः ... ... ... ५५०
धातूपधातुरसोपरसरत्नोपरत्नविषोपविषविवर्गः ... ६०२
धान्यवर्गः ... ... ... ६३५
शाकवर्गः ... ... ... ६६३
मांसवर्गः ... ... ... ७०५
कृतान्नवर्गः ... ... ... ७२४
वारिवर्गः ... ... ... ७४७
दुग्धवर्गः ... ... ... ७५६
दधिवर्गः ... ... ... ७६७
तक्रवर्गः ... ... ... ७७१
नवनीतवर्गः ... ... ... ७७४
घृतवर्गः ... ... ... ७७५
मूत्रवर्गः ... ... ... ७७८
तैलवर्गः ... ... ... ७७९
सन्धानवर्गः ... ... ... ७८३
मधुवर्गः ... ... ... ७८८
इक्षुवर्गः ... ... ... ७९२
अनेकार्थनामवर्गः ... ... ... ७९८
कुछ प्रमुख अवशिष्ट द्रव्यों का संक्षिप्त वर्णन ... ८०६
मूल निघण्टु में आये हुए संस्कृत पर्यायों की वर्णानुक्रमणिका ... ८४३
वर्णानुक्रम से द्रव्यों के विभिन्न भाषाओं के नाम ... ८८७
द्रव्यों के लेटिन तथा अंग्रेजी नामों की वर्णानुक्रम सूची ... ९६१
शुद्धिपत्र ... ... ... ९८५

सङ्केत

अं०अंग्रेजीपहा०पहाड़ी
अ०अरबीपाठा०पाठान्तर
अफ०अफगानीफा०फारसी
आसा०आसामीबं०बंगाली
इरा०ईरानीबंब०बंबई
उ(डि)०उड़ियाभोटि०भोटिया
उ० प्र०उत्तर प्रदेशम०मराठी
क०कर्नाटकमल०मलयालम
क० अ०कल्पस्थान अध्यायमा०मारवाड़ी
काश्मी०काश्मीरमि० ग्रा०मिलीग्राम
काठी०काठियावाडमि० मि०मिलीमीटर
कुमा०कुमाऊँमुंगे०मुंगेर
को०कोंकणीयू०यूनानी
खासि०खासियार०रत्ती
गढ०गढवालरा० नि०राजनिघण्टु
गु०गुजरातीरा० पु०राजपुताना
गो०गोवालि०लिपचा
ग्रा०ग्रामले०लेटिन
च०चरकसं०संस्कृत
चि०चिकित्सास्थानसन्ता०सन्ताल
तां०तामिलसिं०सिन्धी
तुलुतुलुसिलो०सिलोनी
ते०तेलगुसु०सुश्रुत
द०दक्षिणसू०सूत्रस्थान
ध० नि०धन्वन्तरीय निघण्टुहि०हिन्दी
ने०नेपालीFam.Family
पं०पंजाबीSyn.Synonym (पर्याय)

सम्पादकीय

सृष्टि के प्रारम्भ काल से व्याधियों के निराकरण के लिये वानस्पतिक द्रव्यों का
प्रयोग होता चला आया है । प्रारम्भ में वनस्पतियों का चिकित्सा में प्राकृतिक
स्वरूप में ही उपयोग होता रहा। धीरे-धीरे रासायनिक तत्वों या कार्यकारी घटक
द्रव्यों के अनुसंधान एवं जीव रासायनिक रचना शृङ्खलाओं के विज्ञान के
अनुसंधान के कारण आज तक विकसित हुये नवीनतम वानस्पतिक औषध द्रव्यों
का प्रयोग हो रहा है। प्रारम्भ में मानव जीवन अधिक स्वाभाविक रूप में रहने
तथा छोटे-छोटे जनपदों में निवास करने और चिकित्सोपयोगी वानस्पतिक
समुदाय के निकट रहने के नाते उनसे भली प्रकार परिचित रहता था। बाद के
दिनों में बड़े जन समुदायों में निवास करने एवं वनस्पति सम्पदा के सान्निध्य से
दूर रहने की परिस्थिति में चिकित्सा विषय के अध्येताओं एवं अध्यापकों को इस
बात की आवश्यकता का अनुभव हुआ कि भैषज्य संहिताओं—निघण्टु ग्रन्थों का
सर्वाङ्गीण परिचयात्मक साहित्य संग्रहीत किया जाय और उन वनस्पतियों का
प्रत्यक्ष स्वरूप जानने के लिये जंगलों में निवास एवं विहार करने वाले आभीर,
कोल, किरात, शिकारी एवं तपस्वी वर्ग से परिचय प्राप्त किया जाय ।

गोपालास्तापसा व्याधा ये चान्ये वनचारिणः ।
मूलजातिश्च ये तेभ्यो भेषजव्यक्तिरिष्यते ॥
प्रायो जनाः सन्ति वनेचरास्ते गोपादद्यः प्राकृतनामसंज्ञाः ।
प्रयोजनार्था वचनप्रवृत्तिर्यस्मात्ततः प्राकृतमित्यदोषः ॥

धीरे-धीरे चिकित्सकों का वानस्पतिक जगत् से प्रत्यक्ष सम्बन्ध टूटने लगा
और चिकित्सा साहित्य में निर्दिष्ट वनस्पतियों का परिचय ही उनके परिज्ञान के
लिये अपर्याप्त होते हुए भी पर्याप्त स्वीकार किया जाने लगा। इस परिस्थिति में
वनस्पतियों के क्षेत्र में अनेक भ्रान्तियों का समावेश होना स्वाभाविक था। इतने
विशाल देश में असंख्य भाषाओं, लिपियों, मान्यताओं, रूढ़ियों आदि के कारण
तथा विभिन्न क्षेत्रों की वानस्पतिक सम्पदा के विचित्र स्वरूप होने के कारण और
एक ही नाम से अनेक वनस्पतियों के अभिधान के कारण तथा रचनाकारों के
पर्याय प्रेम के कारण उत्तर कालीन वनस्पतिवेत्ताओं के सामने वनस्पतियों के
असन्दिग्ध निर्णय की समस्या जटिलतम होती गई । इस कठिनाई के निराकरण

( ८ )

के लिये अनेक निघण्टुओं का निर्माण ऋषिकल्प अधिकारी वनस्पति वेत्ताओं ने
किया जिनमें धन्वन्तरि निघण्टु या गुडूच्यादि निघण्टु, मदन विनोद या मदनपाल
निघण्टु, अभिधान चूड़ामणि या राज निघण्टु एवं भाव प्रकाश निघण्टु प्रमुख ग्रन्थ
हैं। इन निघण्टुओं के अतिरिक्त अनेक महत्वपूर्ण निघण्टु ग्रन्थों का एवं द्रव्यगुण
शास्त्र के अभिज्ञ विद्वानों का उल्लेख चिकित्सा साहित्य के वर्तमान ग्रन्थों में यत्र-
तत्र मिलता है। किन्तु पूर्ण या खण्डित प्रति के रूप में वनौषधि विषयक दूसरी
विशिष्ट रचनायें उपलब्ध नहीं हैं।
उपर्निर्दिष्ट सभी निघण्टु ग्रन्थ बड़े महत्व के तथा द्रव्य-गुणों की अनमोल
संग्रहात्मक रचनायें हैं। सबकी अपनी-अपनी विशेषतायें हैं। इनमें भावमिश्र
कृत द्रव्यगुणसंग्रह या भावप्रकाशनिघण्टु का उसकी सरलता के कारण एवं
आधुनिक चिकित्सा महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में अन्तर्भाव होने के कारण
व्यापक प्रसार हुआ है। भावप्रकाशनिघण्टु की लघु एवं दीर्घ कलेवर की अनेक
व्याख्यायें उपलब्ध हैं। किन्तु काल प्रभाव से जिन दोषों का अन्तर्भाव वनस्पतियों
के व्याख्यान के क्षेत्र में अभिनिविष्ट होता गया, उपलब्ध अधिकांश व्याख्याओं में
भी वह गुण-दोष उत्तरोत्तर अभिवृद्ध होता रहा है। हम लोग कमरे में बैठ कर
चार छः महत्व के आकर ग्रन्थों के सहारे अपनी कल्पनात्मक कूची के जोर से
वनस्पतियों के चित्र खींचते जाते हैं, चाहे हमने उन वनस्पतियों को दर्शन स्वप्न
में भी न किया हो। इस प्रकार की जटिलताओं के कारण द्रव्यगुण-विज्ञान का
अध्ययन एवं अध्यापन बड़ा अप्रिय, नीरस एवं आयासकर विषय हो गया है।
निघण्टु क्षेत्र की इन कठिनाइयों का निराकरण करने की चेष्टा भावप्रकाश-निघण्टु
के वर्तमान संस्करण में की गई है।
मेरे मित्र श्री कृष्णचन्द्र चुनेकर, प्राध्यापक, स्नातकोत्तर आयुर्वेदीय अनुसन्धान
संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने अपना जीवन ही द्रव्यगुण साहित्य के
परिष्कार के लिये अर्पित कर दिया है। पिछली दो दशाब्दियों से आपने इस क्षेत्र
के विशिष्ट वाङ्मय का पर्यालोचन करने के अतिरिक्त व्यावहारिक रूप में
वनस्पतियों का प्रत्यक्ष परिचय पाने के लिये प्रायः सम्पूर्ण उत्तर भारत के गहन
जंगलों की यात्रायें की हैं। वनस्पतियों का परिचय एवं स्वरूप निर्धारण, आधुनिक
पाश्चात्य वर्गीकरण की दृष्टि से उनका अभिज्ञान आदि विषयों की उपलब्धि
उनको इस क्षेत्र के सर्वमान्य वनौषधिवेत्ता आदरणीय प्रो० बलवन्तसिंह जी से
प्राप्त हुई है। उनके साथ श्री चुनेकर जी ने उत्तरा खण्ड की तराईयों-चकराता,
काश्मीर, देहरादून एवं विन्ध्यक्षेत्र की वनस्पतियों के लिये चित्रकूट अमरकण्टक
आदि का पर्यटन किया है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वनौषधि संग्रहालय-


( ६ )

हरबेरियम का वर्षों तक सञ्चालन करते हुए उसका गौरवपूर्ण प्रतिमान उपस्थित
किया है। आपके सहयोग से भावप्रकाश-निघण्टु के पिछले तीन संस्करण पाठकों
के सामने आ चुके हैं और उनका पर्याप्त समादर हुआ है।
प्रस्तुत संस्करण में विमर्श का आद्यन्त परिष्कार, अद्यतन वनौषधि अनुसन्धान
साहित्य का अन्तर्भाव एवं प्रत्येक वनस्पति का यथाशक्ति असंदिग्ध परिचय देने
की चेष्टा की गई है। उन वनस्पतियों के शास्त्रोक्त विशिष्ट आमयिक प्रयोगों का
भी यथास्थल उल्लेख किया गया है। संस्कृत के मूल श्लोकों का हिन्दी अनुवाद,
भेषज द्रव्यों के भिन्न भारतीय भाषाओं में प्रचलित सही नाम, उनके अंग्रेजी व
लैटिन के स्वीकृत नाम, वनस्पतियों के उत्पत्ति-स्थान, उनका विशिष्ट परिचय,
रासायनिक संगठन आदि का यथाशक्ति सही-सही वर्णन किया गया है। संदिग्ध
एवं विवादास्पद स्थलों पर विभिन्न विद्वानों के विचार एवं मतभेद के आधार के
उल्लेख की चेष्टा की गई है। अनेक परिशिष्टों के अलंकरण से इस संस्करण को
अतीव उपयोगी बनाया गया है।
इस प्रकार के कार्य में कितना श्रम पड़ता है इसका अनुभव सम्बद्ध विषयों के
ज्ञाता ही कर सकते हैं। वनस्पतियों के भिन्न-भिन्न भाषाओं के नामों का एवं
एक ही वनस्पति के भिन्न प्रान्तों में दूसरे अभिधानों से उल्लेख होने के कारण
और अनेक वनस्पतियों का एक ही नाम से उल्लेख होने के कारण उत्पन्न
भ्रान्तियों का निराकरण करने के लिए आपको केवल एक ही वनस्पति के लिये
महीनों श्रम करना पड़ा है।
श्री चुनेकर जी को यह लगन, कर्मठता एवं ज्ञान अपने पिता आयुर्वेदीय क्षेत्र
के मर्मज्ञ, कुशल चिकित्सक अपने समय के दिग्विदिगन्त विख्यात पीयूषहस्त
स्व० त्र्यम्बक शास्त्री के पट्ट शिष्य, पूज्य श्री श्रीनिवास शास्त्री जी से प्राप्त हुआ है।
प्राचीन वैद्य परम्परा में सम्भवतः श्री श्रीनिवास जी शास्त्री ही एकमात्र ऐसे
विद्वान् व्यक्ति हैं जिन्हें आधुनिक रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र तथा तकनीकशास्त्र
(Technology) का आधुनिकतम परिज्ञान प्राप्त है। और पचासी वर्ष की
अवस्था में अध्ययन-अध्यवसाय में निरन्तर लगे रहकर 'यावज्जीवमधीते विप्रः' की
परम्परा को गति प्रदान कर रहे हैं।
विश्वास है, भावप्रकाशनिघण्टु का प्रस्तुत संस्करण वानस्पतिक द्रव्यगुण-
विज्ञान विषयक साहित्य का अध्ययन, अध्यापन, अनुसन्धान करने वाले एवं
वैद्यक व्यवसाय से सम्बद्ध महानुभावों के लिये पूर्वापेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध
होगा।

( १० )
औषधीय वनस्पतियों का शास्त्रसम्मत, अनुसन्धान सिद्ध एवं प्रत्यक्ष परिज्ञान
के द्वारा उपबृंहित विवेचन के लिये मैं अपने मित्र श्री कृष्णचन्द्र जी चुनेकर को
साधुवाद देते हुए उनके मंगलमय भविष्य की कामना करता हूँ । भगवान्
धन्वन्तरि की कृपा से इनके द्वारा भविष्य में आयुर्वेद जगत की निरन्तर सेवा
होती रहेगी ।
आयुर्वेदीय वाङ्मय की श्री-समृद्धि के महत् अनुष्ठान में चौखम्बा परिवार का
विशेष योगदान रहा है। प्राच्यविद्या के प्रकाशन का उनका अपना कीर्तिमान है ।
अनेक प्रकाशन विपत्तियों के होने पर भी चौखम्बा परिवार ने इस श्रेणी के साहित्य
का प्रकाशन अनवरत रूप में किया है—एतदर्थ उनकी श्री-समृद्धि की कामना के
साथ उनको हार्दिक धन्यवाद देता हूँ ।
अन्त में ग्रन्थ की उपयोगिता के सही मूल्यांकन के लिये आयुर्वेद समाज से
साग्रह अनुरोध है कि भविष्य में परिष्कार के लिये समुचित परामर्श देकर चिकित्सा
साहित्य की श्री-वृद्धि में सहायक हों ।
गंगादशहरा
वि० सं० २०२६
गंगासहाय पाण्डेय
प्राक्कथन
यदुपज्ञं हि विज्ञानं द्रव्यस्य गुणकर्मणोः ।
भिषग्भिवन्दितायास्मै भावमिश्राय मे नमः ॥
आचार्य भावमिश्र ने ई० सं० १५००-१६०० में एक ऐसे अपूर्व आयुर्वेदीय
चिकित्सा ग्रन्थ का निर्माण किया जो प्राचीन संहिता ग्रन्थों की श्रृंखला में अन्तिम
कड़ी कहा जा सकता है। इसमें द्रव्यगुण संबन्धी विषय का जो प्रतिपादन किया
गया है वह पूर्ववर्त्ती निघंटुओं (कोश) की अपेक्षा परिष्कृत एवं तत्कालीन
प्रचलित नवीनतम अनुसन्धानों को आत्मसात् करते हुए किया गया है, जैसे
द्वीपान्तरवचा, पारसीक यवानी आदि का सर्व प्रथम उल्लेख इसी में है। इन्हीं
विशेषताओं के कारण इस ग्रन्थ का द्रव्यगुण विषयक भाग 'भावप्रकाशनिघण्टु' के
नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा अनेक आयुर्वेदीय संस्थाओं में पाठ्यग्रन्थ के रूप में
इसका उपयोग किया जा रहा है। इसमें सभी प्रकार के द्रव्यों—१ औद्भिद
(वृक्ष, गुल्म, लता आदि—Plants), २ प्राणिज (Animals) एवं पार्थिव
(Minerals) के गुणकर्मों का आयुर्वेदीय पद्धति से वर्णन दिया हुआ है।
मूल ग्रन्थ संस्कृत में श्लोकबद्ध होने से युगानुरूप उसकी व्याख्या की आवश्यकता
थी और इस दिशा में अनेक प्रयत्न भी हुए। प्रस्तुत व्याख्या उसी दिशा में एक
और प्रयत्न है।
इस व्याख्या में संस्कृत के मूल श्लोकों का हिन्दी अनुवाद, द्रव्यों के विभिन्न
भारतीय भाषाओं के नाम, अंग्रेजी तथा लेटिन नाम, वनस्पतियों के उत्पत्ति
स्थान, संक्षेप में उनका परिचय, रासायनिक संगठन, गुण, प्रयोग एवं यथा संभव
मात्रा आदि का उल्लेख किया गया है। संदिग्ध द्रव्यों के सम्बन्ध में विस्तृत
विवेचन किया गया है जिसमें एक नाम से लिये जाने वाले अनेक द्रव्यों का पृथक्-
पृथक् वर्णन दिया गया है, जो संदिग्ध द्रव्य निर्णय में सहायक होगा। प्रत्येक द्रव्य
के वर्णन के साथ कुछ विशिष्ट वक्तव्य 'नोट' के रूप में लिखा गया है जो उसके
भेदोपभेद, अन्य विद्वानों के उसके संबंध में विचार, वादग्रस्तता, अन्य निघंटुओं
एवं संहिता ग्रन्थों के वर्णन से तुलना तथा अनुसन्धान के क्षेत्र आदि पर व्यापक
प्रकाश डालता है। संक्षेप में प्रत्येक द्रव्य के संबंध में प्राचीन काल से लेकर अब
तक के जो भी विचार रहे हैं उनका संकलन किया गया है जो आगे अनुसन्धान में
सहायक होगा। चूँकि रसशास्त्र एक स्वतंत्र विषय के रूप में अब विकसित हो

( १२ )

चुका है इसलिये तत्सम्बन्धी भाग में केवल मूल श्लोकों का अनुवाद मात्र ही दिया
गया है, उसकी व्याख्या नहीं की गई है । व्याख्या में प्रधानता औद्भिद द्रव्यों को
ही दी गई है । परिशिष्ट १ में उन सभी प्रमुख द्रव्यों का संक्षेप में वर्णन किया गया
है जिनका उल्लेख मूल में या टीका के संदर्भ में नहीं है । परिशिष्ट २ में केवल
मूल में आये संस्कृत के सभी पर्यायवाची नामों को अकारादिक्रम से उपस्थित
किया गया है जिससे इस बात का ज्ञान हो सके कि अमुक द्रव्य का भावप्रकाश-
निघण्टु में उल्लेख हुआ है या नहीं । इसमें प्रत्येक पर्याय के आगे उस द्रव्य का
प्रमुख-नाम भी साथ में दिया गया है । इसके पश्चात् सभी द्रव्यों के भारतीय नामों
की अकारादिक्रम से सूची दी गई है । इसी में अन्य संस्कृत नामों का भी समावेश
है जिनका मूल श्लोकों में उल्लेख न होने से प्रथम संस्कृत सूची में अन्तर्भाव नहीं
किया जा सकता था । अन्त में लेटिन एवं अंग्रेजी नामों की भी वर्णानुसार सूची
दी गई है ।

इस व्याख्या का सम्पूर्ण श्रेय मेरे गुरुवर्य, परमपूज्य आदरणीय डॉ० गंगासहाय
पाण्डेय जी को है जिन्होंने न केवल इस व्याख्या को तैयार करने में निदेशक का
कार्य किया अपितु लेखक को इस योग्य बनाने में भी उनका वरदहस्त रहा है ।

आयुर्वेदीय वनस्पतियों के प्रकाण्ड विद्वान्, महान् वैज्ञानिक, आयुर्वेद शिरोमणि,
श्री डा० बलवन्तसिंह जी, एम० एस० सी०, भूतपूर्व प्राध्यापक, आयुर्वेदिक कालेज,
का० हि० वि० त्रि०, जिन्होंने अपना सारा जीवन ही आयुर्वेदीय वनस्पतियों
के अन्वेषण में लगाया एवं जिनके शिष्यत्व का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ उनको
यह कृति समर्पण करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है । हमारी यही
कामना है कि इसी तरह उनका मार्गदर्शन हमें आजीवन मिलता रहे ।

यह व्याख्या वास्तविक रूप में संदर्भ-ग्रन्थ सूची में उल्लिखित कृतियों का
संकलन मात्र ही है इसलिये मैं उन सभी महान् विद्वानों का अत्यन्त आभारी हूँ ।
चौखम्बा परिवार के सभी सदस्यों को धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता जिनकी
सहायता के बिना यह कार्य पाठकों के सम्मुख उपस्थित हो ही नहीं सकता था ।

आशा है, यह व्याख्या न केवल विद्यार्थियों को अपितु अध्यापकों तथा
वनस्पति अनुसन्धानकर्ताओं को भी उपादेय होगी । संभव है, इसमें कुछ त्रुटियाँ
भी रह गई हों जिनके लिये विद्वान् क्षमा करेंगे तथा अपने सुझाव देंगे जिससे
अगले संस्करण में इनका परिमार्जन किया जा सके ।

विनीत
कृष्णचन्द्र चुनेकर
दिनांक २६ मई १९६६


संदर्भग्रन्थ

१ अष्टांग संग्रह संहिता, टीका श्री अत्रिदेव गुप्त, निर्णयसागर प्रेस, बंबई, १९५१ ।
२ अष्टांगहृदय कोष, श्री वैद्य के० एम० वलापाड, द० मलबार, १९३६ ।
३ अष्टांगहृदय संहिता, टीका अरुणदत्त, निर्णयसागर प्रेस, बंबई, १९२५ ।
४ अभिनव बूटी दर्पण, भाग १-२, श्री रूपलाल वैश्य, चौखम्बा प्रकाशन, वाराणसी, १९४७ ।
५ अमरकोश, टीका रामाश्रमी, ६ ठी० आ०, निर्णयसागर प्रेस बंबई, १९४४ ।
६ ओषधीसंग्रह (मराठी), डा० वा० ग० देसाई, वैद्य या० त्रि० आचार्य, बंबई, १९२७ ।
७ काश्यपसंहिता, टीका श्री सत्यपाल, चौखम्बा प्रकाशन, वाराणसी, १९५३ ।
८ कैयदेव निघण्टुः (पथ्यापथ्य विबोधक ग्रन्थः) टीका श्री कविराज सुरेन्द्र मोहन, दयानन्द आयुर्वेदिक कालेज, लाहोर, १९२८ ।
९ चक्रदत्त, टीका श्री जगदीश्वर प्रसाद त्रिपाठी, चौखम्बा प्रकाशन, वाराणसी १९५९ ।
१० चरकसंहिता, टीका चक्रपाणि, निर्णयसागर प्रेस, बंबई, १९४१ ।
११ द्रव्यगुणविज्ञानम् उ०, द्वि० ख० श्री यादवजी श्री त्रिकमजी आचार्य, निर्णयसागर प्रेस, बंबई-२, १९५० ।
१२ द्रव्यगुणविज्ञान, भाग २-३, श्री प्रियव्रत शर्मा, चौखम्बा प्रकाशन, वाराणसी, १९५६ ।
१३ निघण्टु रत्नाकर, टीका श्री कृष्ण शास्त्री नवरे, निर्णयसागर प्रेस, बंबई, १९२६ ।
१४ निघण्टु आदर्श (गुजराती), भाग १-२, श्री वैद्य बापालाल ग० शाह, हंसोट, जि० भ्रोच, १९२७-२८ ।
१५ प्रारम्भिक उद्भिद शास्त्र, श्री डा० बलवन्तसिंह, चौखम्बा प्रकाशन, वाराणसी, १९४९ ।
१६ बिहार की वनस्पतियाँ, श्री डा० बलवन्तसिंह, श्री वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन लि०, कलकत्ता, १९५५ ।
१७ भारतीय वनौषधि (बंगला), भाग १-३, श्री कालीपद विश्वास, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कलकत्ता, १०५० ।
१८ भावप्रकाश, टीका श्री लाला शालिग्राम वैश्य, खेमराज श्री कृष्णदास, बंबई, १९०७ ।
१९ भावप्रकाश निघण्टु, टीका श्री विश्वनाथ द्विवेदी, तृ० सं०, मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी, १९५४ ।
२० मदनविनोद, टीका श्री नन्दकिशोर शास्त्री, वाराणसी, १९३४ ।
२१ यूनानी द्रव्यगुणविज्ञान, श्री डा० दलजीत सिंह, निर्णयसागर प्रेस, बंबई, १९४९ ।
२२ राजनिघण्टुसहितो धन्वन्तरीयनिघण्टुः, टीका श्री नारायण विट्ठल पुरंदरे, आनन्दाश्रम प्रेस, पूना, १८९६ ।
२३ वनस्पति परिचय, श्री अंम्भूभाई वैद्य, आयुर्वेद रिसर्च इंस्टिट्यूट, फोर्ट, बंबई, १९५२ ।
२४ वनौषधि चन्द्रोदय, भाग १-१०, श्री चन्द्रराज भण्डारी, ज्ञानमन्दिर, भानपुरा (इन्दौर), १९४८ ।
२५ वनौषधि दर्शिका, श्री डा० बलवन्तसिंह, आयुर्वेदिक कालेज यूनियन, का० हि० वि० वि०, वाराणसी, १९४८ ।
२६ वृन्दमाधव, आनन्दाश्रम, पूना, १९४३ ।
२७ वैद्यक शब्दसिन्धुः, श्री कविराज उमेशचन्द्र गुप्त, कलकत्ता, १९१४ ।

( १४ )

२८ शालिग्राम निघण्टु भूषण, श्री लाला शालिग्राम वैश्य, खेमराज श्री कृष्णदास, बंबई, १९५३ ।
२९ सन्दिग्धनिर्णय वनौषधशास्त्र, भाग १-२, श्री पं० भगीरथ स्वामी, ३४३ हरीसन रोड, कलकत्ता, १९२६ ।
३० सचित्र वनस्पति गुणादर्श, भाग १-२, श्री वैद्य हिरणम मोतीराम जंगले, वाघली, पूर्वखानदेश, महाराष्ट्र ।
३१ सुश्रुतसंहिता, टीका डल्हण, निर्णयसागर प्रेस, बंबई, १९१६ ।

REFERENCES

1 Anonymous A Consolidated Glossary of Technical terms, Central Hindi Directorate, Delhi, 1962.
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