भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
by भावमिश्र
Source: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (origin)
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के कारण होने वाले उदरशूल, हृत्शूल में लाभ होता है। इसके सेवन से पाचन क्रिया ठीक
होकर उदर में वायु का सञ्चय नहीं होता। जीर्णे सन्धिवात में विशेषतः वृद्धों में इसके फांट का
नित्य रात में प्रयोग लाभकारी होता है। यह उष्ण एवं वातहर होने से किसी भी प्रकार की पीड़ा में
लाभकारी है। गरम जल में सोंठ के चूर्ण का लेपः शिरःशूल, वातनाड़ीशूल, एवं दन्तशूल में
उपयोगी है। पसीना अधिक होकर हाथ और पैरों में शीत आने पर इसके चूर्ण को रगड़ने से
रक्ताभिसरण की क्रिया ठीक होकर शीत दूर होता है।
यह कफघ्न होने के कारण इसका प्रयोग श्वास, कास, प्रतिश्याय, गले के रोग, स्वरभङ्ग इत्यादि
में किया जाता है। इसके लिये इसका फांट बना कर लेना चाहिये। आमदोष दूर करने के लिये
सोंठ के चूर्ण को घी के साथ रेंड़ के पत्तों में लपेट कर अग्नि में पुटपाक करना चाहिये और फिर इस
चूर्ण को मिश्री के साथ सुबह लेना चाहिये। इससे आमातिसारजन्य शूल दूर होता है।
गुड़ के साथ सोंठ का उपयोग अर्श, अजीर्ण, अतिसार, गुल्म, शोथ, प्रमेह, कामला आदि में
किया जाता है। बल्य औषधियों के साथ सोंठ का उपयोग क्षतक्षीण एवं दुर्बल रोगियों के लिये
उपयोगी है। विरेचक औषधियों के साथ सोंठ लेने से हल्लास, पेट में मरोड़ या ऐंठन नहीं होती।
मात्रा—चूर्ण २ से ८ रत्ती।
अथार्द्रकस्य नामानि गुणाँश्चाह
आर्द्रकं शृङ्गवेरं स्यात्कटुभद्रं तथाऽऽर्दिका । आर्दिका भेदनी गुर्वी तीक्ष्णोष्णा दीपनी मता ॥
कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा ।
ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्यास्तेऽपि सन्त्यार्द्रकेऽखिलाः ॥ ५० ॥
भोजनाग्रे सदा पथ्यं लवणाद्रकभक्षणम् । अग्निसन्दीपनं रुच्यं जिह्वाकण्ठविशोधनम्॥५१॥
कुष्ठपाण्ड्वामये कृच्छ्रे रक्तपित्ते व्रणे ज्वरे । दाहे निदाघशरदोर्नैव पूजितमार्द्रकम् ॥ ५२ ॥
अदरख के नाम तथा गुण—आर्द्रक, शृङ्गवेर, कटुभद्र और आर्द्रिका ये संस्कृत नाम अदरख
के हैं। अदरख—मल को भेदन करने वाली, पाक में गुरु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, कटु-
रसयुक्त, विपाक में मधुर रसयुक्त, रूक्ष, वात तथा कफ को नष्ट करने वाली होती है और जितने
गुण पूर्व में सोंठ के कह आये हैं, सभी गुण अदरख में भी रहते हैं और भोजन करने के प्रथम
सर्वदा सेंधा नमक के साथ अदरख खाना हितकारी होता है। क्योंकि यह अग्नि को दीप्त करने
वाला, रुचिकारक, जिह्वा तथा कण्ठ का शोधन करने वाला होता है। कुष्ठ, पाण्डुरोग, मूत्रकृच्छ्र,
रक्तपित्त, व्रण, ज्वर, दाह इन रोगों में एवं ग्रीष्म तथा शरद ऋतुओं में अदरख खाना
हितकर नहीं है ॥ ४९–५२ ॥
५ अदरख
हि०-अदरख, आदी । ब०-आदा । प०-अदरक, अद, अद्रक, आंदा । म०-आले । ते०-अल्ल,
अल्लम् । ब्राह्मी०-स्येन, सेङ्ग, गिनसिन । गु०-आदु । क०-अल्ल, असिशोंठि, हसीसुण्ठीं ।
मा०-आदो । ता०-शुक्क, इंडि । मल०-इञ्ची । सिंहली-अमुद्दहुरु । फा०-अञ्जीबीले
तर । अ०-जंजबीले रतव । अं०-Ginger root (जिञ्जर रूट) । लै०-Zingiber officinale
(जिंजिबेर ऑफिसिनेल्)।
भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में अदरख की खेती की जाती है।
अदरख का पौधा प्रायः एक हाथ ऊँचा होता है। इसके पत्ते बांस के पत्तों के समान पर उनसे
कुछ छोटे होते हैं। इसकी जड़ में जो कन्द होता है, उसीको अदरख कहते हैं। इसका फूल, फल-
बहुत कम देखने में आता है। किसी २ पुराने पौधे पर फूल आते हैं। फूलों का रङ्ग जामुनी रङ्ग का
होता है।
अदरख रेतीली भूमि में गोबर की खाद डाली हुई दुमट मिट्टी में अधिक उत्पन्न होती है।
इसके लिये पर्याप्त वर्षा की आवश्यकता रहती है।
गुण और प्रयोग—आर्द्रक के रस का उपयोग शहद के साथ विशेष कर श्वास, कास आदि
कफ रोगों में अनुपान के लिये किया जाता है। भोजन के पूर्व सेंधानमक और आदी के सेवन से
भूख बढ़ती है, जिह्वा एवं कण्ठ की शुद्धि होकर अन्न में रुचि भी बढ़ती है। आर्द्रक रस और प्याज
का रस १, १ तोला लेने से उल्टी और जी मिचलाना दूर होता है।
मलबार में जलोदर रोग में इसका रस, तीव्र मूत्रनिःसारक रूप में दिया जाता है। इसकी
मात्रा धीरे २ बढ़ाई जाती है जिससे मूत्र की मात्रा भी बढ़ती जाती है। लेकिन पुराने हृदय रोग
एवम् वृक्कविकार (ब्राइट्स् डिसीज) में यह हानिकर है। गुड़ के साथ इसका रस शीतपित्त में
उपयोगी है। आदी का रस गुनगुना गरम करके कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है।
मात्रा—स्वरस १-२ चम्मच ।
अथ पिप्पल्या नामानि गुणाँश्चाह
पिप्पली मागधी कृष्णा वैदेही चपला कणा । उपकुल्योष्णा शौण्डी कोला स्यात्तीक्ष्णतण्डुला।
पिप्पली दीपनी वृष्या स्वादुपोका रसायनी । अनुष्णा कटुका स्निग्धा वातश्लेष्महरी लघुः ॥
पिप्पली रेचनी हन्ति श्वासकासोदरज्वरान् । कुष्ठप्रमेहगुल्मार्शः प्लीहशूलाममाहतान् ॥५५॥
आर्द्रा कफप्रदा स्निग्धा शीतला मधुरा गुरुः । पित्तप्रशमनी सा तु शुष्का पित्तप्रकोपिणी ॥५६॥
पिप्पली मधुसंयुक्ता मेदःकफविनाशिनी । श्वासकासज्वरहरी वृष्या मेध्याऽग्निवर्द्धिनी ॥५७॥
जीर्णज्वरेऽग्निमान्द्ये च शस्यते गुडपिप्पली । कासाजीर्णारुचिश्व्वासहृत्पाण्डुकृमिरोगनुत्॥५८॥
द्विगुणः पिप्पलीचूर्णाद् गुडोऽत्र भिषजां मतः ॥ ५८ ॥
पीपर के नाम तथा गुण—पिप्पली, मागधी, कृष्णा, वैदेही, चपला, कणा, उपकुल्या, ऊषणा,
शौण्डी, कोला और तीक्ष्णतण्डुला ये सब संस्कृत नाम पीपर के हैं। पीपर-अग्निदीपक, वृष्य, पाक
में मधुर रसयुक्त, रसायन, अनुष्ण (थोड़ी उष्ण), कटुरसयुक्त, स्निग्ध, वात तथा कफ नाशक, लघु-
पाकी और रेचक (दस्तावर) है। यह—श्वास, कास, उदररोग, ज्वर, कुष्ठ, प्रमेह, गुल्म, बवासीर,
प्लीहा, शूल और आमवातनाशक है। कच्ची पीपर-कफकारी, स्निग्ध, शीतल, मधुर, गुरु और
पित्त को शान्त करने वाली है। किन्तु सूखी पीपर-पित्त को कुपित करने वाली है। मधु (शहद)
से युक्त पीपर-मेद, कफ, श्वास, कास और ज्वर का नाश करने वाली होती है एवं वृष्य, मेधा
(धारणाशक्ति) के लिये हितकारी और अग्निवर्द्धक भी है। गुड़ से युक्त पीपर-जीर्णज्वर और
अग्निमान्य में हितकर होती है-एवं-कास, अजीर्ण, अरुचि, श्वास, हृद्रोग, पाण्डुरोग तथा कृमिरोग
को दूर करने वाली भी होती है। यहां पर अर्थात् पीपर के साथ गुड़ मिलाने में पीपर के चूर्ण के
तोल से दूना गुड़ मिलाना चाहिए ऐसा वैद्यों का मत है ॥ ५३–५८ ॥
६ पीपल
हि०-पीपर, पीपल । ब०-पीपुल, पिपुल । म०-पिंपळी । गु०-पीपर, लींडी पीपर, लिंडी
पीपल । क०-हिप्पली । ते०-पिप्पल्लु, पिप्पलि, पिप्पलु चेट्टु । ता०-तिप्पिली । तु०-श्चप्पली ।
मला०-तिप्पली । ब्राह्मी०-पौखीन । गोम०-हिपली । मा०-पीपल । फा०-पिलपिलं दराज,...